जगदीप धनखड़ से कितने अलग हैं 'होने वाले उपराष्ट्रपति' सीपी राधाकृष्णन, BJP ने कैसे अपने फैसले से किया सरप्राइज
CP Radhakrishnan: जगदीप धनखड़ को दो साल पहले जब उपराष्ट्रपति बनाया गया था, तब विपक्ष ने उन पर संवैधानिक पद की निष्पक्षता तोड़ने का आरोप लगाया था। धनखड़ अपने तेज-तर्रार और टकराव वाले स्वभाव के लिए जाने जाते थे। वहीं अब बीजेपी ने जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर सीपी राधाकृष्णन को चुना है, जिनकी छवि एकदम विपरीत बताई जा रही है।
सीपी राधाकृष्णन को रणनीतिक और पैन-साउथ लीडर माना जा रहा है, जिनकी जड़ें जनसंघ से जुड़ी हुई हैं। यह छवि जगदीप धनखड़ से बिल्कुल अलग है, जिनकी पहचान जाट-केंद्रित और बाहरी नेता के तौर पर थी। राधाकृष्णन को संयमी और सर्वसमावेशी माना जाता है, जबकि धनखड़ की छवि तेजतर्रार और आवेगपूर्ण थी।

इतना ही नहीं उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर सीपी राधाकृष्णन को चुनकर भाजपा ने सबको अपने फैसले से फिर से चौंका दिया है। मीडिया रिपोर्ट में जिन सात-आठ नेताओं के नाम उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए चल रहे थे उनमें से किसी को मौका नहीं मिला। रिपोर्ट में थावरचंद गहलोत, ओम माथुर, मनोज सिन्हा, हरिवंश नारायण सिंह, आचार्य देवव्रत, वीके सक्सेना, शेषाद्रि चारी जैसे दिग्गज नेताओं का नाम उपराष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए चल रहा था। संसद में नंबर गेम के मामले में NDA के पलड़ा भारी है। तो ऐसे में पूरी संभावना है कि देश के अगले उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ही हो।
🔴 जगदीप धनखड़ से कितने अलग हैं सीपी राधाकृष्णन?
🔹 जगदीप धनखड़: जाट समुदाय को साधने के लिए 2022 में चुने गए। धनखड़ एक आक्रामक वकील और बेबाक राजनेता, अपनी तेज और टकराव वाली शैली के लिए जाने जाते थे।
🔹 राधाकृष्णन: तमिलनाडु से, आरएसएस और जनसंघ से लंबे समय से जुड़े। दक्षिण भारत में पार्टी का विस्तार कराने के लिए बेहतर विकल्प। स्वभाव से संयमी और सर्वसमावेशी।
🔹 धनखड़ को राज्यसभा में लाने को बीजेपी का यह संदेश माना गया था कि पार्टी वहां एक "कड़े प्रवर्तक" (tough enforcer) भेज रही है। लेकिन जल्दी ही विपक्ष ने उन्हें एक पक्षपाती चेहरा के रूप में देखना शुरू कर दिया।
🔹 इस बार तस्वीर अलग है। राधाकृष्णन को चुना गया है, जिनका स्वभाव संवैधानिक पद की गरिमा के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है। यह भी संकेत है कि अब राज्यसभा को आक्रामकता नहीं, बल्कि संतुलन की जरूरत है।
🔹 राज्यसभा के सभापति के तौर पर धनखड़ अपने तीखे हस्तक्षेपों, कानूनी दलीलों और टकराव वाली शैली के लिए जाने जाते थे। इससे सदन में आम सहमति बनाना मुश्किल हो जाता था। वहीं संसद के सुचारू संचालन के लिए ऐसी शख़्सियत की जरूरत होती है जो तनाव को शांत कर सके। इसी कारण राधाकृष्णन को बेहतर विकल्प माना जा रहा है।
🔹 धनखड़ की राजनीति को जाति और क्षेत्र तक सीमित माना गया, वहीं राधाकृष्णन को राष्ट्रीय समावेशिता बढ़ाने वाला चेहरा कहा जा रहा है।

