भारत की 'उदार अर्थव्यवस्था' में दलितों के आगे बढ़ने में जाति कितनी बड़ी दीवार?

उदारीकरण में मजदूर
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उदारीकरण में मजदूर

1991 में उस समय के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की शुरुआत की थी. इसके साल भर के भीतर 1992 में महाराष्ट्र के एक दलित उद्यमी अशोक खाड़े ने अपनी कंपनी 'डीएएस ऑफ़शोर इंजीनियरिंग प्राइवेट लिमिटेड' लॉन्च की.

अब उदारीकरण के तीन दशक बाद, ये दोनों अपने क्षेत्रों में ऊँचे मुक़ाम पर खड़े हैं. ऑफ़शोर स्ट्रक्चर (समुद्र के किनारे बनने वाली संरचना) खड़ा करने के क्षेत्र में आज डीएएस ऑफ़शोर ने दुनिया में अपना नाम बना लिया है. वहीं अशोक खाड़े दलित समुदाय के पहले और अपने दम पर आगे बढ़ने वाले चुनिंदा उद्यमियों में से एक हैं.

मुंबई के मझगाँव डॉकयार्ड में काम करते वक़्त उन्होंने छोटी उम्र में ही ख़ुद की कंपनी बनाने का सपना देखा था. उस सपने की ओर उनका पहला कदम तब बढ़ा, जब देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया गया.

उदारीकरण के आज 30 साल बाद, खाड़े भी मानते हैं कि इस फ़ैसले से उन्हें काफ़ी मदद मिली. ओपेन मार्केट इकोनॉमी, लाइसेंस राज के ख़त्म होने और प्रतिस्पर्धा से भरी अर्थव्यवस्था में खाड़े को भी अपनी क़िस्मत आज़माने का मौक़ा मिला और वे सफल भी हुए.

लेकिन खाड़े का उदाहरण बताते हुए क्या अब कहा जा सकता है कि उदारीकरण के तीन दशक बाद भारत में जाति के आधार पर मौजूद सामाजिक भेदभाव ख़त्म हो गए?

उच्च जातियों के वर्चस्व वाले कारोबारी वर्ग में पिछले 30 सालों के दौरान उस वंचित समुदाय के लोग प्रवेश पाने में सफल रहे, जिनकी कई पीढ़ियों ने असमान सामाजिक संरचना का सामना किया? और क्या उदारीकरण के पिछले 30 सालों ने देश के दलितों का आर्थिक जीवन बदल दिया?

इसका सीधा जवाब अशोक खाड़े के पास है. वे कहते हैं कि इस दौरान ज़्यादा कुछ नहीं बदला.

खाड़े कहते हैं, "मैंने 10 हजार रुपए की पूँजी से अपना कारोबार शुरू किया था. मेरे पिता मोची थे. अगर मुझे आज एक करोड़ रुपए का टेंडर जमा करना होता, तो 10 लाख की बैंक गारंटी की ज़रूरत पड़ती. लेकिन इतना पैसा मैं कैसे जुटा पाता? उस समय मेरी कोई आमदनी नहीं थी. पिता की आय भी कम थी. ऐसे में मैं इसका इंतजाम नहीं कर सकता. आज भी यह स्थिति जस की तस है.''

उन्होंने कहा, ''अगर किसी के पास अपना घर नहीं है, तो वह उसे गिरवी भी नहीं रख सकता. बैंक उसके प्रपोजल पर विचार ही नहीं करेगा. उसके पास कोई शेयर पूँजी नहीं होगी. कई लोग ऐसी ही स्थिति में फँसे हैं. पिछले 30 सालों में भी यह स्थिति नहीं बदली. हालाँकि छोटे उद्योगों के मामले में एक हद तक बदलाव हुआ है. मैंने ऐसे उदाहरण ज़्यादा नहीं देखे."

'उदारीकरण ने पूरा माहौल बदल दिया'

दलित समाज के 10 हज़ार से अधिक उद्यमियों के संगठन 'दलित इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री' यानी डिक्की के संस्थापक अध्यक्ष, डॉ. मिलिंद कांबले, मानते हैं कि 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत में 'दलित पूँजीवाद को जन्म दिया.

डॉ. कांबले कहते हैं, "1991 से पहले अलग माहौल था. मैं पुणे में रहता हूँ, वहाँ का उदाहरण देता हूँ. 30 साल पहले वहाँ टाटा मोटर्स, बजाज ऑटो जैसे दो या चार बड़े ऑटोमोबाइल उद्योग थे. उस समय यहाँ कुछ चुनिंदा सप्लायर ही थे, जो इन कंपनियों को स्पेयर पार्ट्स दिया करते थे. कोई भी नया सप्लायर इस सिस्टम में घुस नहीं सका."

