अयोध्या मसले पर कैसे एकमत हुए पांचों न्यायाधीश, अगले CJI एसए बोबडे ने ये बताया

नई दिल्ली- देश के अगले चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति एसए बोबडे ने अयोध्या विवाद आए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद कहा है, इसका सबसे महत्वपूर्ण संदेश ये है कि अब विवाद खत्म हो गया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई में अयोध्या पर फैसला देने वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में जस्टिस बोबडे भी एक सदस्य थे। ऐसे में फैसले के बाद उनकी बातें बेहद अहम हो जाती हैं और खासकर इसलिए भी कि वे देश के अगले मुख्य न्यायधीश भी बनने जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि पांचों जजों ने इतने महत्वपूर्ण केस में कैसे एकमत से फैसला सुनाया है। उन्होंने जजों की नियुक्ति से लेकर अदालतों में कारोबार से जुड़े मामलों के अंबार को लेकर अपना नजरिया देश के सामने रखा है।

अयोध्या केस पर ऐसे आया एकमत से फैसला

अयोध्या केस पर ऐसे आया एकमत से फैसला

देश के अगले चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने ईटी को दिए एक इंटरव्यू में अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कई अहम बातें बताई हैं। उन्होंने कहा है कि संविधान पीठ के सभी पांच सदस्य इस बात पर पूरी तरह सहमत थे कि फैसला एकमत से ही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी सहमत थे; और जब सबके विचार समान होते हैं तो एक उसको लिख देता है। इसे हमेशा कोर्ट का फैसला माना जाता है। उन्होंने इसके बारे में इससे ज्यादा नहीं बताया। जस्टिस बोबडे ने माना है कि उन्होंने अभी तक जितने भी मुश्किल मुकदमों की सुनवाई की है, उसमें से ये उनके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है।

लॉ एंड ऑर्डर की भी चिंता थी

लॉ एंड ऑर्डर की भी चिंता थी

अगले चीफ जस्टिस ने फैसले से ठीक पहले चीफ जस्टिस गोगोई के यूपी के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी से मुलाकात के बारे में कहा है कि यह बड़ा काम था, इसलिए उन्हें चिंता थी। लेकिन, उन्होंने ये भी कहा कि सभी जज इस बात को लेकर संतुष्ट थे कि उन्होंने बेहतर फैसला दिया है। जब उनसे ये पूछा गया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अगर एक संदेश पूछा जाय तो वह क्या है? इसपर उन्होंने जवाब दिया कि इस फैसले का संदेश ये है कि विवाद खत्म हो गया है।

नियुक्तियों में सरकार अहम स्टेकहोल्डर

नियुक्तियों में सरकार अहम स्टेकहोल्डर

अगले सीजेआई ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है कि सरकार परोक्ष रूप से नियुक्तियों और दूसरे प्रस्तावों को प्रभावित करने की कोशिश करती है। उन्होंने साफ कहा कि यह सही नहीं है। सैकड़ों-हजारों नियुक्तियां बिना किसी गतिरोध के होती हैं। सरकार एक महत्वपूर्ण स्टेकहोल्डर है। वह सिर्फ रबड़ स्टांप नहीं है। नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति के पास है, इसलिए आप सरकार के रोल को कम नहीं कह सकते। अलबत्ता विभिन्न फैसलों के अनुसार जजों को चुनने में जजों को प्राथमिकता है और नामों की शुरुआत कोर्ट से ही होनी चाहिए।

चीफ जस्टिस के रूप में क्या प्राथमिकता रहने वाली है?

चीफ जस्टिस के रूप में क्या प्राथमिकता रहने वाली है?

अदालतों में लंबित पड़े मुकदमों के बारे में उन्होंने कहा है कि यह कुछ न कुछ हमेशा रहेगी। न्यायिक प्रक्रिया में वक्त लगता है और तत्काल न्याय देने के भी नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। इसलिए, इसमें न तो बेवजह की जल्दीबाजी होनी चाहिए और न ही बेवजह की देरी ही होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था के लिए ये बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। जब न्यायपालिका से जुड़े हालिया विवादों के बारे में उनसे पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे ऐसा नहीं सोचते कि इसकी विश्वसनीयता खत्म हुई है। उन्होंने अपने बारे में बताया कि वे तो सुनते हैं कि न्यायपालिका अच्छा कर रही है, लोगों को जब भी जरूरत पड़ती है वह न्यायपालिका का रुख करते हैं। जस्टिस बोबडे से जब चीफ जस्टिस के तौर पर उनकी प्राथमिकता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा न्यायपालिका का एक ही लक्ष्य हो सकता है और वह है न्याय देना और सभी प्राथमिकताएं इसी में शामिल हैं।

कारोबार से जुड़े मसलों में मध्यस्थता पर जोर

कारोबार से जुड़े मसलों में मध्यस्थता पर जोर

कारोबार से जुड़े मुकदमों के बारे में उनका कहना है कि अदालतों में अब कॉमर्शियल डिविजन भी हैं। कारोबारी मामलों से निपटने के लिए मुकदमों से पहले मध्यस्थता का रास्ता अपनाने का भी प्रावधान है। ऐसे सभी मामलों को अदालतों में लाने से पहले मुकदमें से पूर्व मध्यस्थता के लिए भेजा जा सकता है। जब फिर भी मामला नहीं निपटता है तो अदालतों के पास जाया जा सकता है। जब उनसे सवाल हुआ कि वह इसे कैसे लागू करेंगे तो उनका कहना है कि इसके लिए कुछ वैधानिक आधार तैयार करनी पड़ेगी। हालांकि, उन्होंने ये भी कहा है कि अभी भी लोक अदालतों का प्रावधान है जो इन मुकदमें से पूर्व मध्यस्थता को लागू करा सकती हैं।

नेशनल ज्यूडिशियल सर्विस एक अच्छा विचार

नेशनल ज्यूडिशियल सर्विस एक अच्छा विचार

जस्टिस बोबडे ने सरकार की नेशनल ज्यूडिशियल सर्विस प्रस्ताव को अच्छा विचार बताया है। हालांकि, उनके मुताबिक इसके लिए नेशनल डिफेंस एकैडमी की तर्ज पर जजों को प्रशिक्षण देने के लिए एक विशेष संस्थान की जरूरत पड़ेगी। जजों को संबंधित राज्यों के स्थानीय कानूनों और भाषाओं की भी जानकारी देनी पड़ेगी। जस्टिस ने कहा कि जब आईएएस की पूरे देश में पोस्टिंग हो सकती है तो जुडिशियल सर्विस की क्यों नहीं ? यह राष्ट्रीय एकता के हिसाब से भी जरूरी है।

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