🔴 राजनीति का बदलता सिग्नल
🔹 धनखड़ को 2022 में उस समय चुना गया था जब जाट आंदोलन चल रहा था। यह संदेश देने के लिए कि जाट समुदाय भी राष्ट्रीय सत्ता ढांचे का हिस्सा है और उनकी आवाज सुनी जाती है।
🔹 राधाकृष्णन को आगे कर बीजेपी ने साफ कर दिया है कि पार्टी दक्षिण भारत में अपनी पकड़ मजबूत करने और ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग पर दांव लगाने जा रही है। राधाकृष्णन की नियुक्ति बीजेपी की ओबीसी सोशल इंजीनियरिंग पर भरोसे और दक्षिण भारत में विस्तार की योजनाओं को मजबूत करने का संकेत देती है - जहां कर्नाटक को छोड़कर अभी तक पार्टी अपनी पकड़ नहीं बना सकी है।
🔴 धैर्य बनाम टकराव
🔹 धनखड़: संसद में कानूनी दलीलों और तेज हस्तक्षेपों के लिए मशहूर रहे। विपक्ष ने उन्हें 'पक्षपाती चेहरा' बताया। उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल रहते हुए ममता बनर्जी सरकार से लगातार टकराव के कारण सुर्खियां मिलती रहीं।
🔹 राधाकृष्णन: संतुलित व्यक्तित्व, विवादों से दूरी और संवाद की क्षमता। उन्हें 'कंसेंसस कैंडिडेट' के रूप में देखा जा रहा है।
🔹 राधाकृष्णन ने कई मौकों पर केंद्र का समर्थन किया है। हाल ही में उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से राजनीतिक संवाद किया और उदयनिधि स्टालिन के सनातन धर्म वाले बयान पर उन्हें "बच्चा" कहकर नजरअंदाज कर दिया।
🔹 महाराष्ट्र में भी वे सक्रिय रहे और विपक्ष ने विवादास्पद पब्लिक सिक्योरिटी बिल पर राज्यपाल को हस्ताक्षर न करने की अपील भी उनसे की। लेकिन उनके हस्तक्षेप हमेशा उनके संवैधानिक अनुभव और वैचारिक जुड़ाव पर आधारित रहे, जबकि धनखड़ अक्सर विवादों में घिर जाते थे।
कुल मिलाकर आप ये कह सकते हैं कि धनखड़ की आक्रामक छवि की जगह अब बीजेपी ने राधाकृष्णन की संतुलित और सर्वसमावेशी छवि पर दांव लगाया है। यह बदलाव सिर्फ चेहरों का नहीं बल्कि बीजेपी की राजनीति के स्वभाव का भी बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है।

🔴 सीपी राधाकृष्णन की खासियत
🔹 राधाकृष्णन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनका रिश्ता बीजेपी के वैचारिक मार्गदर्शक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से बेहद गहरा है। वे 17 साल की उम्र से ही जनसंघ और आरएसएस से जुड़े रहे हैं।
🔹 राधाकृष्णन की एक और अहम खासियत यह है कि वे किसी राजनीतिक बोझ के साथ नहीं आते और उन्हें संभावित कंसेंसस कैंडिडेट के रूप में देखा जा रहा है।
🔹 डीएमके के खिलाफ रणनीतिक तरीके से बीजेपी का पक्ष रखा, लेकिन बिना अनावश्यक टकराव के। महाराष्ट्र में भी संवैधानिक मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई।
🔴 सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर (CP Radhakrishnan Political journey)
👉 1974: राज्य कार्यकारिणी सदस्य, भारतीय जन संघ
👉 1996: सचिव, भाजपा, तमिलनाडु
👉 1998-1999: सांसद, कोयंबटूर लोकसभा क्षेत्र
👉 1999-2004: सांसद, कोयंबटूर लोकसभा क्षेत्र
👉 2004: संयुक्त राष्ट्र (UN) के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा
👉 2004-2007: राज्य अध्यक्ष, भाजपा, तमिलनाडु
👉 2014: ताइवान के पहले संसदीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य
👉 2016-2020: अध्यक्ष, ऑल इंडिया कॉयर बोर्ड
👉 2020-2022: राज्य प्रभारी (प्रभारी), केरल
👉 2023-2024: राज्यपाल, झारखंड
👉 2024: राज्यपाल, तेलंगाना और पुडुचेरी के उपराज्यपाल
👉 2024-वर्तमान: राज्यपाल, महाराष्ट्र
👉 2025: एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार
🔴 जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा
संसद के इस सत्र के पहले ही दिन जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से 21 जुलाई 2025 को इस्तीफा दे दिया। आधिकारिक तौर पर कारण स्वास्थ्य बताया गया, लेकिन सूत्रों का कहना है कि विपक्ष के प्रस्ताव पर बिना सरकार को बताए जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग स्वीकार करना ही असली वजह बनी।
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