कैसे पारसियों की सबसे बड़ी समस्या कोरोना संकट में सुलझ गई, जनसंख्या में रिकॉर्ड इजाफा
मुंबई, 14 जून: पिछले 15 महीनों से कोविड ने पूरे देश को संकट में डाल रखा है। देश ही नहीं इसके चलते पूरी दुनिया में भारी उथल-पुथल मच चुका है। लेकिन, इन नकारत्मकताओं के बीच भारत के एक अल्पसंख्यक समुदाय में उम्मीद की बड़ी किरण नजर आई है। वनइंडिया बात कर रहा है पारसी समुदाय की। कुछ वर्ष पहले नौबत ऐसी आने लगी थी कि आने वाले वर्षों में पारसी समुदाय एक संप्रदाय नहीं रह जाएगा, बल्कि और इसे मजबूरन आदिवासी समुदाय का दर्जा देना होगा। क्योंकि, इनकी जनसंख्या संप्रदाय का दर्जा पाने के लिए निर्धारित न्यूनतम आबादी की ओर तेजी से गिरने लगा था। लेकिन, कोरोना वायरस की वजह से लगी लॉकडाउन ने उम्मीद की एक बड़ी वजह दिखाई है।

आबादी संकट से गुजर रहा है पारसी समुदाय
आजादी से पहले 1941 में भारत में पारसी समुदाय की जनसंख्या 1.14 लाख थी। लेकिन, उसके बाद उनकी आबादी तकरीबन हर 10 साल में 12 फीसदी के दर से कम होने लगी और 2011 की जनगणना में भारत में सिर्फ 57,000 पारसी ही रह गए। इस दौरान भारत की कुल आबादी हर जनगणना के दौरान करीब 21 फीसदी के दर से बढ़ रही थी। जाहिर है कि आशंका पैदा हो गई कि आने वाले वर्षों में यही आलम रहा तो पारसियों की आबादी घटकर 23,000 तक पहुंच जाएगी, जिसके बाद मुख्यत: बड़े शहरों में बसे हुए इस समुदाय को 'जनजाति' का दर्जा मिल सकता है। इसी को देखते हुए पारसियों की आबादी बढ़ाने के लिए सरकार के समर्थन से 24 सितंबर, 2013 को 'जियो पारसी स्कीम' लॉन्च की गई थी। बीते साल इस स्कीम ने लॉकडाउन के दौरान गुल खिलाया है और इनकी जनसंख्या में रिकॉर्ड इजाफा दर्ज किया गया है।

2020 में पारसियों के घर रिकॉर्ड 61 बच्चों का जन्म हुआ
2020 में जब भारत में कोरोना के चलते देशव्यापी लॉकडाउन लगा हुआ था, तो उस समय लोग घर से ही काम (वर्क फ्रॉम होम) करने को मजबूर थे। जाहिर की इस वायरस ने अभी भी भारत को संकट में डाल रखा है, लेकिन पारसी समुदाय को इसी वजह से गुड न्यूज भी मिला है। 2020 में पारसियों के घरो में 61 नन्हें-मुन्ने बच्चों की किलकारियां गूंजी हैं। जो कि पिछले कई वर्षो में एक रिकॉर्ड है। इस उपलब्धि के पीछे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के सहयोग से शुरू किया गया 'जियो पारसी स्कीम' है, जिसकी वजह से 2013 से इनकी जनसंख्या में इस महीने तक कुल 321 की बढ़ोतरी हो चुकी है और मौजूदा साल में अबतक 22 बच्चों का जन्म हो चुका है। भले ही देश की कुल 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी के लिए संख्या के तौर पर ये गिनती कोई मायने नहीं रखती, लेकिन देश की प्रगति में पारसियों के योगदान को देखते हुए यह देश के लिए बहुत ही सुकून देने वाली बात है।

