प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला को लेकर गिर के जंगल से गुजर रही थी एंबुलेंस और शेरों ने रास्ता रोक लिया, जानिए फिर क्या हुआ

नई दिल्ली- गुजरात के गिर-सोमनाथ के जंगलों में एक हैरान कर देने वाला वाक्या सामने आया है। घटना दो दिन पहले की है। बुधवार देर रात प्रसव पीड़ा से कराह रही एक गर्भवती महिला को फौरन अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी एक एंबुलेंस के ड्राइवर पर आ गई। ड्राइवर इलाके से वाकिफ था। इसलिए उसने ऐसा रास्ता लिया, जिससे वह आधे घंटे से भी पहले अस्पताल तक पहुंच सकता था। लेकिन, किसी को अंदाजा नहीं था कि आज कुदरत ने उनके लिए क्या तय कर रखा था। जब अस्पताल कुछ ही किलोमीटर दूर रह गया था, तब अचानक कई शेर रास्ता घर कर बैठ हुए और कुछ टहलते हुए दिखाई दे गया। ड्राइवर तो उस दृश्य को देखकर हक्का-बक्का ही रह गया। उसके लिए यह बात महिला और उसकी बुजुर्ग मां को बताना भी मुश्किल हो गया था। लेकिन, कहते हैं कि विपरीत परिस्थियों में ही कई बार अचानक हौसला भी मिल जाता है और यहां भी वैसा ही हुआ।

एंबुलेंस में तड़प रही थी गर्भवती महिला और सामने खड़े थे कई शेर

एंबुलेंस में तड़प रही थी गर्भवती महिला और सामने खड़े थे कई शेर

कल्पना कीजिएगा तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे। 108 नंबर की एंबुलेंस प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक महिला को जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचनाने के लिए सरपट भागे जा रही थी। वक्त हाथ से निकलता जा रहा था। एंबुलेंस ड्राइवर ने मजबूरी में जल्दी अस्पताल तक पहुंचने के लिए गांव का कच्चा रास्ता चुना। एंबुलेंस में स्टाफ के साथ महिला के साथ एक आशा वर्कर और उसकी बुजुर्ग मां थी। रात के 10.30 बज रहे थे और ड्राइवर को उम्मीद थी कि वह किसी भी तरह 10 से 12 मिनट में अस्पताल पहुंच जाएगा। लेकिन, अस्पताल से करीब 6 किलोमीटर पहले ही उसने अचानक एंबुलेंस को रोक दिया। महिला का दर्द बढ़ता जा रहा था, लेकिन जैसे ही ड्राइवर ने गाड़ी रोकने का कारण बताया सबके होश उड़ गए। सामने कई शेर एंबुलेंस की रोशनी में बेफिक्र घूम रहे थे। महिला के पास वक्त बिल्कुल नहीं था, लेकिन शेर वहां से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं थे।

मैं थर्र-थर्र कांप रहा था- मेडिकल टेक्निशीयन

मैं थर्र-थर्र कांप रहा था- मेडिकल टेक्निशीयन

यह एंबुलेंस 30 साल की अफसाना रफीक को गिर-गधाडा तालुका के भाखा गांव से करीब 18 किलो मीटर दूर अस्पताल लेकर जा रही थी, जो कि करीब आधे घंटे की दूरी पर था। लेकिन, 12 किलो मीटर बाद रसुलपुर पाटिया में शेरों ने रास्ता घेर लिया था। 108 इमरजेंसी के मेडिकल टेक्निशीयन जगदीश मकवाणा ने बताया, 'हालात बहुत ही बुरे हो गए थे। हमें अस्पताल पहुंचना जरूरी था, लेकिन जब तक शेर हटते नहीं हम आगे नहीं बढ़ सकते थे। मैं इसी इलाके का हूं और मुझे उनका बर्ताव पता है। सबको डर लग रहा था। मैं जानता था कि मुझे एंबुलेंस के अंदर ही डिलीवरी करवानी पड़ेगी, लेकिन पहली बार मैं थर्र-थर्र कांप रहा था।'

डॉक्टर से फोन पर सलाह लेकर हुई डिलीवरी

डॉक्टर से फोन पर सलाह लेकर हुई डिलीवरी

मकवाणा ने बताया कि एंबुलेंस में अफसाना के अलावा आशा वर्कर रसीली मकवाणा और अफसाना की मां सवार थी और सब गिर-गधाडा के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर जा रहे थे। उसके मुताबिक उन्होंने अफसाना की मां को सड़क पर शेरों के होने की बात नहीं बताई थी, क्योंकि वह तो बहुत ज्यादा घबरा जाती। बाद में गिर-सोमनाथ जिले के जीवीके जीएमआरआई के अधिकारी युवराजसिंह झाला ने बताया, 'मेरे पास करीब 10.30 बजे मकवाणा का फोन आया। मैंने उनसे कहा कि जबतक शेर रास्ते से नहीं हटते हैं आगे न बढ़ें और फोन पर डॉक्टर की सलाह के आधार पर डिलीवरी कराएं।'

शेरों के बीच पैदा हुई 'जंगल की बेटी'

शेरों के बीच पैदा हुई 'जंगल की बेटी'

इस बातचीत के बाद एंबुलेंस स्टाफ को एहसास हो गया था कि उन्हें शेरों को भूलकर एंबुलेंस में ही डिलीवरी करानी पड़ेगी। फिर क्या उन्होंने उस आशा वर्कर की मदद से अफसाना को प्रसव कराने में मदद की और उसने घने जंगल में शेरों के बीच 3 किलो की एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया। जैसे ही एंबुलेंस में रात के अंधेरे में उस नवजात बच्ची की रोने की आवाज गूंजी सबका डर छू मंतर हो गया। एंबुलेंस स्टाफ के मुताबिक बच्ची के रोने की आवाज से ही माहौल खुशनुमा हो गया था। दिलचस्प बात ये है कि 20-25 मिनट बाद शेर भी वहां से चले गए और फिर एंबुलेंस जच्चा-बच्चा को लेकर आगे की ओर निकल गया। इस वक्त दोनों मां-बच्चे गिर-गधाडा के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में आराम से हैं और उनकी जल्द डिस्चार्ज होने की संभावना है।

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