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Hyderabad RRR Project: 161 किमी का मेगा कॉरिडोर तैयार, हैदराबाद से मुंबई तक ट्रैफिक होगा कम

Hyderabad RRR Project: हैदराबाद का रीजनल रिंग रोड (RRR) प्रोजेक्ट शहर के ट्रैफिक दबाव को काफी हद तक कम करेगा। बुनियादी ढांचे को नई दिशा देने वाला सबसे महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है। यह नई रिंग रोड मौजूदा आउटर रिंग रोड (ORR) से लगभग 30-40 किलोमीटर बाहर बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य शहर पर बढ़ते ट्रैफिक दबाव को कम करना और आसपास के जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी देना है।

आरआरआर (RRR) का सबसे बड़ा फायदा शहर के बाहर से आने वाले वाहनों को भी मिलेगा। इस प्रोजेक्ट से विजयवाड़ा (NH-65), बेंगलुरु (NH-44) और मुंबई मार्ग से आने वाले भारी वाहन शहर की सीमा में प्रवेश करने की जरूरत नहीं होगी। इससे शहर के ट्रैफिक जाम में उल्लेखनीय कमी आएगी।

Hyderabad RRR Project

Hyderabad RRR Project: मुंबई-बेंगलुरु जाने का रास्ता भी होगा आसान

- प्रोजेक्ट का उत्तरी भाग, जिसे 'नॉर्दर्न आर्क' कहा जा रहा है, संगारेड्डी से चौटुप्पल तक करीब 161.5 किलोमीटर लंबा होगा।

- यह कॉरिडोर नरसापुर, तूफरान, गजवेल, यादद्री और भुवनगिरी जैसे तेजी से विकसित हो रहे इलाकों को सीधे जोड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे औद्योगिक निवेश और रियल एस्टेट सेक्टर को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।

- राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी इसका असर साफ दिखाई देगा। NH-65 पर संगारेड्डी के आसपास, NH-44 पर तूफरान और मेडचल के पास तथा NH-163 पर भुवनगिरी क्षेत्र में ट्रैफिक दबाव कम होने की उम्मीद है।

- इससे मुंबई और बेंगलुरु जाने वाले वाहनों को अब शहर के अंदर आने की जरूरत होगी। इससे इन शहरों में सफर करने वाले लोगों को भी आसानी होगी।

RRR Project से उपनगरीय इलाकों को भी ट्रैफिक जाम से मिलेगी मुक्ति

आरआरआर के बनने से हैदराबाद का विकास 'पॉली-सेंट्रिक' मॉडल की ओर बढ़ेगा, यानी विकास केवल शहर के केंद्र तक सीमित न रहकर 20 से अधिक उपग्रह शहरों तक फैलेगा। इससे नए इंडस्ट्रियल क्लस्टर, लॉजिस्टिक्स पार्क और रिहायशी टाउनशिप विकसित होने की संभावना है। समय की बचत भी इस परियोजना का बड़ा लाभ है।

जिले से जिले की यात्रा करने वाले लोगों को अब हैदराबाद शहर में घुसने की जरूरत नहीं होगी, जिससे यात्रा का समय 2-3 घंटे तक कम हो सकता है। यह परियोजना केंद्र सरकार की भारतमाला परियोजना के तहत विकसित की जा रही है। निर्माण लागत का 100% वहन केंद्र सरकार कर रही है, जबकि भूमि अधिग्रहण की 50% लागत राज्य सरकार द्वारा वहन की जा रही है।

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