8 वर्षों 321 बढ़ी पारसियों की आबादी
दरअसल, पिछले 8 वर्षों में जिन 321 पारसी बच्चों का जन्म हुआ है, वे उन दंपतियों के हैं, जिन्हें 'जियो पारसी स्कीम' के तहत मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिला है। इस स्कीम के तहत इस समुदाय में लो फर्टिलिटी रेट को देखते हुए उससे संबंधित इलाज में मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराया जाता है। पिछले साल लॉकडाउन की वजह से इसमें ये सहायता मिली कि दंपतियों के वर्क फ्रॉम होम होने की वजह से उनके लिए डॉक्टरों से संपर्क करने के लिए वक्त निकालना ज्यादा आसान हो गया और वे समय-समय पर फर्टिलिटी या गर्भधारण से संबंधित सलाह लेते रहे, जिसका परिणाम सबके सामने है। वैसे यह योजना शुरू होने के अगले साल 16, 2015 में 38 बच्चे पैदा हुए, लेकिन 2016 में फिर से इसमें गिरावट आई और महज 28 पारसी बच्चों की ही किलकारियां सुनाई पड़ीं। इसके बाद भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मसलन, 2017 में 58, 2018 में 38 और 2019 में 59 पारसी बच्चे पैदा हुए। लेकिन, 2020 लॉकडाउन से मिली मदद की वजह से रिकॉर्ड टूट गया।

पारसियों की आबादी घटने का कारण क्या है ?
पारसियों की आबादी में निरंतर कमी की बड़ी वजह ये रही है कि वह अपने समुदाय से बाहर शादी नहीं करना चाहते, क्योंकि उन्हें अपने नस्ल पर बहुत ज्यादा गर्व है। दूसरी तरफ उन्हें ये डर भी रहता है कि कहीं बिरादरी में घुसपैठ के चलते उनकी अपनी मूल पहचान ही ना खत्म हो जाए। यही वजह है कि यहां चचेरे भाई-बहनों में शादियां बहुत ही सामान्य सी बात है। लेकिन, इसके चलते कई तरह के आनुवंशिक रोगों का शिकार भी होना पड़ जाता है। ऊपर से 2001 की जनगणना के मुताबिक पारसियों में लिंग अनुपात भी भारत की सामान्य आबादी से असमान है। मसलन, 1,050 महिलाओं की तुलना में सिर्फ 1,000 ही पुरुष ही थे। ये तमाम दिक्कतें हैं, जिनके चलते उनकी आबादी प्रभावित होती रही है। लेकिन, लगता है कि नई पहल से उनकी सबसे बड़ी समस्या सुलझने की उम्मीद जग गई है।

पारसी समुदाय का इतिहास
पारसी मूलरूप से ईरान (फारस) के रहने वाले हैं, जो वहां से इस्लाम के पैर पसारने की वजह भागने को मजबूर हुए थे। अनुमान के मुताबिक 8वीं से 10वीं सदी बीच हजारों पारसी फारस से समंदर के रास्ते छोटे-छोटे नावों में बैठकर भारत पहुंचे और गुजरात के हिंदू राजा जदेजा या जादी राणा ने उन्हें अपने यहां न केवल शरण दिया, बल्कि उन्हें उनकी इच्छा के मुताबिक धर्म के पालन करने और परंपरा निभाने की आजादी भी दी। धीरे-धीरे पारसियों ने मुंबई, सूरत और कराची जैसे बड़े शहरों में अपना डेरा बसा लिया। ईरान से पारसी दुनिया के कई और मुल्कों में भी गए और भारत से भी बाद में कई परिवार विदेश गए। एक अनुमान की उनकी दुनिया में कुल आबादी करीब 26 लाख है। भारत में पारसियों के साथ सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने न तो अपना धर्म छोड़ा ही और न ही परंपरा से समझौता किया है, लेकिन फिर भी दिल से भारतीयता को अपना लिया है और नए भारत के निर्माण में अपना खून-पसीना लगा रहे हैं।
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