La Nina के असर से इस बार कैसी पड़ेगी सर्दी और आगे क्या है संभावना ? जानिए
नई दिल्ली, 28 अक्टूबर: मानसून ने इस बार देश में बारिश का रिकॉर्ड तोड़ा है। अक्टूबर के आखिर तक देश के बड़े हिस्से में जोरदार बारिश हुई है। उत्तराखंड में तो इसने कहर ही मचा दिया है। दूसरी तरफ सर्दी ने भी जल्दी दस्तक दे दी है। आसार लग रहे हैं कि दिल्ली की दिवाली इस बार दूसरे वर्षों के मुकाबले सर्दी वाली दिवाली होगी। यहां तक की बर्फबारी ने भी असमान्य रूप से पहले ही ऊंचे इलाकों को सफेद चादरों में ढंकना शुरू कर दिया है। दूसरी तरफ यह लगातार दूसरा साल है, जब ला नीना की घटनाओं का प्रभाव पड़ने वाला है। ऐसे में क्या इस साल ज्यादा सर्दी पड़ेगी ? क्या ठंड के मौसम में भी सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है ? आइए जानते हैं कि वैज्ञानिक क्या संभावना जता रहे हैं।

समय से पहले सर्दी की दस्तक
26 अक्टूबर को दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी की औपचारिक घोषणा से पहले ही इस बार भारत में सर्दी ने दस्तक दे दी थी। 11 अक्टूबर के आसपास से ही जम्मू और कश्मीर, लद्दाख में रुक-रुक कर बर्फबारी चल रही है। लद्दाख की राजधानी लेह, जहां आमतौर पर ज्यादा सर्दी में ही बर्फ गिरती है, इस बार वहां 25 अक्टूबर से ही बर्फबारी शुरू हो चुकी है। पिछले कुछ दिनों में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी ऊंचे स्थानों में बर्फ गिरे हैं। वैसे अक्टूबर में यहां बर्फ गिरते रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों के मुताबिक इस बार इसकी तीव्रता ज्यादा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्रों में भारी बर्फबारी और उत्तराखंड में हाल में हुई भारी बारिश आने वाले कड़ाके की ठंड की एक शुरुआती झांकी हो सकती है।

सामान्य से बहुत ज्यादा बारिश
पिछले दो हफ्तों में उत्तर, उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत के कई इलाकों में भारी बारिश भी हुई है। 27 अक्टूबर तक इस मौसम में देशभर में सामान्य से 38 फीसदी ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई है। समय से पहले सर्दी की शुरुआत और इस मौसम में इतनी बारिश का शुरुआती कारण अफगानिस्तान के ऊपर पश्चिमी विक्षोभ की गतविधियों और बंगाल की खाड़ी से चलने वाली पूर्वी हवाओं को माना जा रहा है। यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के पर्यावरण वैज्ञानिक रघु मुर्तुगुड्डे के मुताबिक इस मौसम में भू-मध्य सागर सामान्य से ज्यादा गरम है। इसका मतलब यह हुआ कि वहां से गुजरने वाला पश्चिमी विक्षोभ ज्यादा नमी ला सकता है और इसकी तीव्रता और ज्यादा बढ़ सकती है।

कड़ाके की सर्दी की संभावना
इस बार काफी कड़ाके की ठंड पड़ने के आसार इसलिए भी नजर आ रहे हैं कि लगातार दूसरे साल ला नीना की परिस्थितियां पैदा हुई हैं। ला नीना की घटना अल नीनो के विपरीत सर्दी को प्रभावित करने वाली परिस्थिति है। पूर्व और मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान ला नीना के दौरान औसत से ज्यादा ठंडा हो जाता है। इसका असर विश्व के बड़े हिस्से पर हवाओं के जरिए पड़ता है।

भारत में ला नीना का असर
भारत में ला नीना को आमतौर पर सामान्य से ज्यादा सर्दी और बारिश के लिए जिम्मेदार माना जाता है। हालांकि, ला नीना का प्रभाव कई बार लगातार दो वर्ष भी देखने को मिलता है, लेकिन अल नीनो की घटना (गरम चरण) शायद ही लगातार दो साल देखने को मिलती है। ला नीना का मौजूदा प्रभाव अगले साल बसंत (फरवरी, 2022) तक जारी रहने का अनुमान है। इस दौरान इसका उत्तर-पूर्वी मानसून (26 अक्टूबर से शुरू) और पश्चिमी विक्षोभ के साथ भी जुगलबंदी होने की संभावना बढ़ गया है। ला नीना की वजह से भारतीय उपमहाद्वीप में नमी की मात्रा बढ़ेगी, जिसके चलते भारी बर्फबारी और बारिश की संभावना पैदा हो सकती है। इसका परिणाम ये होगा कि देश में भी इस बार ज्यादा ठंड और सामान्य से ज्यादा बारिश देखने को मिल सकती है। उत्तर-पूर्वी मानसून से दक्षिण भारत में नवंबर में बारिश होती है, जबकि पश्चिमी विक्षोभ की वजह से उत्तर और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में जाड़े के मौसम में बारिश होती है।

आगे का मौसम कैसा होगा ?
ला नीना के असर से भारतीय मौसम पर पड़ने वाले असर के बारे में भारतीय मौसम विभाग का अनुमान जारी होना अभी बाकी है। लेकिन, माना जा रहा है कि सामान्य से ज्यादा ठंड और बसंत का मतलब ये होगा कि अगले साल दक्षिण-पश्चिमी मानसून के शुरू होने में देरी हो सकती है। 2018 में पर्यावरण पर एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ था, जिसके मुताबिक ला नीना से प्रभावित सर्दी की वजह से अगले साल दक्षिणी-पश्चिमी मानसून में बारिश में 4 फीसदी तक की कमी हो सकती है। इसमें यह भी कहा गया है कि अगर उसके बाद अल नीनो का असर रहा तो बारिश 15 फीसदी तक कम हो सकती है। यही नहीं, ला नीना के प्रभाव और सामान्य से ज्यादा और लंबी सर्दी का मतलब होगा कि गर्मी कम दिनों की होगी, लेकिन वह बहुत ज्यादा तीव्र हो सकती है और बारिश शुरू होने से पहले जबर्दस्त गर्म हवाओं का प्रकोप देखने को मिल सकता है।












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