RSS में रह चुके असीमानंद को कितना जानते हैं आप?
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने सोमवार को स्वामी असीमानंद समेत पांच लोगों को हैदराबाद स्थित मक्का मस्जिद में धमाके करने की साज़िश रचने के आरोप से बरी कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि एनआईए असीमानंद के ख़िलाफ़ सबूतों को पेश करने में नाकाम रही.
हैदराबाद की ऐतिहासिक मक्का मस्जिद में हुए धमाके में असीमानंद मुख्य अभियुक्त थे, उनके अलावा अन्य लोगों के ख़िलाफ़ आरोप लगे थे.
इमप्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईइडी) से किए गए इस धमाके में 9 लोगों की जान गई थी और 50 से ज़्यादा लोग ज़ख़्मी हुए थे.
ग्यारह साल पहले 18 मई को मक्का मस्जिद धमाके में पहली बार दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों के नाम सामने आए थे. स्वामी असीमानंद ख़ुद को साधु कहते थे और वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता रह चुके थे.
असीमानंद को 2010 में पहली बार सीबीआई ने गिरफ़्तार किया था.
पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले के असीमानंद का असली नाम नब कुमार सरकार था. असीमानंद ने वनस्पति विज्ञान में मास्टर्स की डिग्री हासिल की थी. असीमानंद को जितेन चटर्जी और ओमकारनाथ नाम से भी जाना जाता था.
आरएसएस से संबंध
1977 में उन्होंने बीरभूम में आरएसएस के बनवासी कल्याण आश्रम के लिए काम करना शुरू किया था.
उन्होंने पुरुलिया में काम किया, क़रीब दो दशक तक मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सक्रिय रहे.
पुलिस के मुताबिक, असीमानंद वर्ष 1995 में गुजरात के डांग जिले के मुख्यालय आहवा आए और हिंदू संगठनों के साथ 'हिंदू धर्म जागरण और शुद्धिकरण' का काम शुरू किया.
यहीं उन्होंने शबरी माता का मंदिर बनाया और शबरी धाम स्थापित किया.
असीमानंद आदिवासी बहुल इलाक़ों में हिन्दू धर्म का प्रसार करने और 'आदिवासियों को ईसाई बनने' से रोकने में लगे थे. मक्का मस्जिद धमाके की जांच के दायरे में आने के अलावा असीमानंद का नाम अजमेर, मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस धमाके में भी अभियुक्त के तौर पर आया था.
कबूलनामा
मार्च 2017 में एनआईए की अदालत ने 2007 के अजमेर विस्फोट में सबूतों के अभाव में असीमानंद को बरी कर दिया था. दिल्ली के तीसहज़ारी कोर्ट में 2010 में एक मेट्रोपॉलिटन जज के सामने असीमानंद ने धमाका करने की बात स्वीकार की थी.
उन्होंने कहा था कि वो अन्य साथियों के साथ अजमेर शरीफ़, हैदराबाद की मक्का मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव धमाके में शामिल थे. उन्होंने कहा था कि यह हिंदुओं पर मुसलमानों के हमले का बदला था.
42 पन्नों के इक़बालिया बयान में असीमानंद ने इस धमाके में कई उग्र हिन्दू नेताओं के साथ होने की बात कही थी. इसमें उन्होंने आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार, संघ के प्रचारक सुनील जोशी और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर का नाम लिया था. सुनील जोशी की 29 दिसंबर, 2007 में मध्य प्रदेश के देवास में गोली मार हत्या कर दी गई थी.
असीमानंद ने कहा था कि सभी इस्लामिक आतंकी हमले में 'बम का जवाब बम' होना चाहिए.
अपने गुनाह कबूलने के दौरान असीमानंद ने कहा था कि उन्होंने हैदराबाद की मक्का मस्जिद को इसलिए चुना था क्योंकि वहां के निज़ाम पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे. हालांकि बाद में उन्होंने एनआईए की अदालत में कहा कि उन्हें प्रताड़ित किया गया था इसलिए डरकर उन्होंने ऐसा बयान दिया था.
दो केसों में बरी हो जाने के बाद असीमानंद अब केवल समझौता एक्सप्रेस धमाके में ही अभियुक्त हैं. समझौता एक्सप्रेस के दो कोचों में 19 फ़रवरी, 2007 को धमाका हुआ था, जिसमें 68 लोग मारे गए थे. इनमें से ज़्यादातर पाकिस्तानी थे जो नई दिल्ली से लाहौर जा रहे थे.
इस मामले में पंजाब और हरियाणा कोर्ट ने 2014 में असीमानंद को ज़मानत दे दी थी.
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