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जानिए आखिर कैसे गैर यादव ओबीसी वोटर ने ध्वस्त कर दिया भाजपा का किला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश और बिहार की लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है, जिस तरह से पार्टी तीनों सीटों पर हारी है उसने ना सिर्फ पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी कर दी हैं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की भी चिंता को बढ़ा दिया है। यूपी बिहार से भाजपा व उसके सहयोगी दलों ने 2014 में 104 सीटों पर जीत दर्ज की थी। अकेले भाजपा ने 282 में से 93 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन गोरखपुर, फूलपुर और अररिया में पार्टी की शर्मनाक हार ने पार्टी की लोकप्रियता पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।

गैर यादव ओबीसी समीकरण से मिली थी 2014,2017 में बंपर जीत

गैर यादव ओबीसी समीकरण से मिली थी 2014,2017 में बंपर जीत

इस उपचुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो भाजपा दोनों ही राज्यों में जातिगत समीकरण को बेहतर तरीके से अपने पक्ष में साधने में पुरी तरह से विफल रही है, जिसे उसने 2014 के लोकसभा चूनाव में काफी बेहतर तरीके से साधा था। दोनों ही प्रदेश में गैर यादव मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में अपना समर्थन दिया था, जिसके चलते पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिली थी। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का सबसे बड़ा मंत्र यह था कि पार्टी ने एक तिहाई जगहों पर भाजपा ने ओबीसी जाति से गैर यादवों को टिकट दिया था। 2015 में जिस तरह से भाजपा को नीतीश लालू के गठबंधन की वजह से हार का सामना करना पड़ा उसके बाद एक बार फिर से गैर यादव मतदाता को रिझाने के लिए पार्टी को नीतीश कुमार के साथ 2017 में गठबंधन करना पड़ा। यह यह पूरा समीकरण इस उपचुनाव में तीनों सीटों पर पूरी तरह से विफल नजर आया।

भाजपा की रणनीति को बड़ा झटका

भाजपा की रणनीति को बड़ा झटका

यूपी की दोनों ही गोरखपुर और फुलपुर की सीट पर सपा उम्मीदवार प्रवीण निषाद और नागेंद्र प्रताप पटेल ने इस चुनाव में जीत दर्ज की और दोनों ही नेता गैर यादव हैं और ओबीसी समुदाय से आते हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि सपा का कुर्मी उम्मीदवार भाजपा के कुर्मी उम्मीदवार से फूलपुर में जीत गया और दोनों ही गैर यादव जाति से आते हैं। ऐसे में जिस तरह से कुर्मी समुदाय ने अपना मत भाजपा की जगह सपा को दिया है उसने साफ कर दिया है कि अब इस समुदाय ने पिछले चुनाव के बाद अपना मन बदल लिया है।

मतदाताओं ने बदला मन

मतदाताओं ने बदला मन

वहीं गोरखपुर में भी सपा उम्मीदार निषाद समुदाय से हैं, इस जाति से जुड़े लोग नदी के किनारे बसे हैं और इन लोगों ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अपना समर्थन दिया था, लेकिन इस बार के उपचुनाव में इन लोगों ने अपने समर्थन पर पुनर्विचार किया है। दोनों ही जगहों पर औबीसी मतदाताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भगवा छवि को नकारते हुए सपा को समर्थन दिया है। सपा की जीत में बसपा के दलित समर्थन ने भी बड़ी भूमिका निभाई है।

बिहार में ध्वस्त भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग

बिहार में ध्वस्त भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग

बिहार में भी जदयू को उम्मीद थी कि ओबीसी समुदाय के गैर यादव वोटर भाजपा को समर्थन करेंगे, उन्होंने भी राजद को अपना वोट दिया है। यहां राजद उम्मीदवार सरफराज आलम ने भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह को चुनाव में हरा दिया जोकि निषाद समुदाय से आते हैं। गोरखपुर, फुलपुर और अररिया के चुनाव नतीजे साफ करते हैं कि ओबीसी वोटर्स ने अपनी सोच को बदला है और उन्होंने इस बार साफ कर दिया है कि वह भाजपा से इतर विकल्प की ओर देख रहे हैं।

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