कश्मीर के मसले पर इस्तीफा देने वाले IAS अधिकारी को तुरंत ड्यूटी पर लौटने का आदेश
नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद वहां के लोगों के मौलिक अधिकार के हनन का हवाला देते हुए 33 साल के आईएएस अधिकारी कन्नान गोपीनाथन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। अब उन्हें तुरंत अपनी ड्यूटी पर वापस लौटने को कहा गया है। केरल के रहने वाले कन्नान गोपीनाथन इस्तीफा देने से पहले केंद्रशासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली में तैनात थे, वे 2012 बैच के आईएएस अधिकारी हैं।

इस्तीफा मंजूर होने तक काम पर लौटने का आदेश
कन्नान गोपीनाथन को उनका इस्तीफा मंजूर होने तक अपने काम पर वापस लौटने के लिए कहा गया है। गोपीनाथन केंद्र शासित प्रदेश के पावर एंड नॉन कन्वेंशनल ऑफ एनर्जी में सचिव पद पर तैनात थे। उन्होंने 21 अगस्त को गृह मंत्रालय को अपना इस्तीफा सौंपा था, जिसके जवाब में उन्हें काम पर लौटने को कहा गया है।

गृह मंत्रालय ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया था
27 अगस्त को जारी हुए नोटिस पर दमन और दीव के कार्मिक विभाग में कार्यरत उप सचिव गुरप्रीत सिंह के हस्ताक्षर हैं। इसमें लिखा है, 'सरकारी अधिकारी का इस्तीफा स्वीकार किए जाने पर प्रभावी होता है, इसलिए आपको निर्देश दिया जाता है कि आप तब खुद को मिली जिम्मेदारियों का निर्वहन करना शुरू कर दें जब तक कि आपके इस्तीफे पर कोई फैसला नहीं हो जाता है।' चूंकि, गोपीनाथन सिलवासा में मौजूद नहीं थे, इसलिए अधिकारियों ने उनके सरकारी गेस्टहाउस के कमरे के बाहर नोटिस चिपका दिया। फिलहाल, आईएएस अधिकारी ने नोटिस पर कोई प्रतिक्रिया देने से मना किया है। इसके पहले, गृह मंत्रालय ने उनको कारण बताओ नोटिस जारी किया था। वहीं, गोपीनाथन का कहना है कि जो कश्मीर में हो रहा है वह स्वीकार्य नहीं है।

कश्मीर के मसले पर दिया था इस्तीफा
इस्तीफा देने के बाद गोपीनाथन ने कहा था कि मेरे अकेले के इस्तीफा देने से कुछ फायदा नहीं है, लेकिन मैं अपने अपने फैसले से खुद की अंतरआत्मा को जवाब दे सकता हूं। गोपीनाथन ने कहा था कि जम्मू कश्मीर में लाखों लोगों का मौलिक अधिकार पिछले 20 दिनों में छीन लिया गया है। लेकिन बावजूद इसके देश में कई लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। यह भारत में 2019 में हो रहा है। आर्टिकल 370 का खत्म किया जाना कोई बड़ा मुद्दा नहीं है, लेकिन लोगों के अधिकार को छीन लेना गलत है, यह मुख्य मुद्दा है। यह लोगों पर था कि वह सरकार के फैसले का स्वागत करते या फिर इसका विरोध, ये उनका अधिकार था।












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