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एकनाथ खडसे के NCP में शामिल होने से महाराष्ट्र में BJP को कितना नुकसान, जानिए

नई दिल्ली- करीब चार दशक तक महाराष्ट्र जनसंघ और भाजपा के कद्दावर चेहरा रहे एकनाथ खडसे आज औपचारिक तौर पर मराठा लीडर शरद पवार की एनसीपी में शामिल हो चुके हैं। खडसे बीजेपी में तभी से परेशान चल रहे थे, जब से 2016 में जमीन घोटाले के आरोपों के चलते उन्हें देवेंद्र फडणवीस सरकार से बाहर होना पड़ा था। भाजपा सरकार में राजस्व मंत्री से लेकर विधानसभा में नेता विपक्ष की भूमिका तक निभा चुके खडसे का बीजेपी से निकलना पार्टी के लिए मामूली झटका नहीं है और उनसे पवार काफी सियासी फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं। हो सकता है कि आने वाले दिनों में खडसे की सत्ता से चार साल की निजी दूरी भी मिट जाए और वह भी उद्धव सरकार की शोभा बढ़ाएं। वैसे खडसे ने भाजपा छोड़ने का सारा ठीकरा नेता विपक्ष फडणवीस पर ही फोड़ा है और उनका जीवन और पॉलिटिकल करियर तबाह करने का आरोप लगाया है, लेकिन उनका भाजपा से मोहभंग हुआ तो पार्टी की सेहत के लिए भी कम नुकसानदेह नहीं है।

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    एकनाथ खडसे का बीजेपी छोड़ना वैसे कोई हैरानी वाली बात नहीं है। वह प्रदेश नेतृत्व खासकर देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ पिछले कई महीनों से लगातार हमलावर हो रहे थे। लेकिन, जिस नेता ने जनसंघ के जमाने से पार्टी को खड़ा किया हो और विधानसभा में 1989 से 6 बार बीजेपी का प्रतिनिधित्व किया हो, उसका इस तरह से निकलकर विरोधी खेमे में चले जाना सामान्य घटना नहीं है। खडसे उत्तर महाराष्ट्र के प्रभावी और जमीन से जुड़े नेता हैं, जिसमें मध्य प्रदेश और गुजरात से जुड़े जलगांव, धुले और नंदूरबार जैसे जिले शामिल हैं। उनकी अपील इलाके से बाहर के जिलों में भी है। इस इलाके में पवार की पार्टी बहुत कमजोर रही है। जबकि, भाजपा, शिवसेना और कांग्रेस यहां मजबूत है। खडसे जलगांव से आते हैं, जिसके नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। माना जा रहा है कि खडसे के जाने से एनसीपी को इस इलाके में बीजेपी की कीमत पर मजबूती मिल सकती है। इस क्षेत्र से पवार की पार्टी का एक भी सांसद नहीं है और 11 विधानसभा सीटों में सिर्फ 1 (अमलनेर) सीट उसके पास है।

    खडसे लेवा पाटिल समुदाय से आते हैं, जिनका महाराष्ट्र के इन तीनों जिलें में जबर्दस्त मौजूदगी है। चार दशकों की राजनीति में उन्होंने यहां जमीन पर अपनी खास पकड़ बना रखी है। जलगांव के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि खडसे के पवार के साथ आने से उत्तर महाराष्ट्र की सीटें सत्ताधारी महा विकास अघाड़ी के लिए अजेय दुर्ग साबित हो सकती हैं और इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है। एक वरिष्ठ एनसीपी नेता अंकुश काकडे की मानें तो ना सिर्फ बीजेपी कार्यकर्ता, बल्कि खडसे के नजदीकी पार्टी के दो बड़े नेता भी एनसीपी के साथ संपर्क में हैं। खुद खडसे का कहना है कि, 'कम से कम 14-15 पूर्व एमएलए मेरे साथ संपर्क में हैं। और कई मौजूदा एमएलए भी पार्टी छोड़ना चाहते हैं, लेकिन दल-बदल विरोधी कानून के डर से रुके हुए हैं।'

    खडसे के निकलने से महाराष्ट्र बीजेपी ने एक बढ़िया वक्ता भी गंवा दिया है, जो लोगों को किसी भी मौके पर रोक के रख सकते हैं। विधासभा के अंदर और बाहर वह अपने भाषणों के लिए जाने जाते हैं। आने वाले दिनों में पार्टी और खासकर फडणवीस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उन्होंने अभी से कहना शुरू किया है कि मेरे खिलाफ ईडी को लगाया तो मैं सीडी लेकर आ जाऊंगा। खडसे एनसीपी के लिए नारायण राणे जैसे पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राज्यसभा सांसद के लिए भी काट साबित हो सकते हैं, जो सनसनीखेज टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, जबकि खडसे की छवि गंभीर राजनेता की रही है।

    खडसे महाराष्ट्र के एक महत्वपूर्ण ओबीसी नेता माने जाते हैं। ओबीसी राज्य की आबादी में ये 19 फीसदी हैं। इस तरह से भाजपा के ओबीसी वोट बैंक के लिए यह एक बड़े झटके से कम नहीं है। खडसे की बेटी रोहिणी खडसे 2019 का विधानसभा चुनाव अपने पिता की मुक्ताइनगर सीट हार गई थीं। वह भी एनसीपी की घड़ी थाम चुकी हैं। वह जलगांव डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन भी हैं। खडसे की पत्नी मंदाकिनी जो महानंदा मिल्क कोऑपरेटिव की चेयरपर्सन हैं, उन्होंने भी एनसीपी ज्वाइन की है। लेकिन, उनकी बहू रक्षा खडसे अभी रावेल सीट से भाजपा सांसद हैं।

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