'बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर यदि कुलदीप तिवारी होते तो...'

बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर यदि कुलदीप तिवारी होते तो...

उन्नाव में नाबालिग लड़की के साथ हुए कथित बलात्कार, तमाम हुज्जतों के बाद विधायक कुलदीप सेंगर के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ होना, एफ़आईआर के बावजूद विधायक की गिरफ़्तारी न होना और फिर उसकी वजह बताने के लिए ख़ुद राज्य के डीजीपी का सामने आना.

ये ऐसी घटनाएं हैं जो न सिर्फ़ सरकार की कार्यकुशलता और उसकी नीयत पर सवाल खड़े कर रही हैं बल्कि विपक्ष के साथ-साथ पार्टी के भीतर भी चल रहे द्वंद्व को उजागर कर रही हैं.

मामले को लेकर दो नेताओं ने तो सोशल मीडिया में खुलेआम ये जता दिया है कि योगी सरकार को लेकर बीजेपी में नाराज़गी और समर्थन के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खिंच गई है. मीडिया में पार्टी का पक्ष रखने के लिए नामित प्रवक्ता डॉक्टर दीप्ति भारद्वाज ट्वीट करके बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से अपील करती हैं कि सरकार के निर्णय शर्मसार कर रहे हैं, आप यूपी को बचा लीजिए.

बीबीसी से बातचीत में डॉक्टर दीप्ति भारद्वाज कहती हैं, "मैं एक चैनल के डिबेट में बैठी थी. कुलदीप सेंगर के मामले पर बहस चल रही थी, तभी ख़बर आई की स्वामी चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ सरकार रेप का मुक़दमा वापस ले रही है. विपक्षी सदस्य मेरे ऊपर हमलावर हो गए और सच पूछिए तो मैं निरुत्तर हो गई. जिन मुद्दों पर हम पिछली सरकार को घेरते थे, उन्हीं मुद्दों पर उसी पार्टी के प्रवक्ता हमें घेर रहे हैं."

बीजेपी प्रवक्ता ने उठाई आवाज़

डॉक्टर दीप्ति भारद्वाज कहती हैं कि उन्होंने अपने 'मन की बात' पार्टी अध्यक्ष को बताई है. उनका कहना है कि पार्टी में ऐसी सोच वाली बहुत सी महिलाएं और पुरुष भी हैं, लेकिन सब लोग खुलकर अपनी बात क्यों नहीं रख पा रहे हैं, पता नहीं. भारद्वाज को इस बात की पूरी आशंका है कि शायद इसके लिए उन्हें पार्टी से निकाल दिया जाए, लेकिन वो कहती हैं, "मैं इस वजह से चुप क्यों बैठूं कि कल अपने आप से शर्मिंदा होना पड़े."

वहीं पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता आईपी सिंह योगी के समर्थन में ट्वीट करते हैं कि उन्होंने तो कुलदीप सेंगर पर कार्रवाई का मन बना लिया था लेकिन पार्टी के ही एक बड़े नेता ने हस्तक्षेप करके उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया. 'बड़े नेता' पर रहस्य बना हुआ है लेकिन क़यास जारी हैं.

ठाकुरों की गोलबंदी

कुलदीप सेंगर के मामले में पार्टी के ठाकुर यानी राजपूत समुदाय के विधायकों की जिस तरह की गोलबंदी देखी जा रही है और उसका असर सरकार के फ़ैसलों पर देखा जा रहा है, उसे लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी चर्चाओं के बाज़ार गर्म हैं.

यूं तो योगी आदित्यनाथ सरकार पर शुरू से ही ये आरोप लग रहे थे कि संन्यासी होने और भेद-भाव न करने के अपने वादे के विपरीत वो इस जाति के प्रति कुछ ज़्यादा ही 'मेहरबान' हैं, उन्नाव की घटना ने इन आरोपों को मज़बूती दे दी है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं कि यह कोई नई बात नहीं है. ठाकुर समुदाय का जब भी कोई नेता राजनीति में आगे बढ़ा है, उस समुदाय के सभी लोग उसी के पीछे लामबंद हो जाते हैं, "चाहे राजनाथ सिंह हों, राजा भैया हों या फिर अमर सिंह हों. जो भी पॉवरफ़ुल रहा, सभी ठाकुर नेता उसके साथ हो लिए. पिछले दिनों एमएलसी पद छोड़ने वाले कुछ नेताओं को देख लीजिए."

सरकार के काम-काज को लेकर पार्टी में मतभेद के सवाल पर सुनीता ऐरन कहती हैं कि ये तो सरकार बनने के साथ ही शुरू हो गया था और अभी तक चल रहा है. लेकिन बकौल सुनीता ऐरन, इस विवाद में दो ध्रुव योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य हैं न कि ब्राह्मण और क्षत्रिय या फिर कुछ और.

जहां तक सरकार में एक जाति विशेष के महत्व का सवाल है तो इस पर पार्टी का कोई नेता 'ऑन रिकॉर्ड' कुछ नहीं कहता लेकिन ऑफ़ द रिकॉर्ड बहुत कुछ बताते हैं. बीजेपी दफ़्तर में एक महिला नेता इस सवाल पर ज़ोर से हँसीं और फिर धीरे से बोलीं, "उत्तर प्रदेश में तो सरकार टी सिरीज़ चला रही है." फिर 'टी' अक्षर का पूरा रूप ख़ुद ही बताती हैं- 'ठाकुर.'

कुलदीप सेंगर का बचाव हो या फिर पूर्व गृह राज्य मंत्री चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ चल रहे रेप केस की वापसी की प्रक्रिया शुरू कराने का मामला हो, योगी सरकार के इन फ़ैसलों की चर्चा सोशल मीडिया पर भी जमकर हो रही है. गौरव दुबे फ़ेसबुक पर चुटकी लेते हैं, "कुलदीप सेंगर यदि कुलदीप तिवारी होते तो आज जेल में चक्की पीस रहे होते."

ऐसी टिप्पणियां सोशल मीडिया में बहुतायत में देखी जा सकती हैं.

लेकिन सवाल उठता है कि ख़ुद जातिवाद की आलोचना करने वाले योगी आदित्यनाथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? आरएसएस से जुड़े और इस समय दिल्ली में रह रहे एक वरिष्ठ स्वयंसेवक कहते हैं, "आपने देखा नहीं कि वो कैसे मुख्यमंत्री बने थे. सच्चाई तो ये है कि उन्होंने अमित शाह और मोदी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनी थी अन्यथा वो तो ये किसी और को दे रहे थे. योगी ने किसकी बदौलत आलाकमान से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने की हिम्मत की- ठाकुर विधायकों की बदौलत. तो अब ठाकुर विधायकों के साथ नहीं खड़े होंगे तो ख़ुद ही कमज़ोर हो जाएंगे."

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लखनऊ में एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, 'बीजेपी ने योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपकर अपने परंपरागत मतदाता वर्ग यानी ब्राह्मणों को पहले ही नाराज़ कर दिया था, अब योगी का ठाकुर प्रेम इस नाराज़गी को और बढ़ा रहा है. दूसरी ओर वो जिस तरह से दलितों और पिछड़ों को खुश करने में इस वर्ग के हितों की अनदेखी कर रहे हैं, वो उसे 2019 में महंगा साबित हो सकता है.'

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