उन्होंने बताया, ''उदारीकरण के बाद जब बाज़ार खुला, तो फ़ॉक्सवैगन, महिंद्रा और जनरल मोटर्स जैसी कई ऑटोमोबाइल कंपनियाँ पुणे आईं. उसके बाद, नए वेंडर और सप्लायर को कुछ मौक़े मिले. इसमें दलित कारोबारी भी शामिल थे."

डॉ. मिलिंद कांबले का अनुभव सीधा और सरल है. आर्थिक सुधारों के चलते आर्थिक अवसर बढ़े और उसने पहली पीढ़ी के दलित उद्यमियों के लिए दरवाज़े खोल दिए. आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं.

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दलित और आदिवासी वर्गों का अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान
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दलित और आदिवासी वर्गों का अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान

पूरी कहानी

आर्थिक जनगणना से देश के विभिन्न आर्थिक क्षेत्रों में अलग-अलग समुदायों के योगदान का पता चलता है. देश की पाँचवीं आर्थिक जनगणना 2005 में हुई थी. इसके अनुसार ग़ैर-कृषि उद्यमों के मामले में दलित कारोबारियों के पास 9.8 फ़ीसदी, तो आदिवासी उद्यमियों के पास 3.7 फ़ीसदी संस्थानों का ही मालिकाना हक़ था.

छठी आर्थिक जनगणना के दौरान, 2013-14 में दलित कारोबारियों का ये हिस्सा बढ़कर 11.2 फ़ीसदी, तो आदिवासी कारोबारियों के मामले में 4.3 फ़ीसदी हो गया.

ये आँकड़े बताते हैं कि उन 10 सालों में दलित और आदिवासी वर्गों का आर्थिक योगदान अर्थव्यवस्था में बढ़ा था.

उदारीकरण के बाद वंचित समुदायों के बीच कारोबार को लेकर रुचि बढ़ी और दलित करोड़पतियों की तादाद भी बढ़ी. पर ये पूरी कहानी नहीं है.

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हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल की लक्ष्मी अय्यर, तरुण खन्ना और ब्राउन यूनिवर्सिटी के आशुतोष वार्ष्णेय ने 2011 में 'भारत में जाति उद्यमिता' शीर्षक से एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया था. इसमें उन्होंने 1990, 1998 और 2005 की आर्थिक जनगणना पर आधारित अपने तर्क पेश किए थे.

इसमें दलित उद्यमिता पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा, "हमने जो साक्ष्य पेश किए हैं, वे बताते हैं कि ओबीसी ने उद्यमिता में प्रगति की, लेकिन अपना उद्यम खड़ा करने में दलितों और आदिवासियों का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है. पिछले कई दशकों में, दलितों और आदिवासियों को मिले राजनीतिक लाभ से उन्हें उद्यम खड़ा करने में कोई लाभ नहीं मिला."

इस रिसर्च पेपर में उन्होंने यह भी लिखा, "नई आर्थिक आज़ादी के चलते दलित करोड़पतियों के उदय के मामले में दलित या आदिवासी आबादी के व्यापक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व नहीं दिखता. कम से कम 2005 तक तो यही हाल था.''

इसमें आगे लिखा है, ''उन राज्यों में जहाँ ​दलितों और आदिवासियों को लेकर नीतियाँ काफ़ी प्रगतिशील रहीं, वहाँ भी उद्यमों के मालिकाना हक़ के मामले में इन दोनों समुदायों की उचित हिस्सेदारी नहीं बन पाई. उन राज्यों में भी, जहाँ उद्यम के मालिकाना हक़ के मामले में ओबीसी ने काफ़ी प्रगति की और शहरों में, जहाँ गाँवों की तुलना में भेदभाव काफ़ी कम हैं, वहाँ भी यही हाल रहा है.''

दलितों का पलायन
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दलितों का पलायन

दलितों का पलायन

दलितों पर आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव का मतलब केवल उद्योगपतियों और व्यापारियों की कहानियाँ नहीं हैं. क्या इन सुधारों ने देश के गाँवों में आम दलित परिवारों के जीवन को बदल दिया?

इस बारे में हुए तमाम अध्ययन बताते हैं कि सुधारों की इस प्रक्रिया के दो प्रभाव रहे हैं. पहला, नए आर्थिक मौक़ों के चलते दलित परिवारों का गाँवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा. और दूसरा, उनके काम को नई पूँजीवादी व्यवस्था में सम्मान मिला.

चंद्रभान प्रसाद एक मशहूर लेखक, शोधकर्ता और दलित मुद्दों पर काम करने वाले कार्यकर्ता हैं.

