गोरखपुर जीतने के लिए करना होगा योगी आदित्यनाथ पर गौर

देश में मोदी तो गोरखपुर क्षेत्र में मोदी-योगी। यही हकीकत है पूर्वाचल के गोरखपुर क्षेत्र के दस जिलों में भाजपा के प्रचार अभियान की। डुमरियागंज से लेकर बिहार सीमा से सटे देवरिया, कुशीनगर, बलिया लोकसभा क्षेत्र तक मोदी लहर ने योगी के इम्पैक्ट को बढ़ाया है। भीड़ जुटाने से लेकर ताकत का प्रदर्शन तक में यहां भाजपा कार्यकर्ता एक ही नारा लगाते रहे 'मोदी-योगी कमल निशान मांग रहा है हिंदुस्तान।'
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जिस तरह मोदी पर देश में भाजपा का परचम लहराने का जिम्मा है उसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बस्ती व आजमगढ़ मंडल के दस जिलों में योगी आदित्यनाथ पर भी यही जिम्मेदारी है। गोरखपुर सीट के अतिरिक्त इन क्षेत्रों के टिकट बटवारे में भी योगी को तवज्जो मिली थी। इसी कारण उन पर भाजपा के बेहतर प्रदर्शन का दारोमदार भी है।
बीते चुनाव में बसपा की घेरेबंदी के कारण ज्यादातर अपनी ही सीट पर घिरे रहे योगी इस बार दूसरी सीटों की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। मोदी के बाद यदि किसी की मांग यहां प्रचार के लिए रही तो वह योगी आदित्यनाथ ही हैं। गोरखपुर सीट पर पांचवीं बार भाजपा के उम्मीदवार हैं। 1998 से वह यहां से लगातार जीत रहे हैं। इसके पूर्व के तीन चुनाव उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ जीते थे।
गोरखपुर से जुड़े संसदीय क्षेत्रों में चाहे भाजपा का मंच हो या विपक्ष का, हर जगह योगी ही चर्चा के केंद्र में होते हैं। कोई उनके समर्थन में नारे लगाता है तो कोई विरोध में दावे करता है। सपा, बसपा और कांग्रेस उनके पराजय की घोषणा करते हैं तो भाजपा कार्यकर्ता उनकी जीत के बड़े अंतर का दावा करते हैं। वे इस सीट पर लगातार 24 साल से गोरक्षपीठ के विजयी होने को अपने दावे का आधार बताते हैं।
बाडी लैंग्वेज की बात करें तो योगी इस बार समीकरणों के तनाव में नहीं दिख रहे। उनके चेहरे पर निश्चिंतता के भाव हैं। वे जातियों के समीकरण के खिलाफ लोगों को सावधान करते हैं। वह अपने संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में जितना समय देते हैं उससे अधिक दूसरे संसदीय क्षेत्रों में उनकी सभाएं हो रही हैं। देवरिया, सलेमपुर, बलिया, आजमगढ़, लालगंज, कुशीनगर, डुमरियागंज, महराजगंज एवं बांसगांव सीट पर मोदी के बाद सबसे अधिक मांग योगी की ही है। उनके लिए एक हेलीकाप्टर यहां खड़ा रहता है।
अंतिम चरण के चुनाव अभियान की चर्चा करें तो अब तक भाजपा का शीर्ष नेतृत्व वाराणसी को व्यवस्थित करने में ही उलझा है। पूर्वाचल में अकेले गोरखपुर ही एक मात्र ऐसी सीट है जहां न तो नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम लगा है और न किसी भी दूसरे बड़े नेता की मांग की गई है। गोरखपुर में प्रचार के लिए किसी नेता की ड्यूटी यहां नहीं लगाई गई। यह स्थिति होने के पीछे भाजपा का तर्क योगी का अब तक अपराजेय होना है।
योगी इस बार अपनी सीट को लेकर उतने फिक्त्रमंद नहीं जितना गोरखपुर से इतर अन्य दस क्षेत्रों को लेकर हैं। हालांकि गोरखपुर में उन्हें घेरने के लिए समाजवादी पार्टी ने पूर्व मंत्री स्व. जमुना निषाद की विधायक पत्नी राजमती देवी को उतारा है। अपनी जाति में उनका दखल मजबूत है। बसपा के प्रत्याशी रामभुआल निषाद मायावती की सरकार में मंत्री रह चुके हैं।
उनकी भी कोशिश स्वजातीय मतों में अधिक से अधिक हिस्सेदारी लेने की है। कांग्रेस ने अष्टभुजा तिवारी को उतारा है, जिन्हें अब भी कई कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। आम आदमी पार्टी के बुजुर्ग प्रत्याशी राधेमोहन मिश्र भी मंचों पर योगी को ही अधिक घेरते हैं। हालांकि काशी में रहुल की रैली में उमड़ा जनसैलाब भी कांग्रेस में आत्मविश्वास भर रहा है।












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