इस मसले पर चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, "उत्तर भारत के हज़ारों दलित औद्योगिक इलाक़ों में चले गए. कई सालों तक खेत-मज़दूरों के रूप में काम करने वाले इन परिवारों ने अपनी मज़दूरी बंद कर दी. मुझे लगता है कि आर्थिक आज़ादी के चलते दलितों के प्रवास में तेज़ी आई."

उन्हें लगता है कि नए आर्थिक ढाँचे में पैसा का होना अच्छी जाति से बड़ा हो गया है. जो लोग शहर गए, वहाँ से उन्हें पैसा मिला और तब उन्होंने पुराने काम छोड़ दिए. शहर के काम ने उन्हें सम्मान दिलाया.

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लेकिन इसका क्या ये मतलब है कि उन्हें जाति से छुटकारा मिल सकता है? जानी-मानी विकासवादी अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा ऐसा नहीं मानती.

वे कहती हैं, "गाँव के दमनकारी और जातिवादी माहौल से छुटकारा पाने के लिए, डॉ. आंबेडकर ने लोगों से कुछ करने को कहा. उन्होंने कहा कि गाँव छोड़ दो और शहर चले जाओ, क्योंकि वे आपको गाँव में कभी नहीं रहने देंगे. लेकिन हमारे पास कई ऐसे आँकड़े हैं, जो बताते हैं कि शहरी भारत भी जातिवाद से दूर नहीं है."

रितिका खेड़ा कहती हैं, "यह बात और है कि वहाँ कई मौक़े हैं. शहर आने पर दलितों को कलंकरहित काम मिल जाता है. यह बहुत अच्छी बात है. लेकिन लेबर मार्केट की स्थिति बहुत बेहतर नहीं है. हमने देखा कि पिछले साल जब अचानक लॉकडाउन लगा, तब शहरों में मज़दूरों को कैसे झेलना पड़ा.''

वे आगे कहती हैं, ''इसलिए दलितों के लिए गरिमा वाले तर्क से बहुत अधिक भार जुड़ा हुआ है. इस बारे में मैं किसी दलित विचारक की राय का सम्मान करूँगी, लेकिन एक अर्थशास्त्री होने के नाते मुझे चिंता होगी कि बात केवल इसी पर हो. उन्हें उनके काम के लिए उचित वेतन मिलना चाहिए. लेकिन मुझे नहीं लगता कि अभी ऐसा हो रहा है."

शिव विश्वनाथन
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शिव विश्वनाथन

क्या उदारीकरण ने सामाजिक दोषों को ख़त्म कर दिया?

30 साल पहले लागू हुए आर्थिक सुधारों ने दलितों को अधिक मौक़े दिए. लेकिन क्या इसने सदियों पुराने जातिगत बँटवारे और इसके भेदभाव को बदल दिया? क्या आर्थिक आज़ादी भारत में सामाजिक न्याय लाने में कामयाब हुई?

कई लोगों का मानना ​​है कि इससे केवल कुलीन वर्ग को ही फ़ायदा हुआ. जाने-माने शिक्षाविद शिव विश्वनाथन उनमें से एक हैं.

वे कहते हैं, "उदारीकरण से असंगठित क्षेत्र को कोई लाभ नहीं हुआ. इसने कुछ भ्रष्टाचार ज़रूर कम किया, लेकिन समाजवाद के कई ढाँचे को काट दिया. इससे अभिजात वर्ग को दो तरफ़ा लाभ हुआ, लेकिन किसी और को नहीं. उस मायने में, मुझे नहीं लगता कि उदारीकरण सामाजिक रूप से फ़ायदेमंद रहा."

हालाँकि डॉ. मिलिंद कांबले कहते हैं कि जाति का बंधन अगर कम नहीं हुआ, तो धुंधला ज़रूर हो गया है.

वे कहते हैं, "मैं जो देखता हूँ, उससे ये सब बातें कह सकता हूँ. इस ग्लोबलाइजेशन ने जाति व्यवस्था की दीवारों को हिला दिया. मैं ये नहीं कहूँगा कि जातिवाद का सफ़ाया हो गया, लेकिन इसे कुछ धक्का ज़रूर पहुँचा है."

दलित उद्यमी अशोक खाड़े ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा, "इसे देखने का एक तय तरीक़ा है. मेरा उपनाम खाड़े है, लेकिन मेरे विजिटिंग कार्ड में मेरा नाम 'के अशोक' है. अगर मैं अपना सरनेम इस पर डालता, तो लोग पहचान लेते कि मैं दलित हूँ और वे तुरंत मुझे कमज़ोर कारोबारी मान लेते. देखने का तरीक़ा सब कुछ बदल देता है."

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