कैसे J&K हाई कोर्ट की एक पहल से आसान हुई, इंसाफ तक आम इंसान की पहुंच

नई दिल्ली- पहली बार याचिकाकर्ताओं को पोस्ट ऑफिस और कॉमन सर्विस सेंटरों के जरिए अदालतों में केस दर्ज करवाने की व्यवस्था मिल गई है। इस अनोखे पहल की शुरुआत की है जम्मू और कश्मीर हाई कोर्ट ने। इस व्यवस्था के तहत ऐसे लोग जो जम्मू-कश्मीर या लद्दाख के दूर-दराज इलाकों में रहते हैं और उनका अदालत तक पहुंचना मुश्किल होता है, वे पोस्ट ऑफिसों या कॉमन सर्विस सेंटर के सहायकों की मदद से अदालतों में अपनी अर्जी लगा सकते हैं। मतलब कि अब उन्हें इंसाफ के लिए खुद अदालतों के चक्कर काटने की जरूरत नहीं है, अदालतें उनके दरवाजों पर दस्तक देंगी। क्योंकि, इस व्यवस्था के तहत दूर-दराज के इलाके में कोर्ट कैंप लगाकर मुकदमे की सुनवाई की भी व्यवस्था की जा रही है और जरूरतमंदों को कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने की भी व्यवस्था की गई है।

आम इंसान के दरवाजों पर 'इंसाफ की दस्तक'

आम इंसान के दरवाजों पर 'इंसाफ की दस्तक'

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 'इंसाफ की दस्तक' नाम से जिस कार्यक्रम की शुरुआत की है, वह आने वाले दिनों में देश के दूसरे राज्यों के लिए भी एक नजीर बन सकता है। सोमवार को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस राजेश बिंदल ने इस पहल को लॉन्च किया है। इस कार्यक्रम के तहत अगर किसी को संघ शासित प्रदेश की निचली अदालत में कोई केस करना है तो उसे सिर्फ उस इलाके के पैरा लीगल वॉलेंटीयर से संपर्क करना होगा। वह वॉलेंटीयर इस काम के लिए विशेष तौर पर प्रशिक्षित होगा। वह याचिकाकर्ता से सारे दस्तावेज लेगा और अदालतों में रखे जाने योग्य एक याचिका तैयार करेगा। फिर उसे वह पोस्ट ऑफिस या कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए संबंधित निचली अदालतों में भेज देगा।

ऐसे मामलों को दी जाएगी प्राथमिकता

ऐसे मामलों को दी जाएगी प्राथमिकता

जब संबंधित अदालत को लगेगा कि याचिका विचार के लायक है तो उसका आदेश वापस पोस्ट ऑफिस या सीएससी के जरिए संबंधित याचिकाकर्ता तक पहुंचा दी जाएगी। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, 'निचली अदालत के अधिकार क्षेत्र के अंदर आने वाले संबंधित पोस्ट ऑफिस या मंजूर किए गए सेंटर को केस से संबंधित सारे रिकॉर्ड कंप्यूटर में दर्ज रखने होंगे और साथ ही वो इसके लिए रजिस्टर भी मेंटेन करेंगे और अगर संभव हुआ तो ऐसे मुकदमों की सुनवाई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए भी होगी। यह भी कहा गया है कि ऐसे मुकदमों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जाएगी।' इस व्यवस्था के लिए जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट रूल्स, 1999 और जम्मू और कश्मीर जेनरल रूल्स में संशोधन भी किए हैं।

कानूनी मदद भी मिलेगी

कानूनी मदद भी मिलेगी

इस पहल के तहत न्यायिक अधिकारी दूर-दराज क्षेत्रों का दौरा भी करेंगे और कैंप कोर्ट लगाकर वंचित समुदायों के घर के दरवाजों तक न्याय व्यवस्था पहुंचाएंगे। पिछले साल फरवरी में हाई कोर्ट ने ऐसे 11 कैंप कोर्ट बनाए थे। इस व्यवस्था के तहत जिला और सत्र न्यायधीशों को संबंधित अदालतों के लिए उपयुक्त परिसर, स्टाफ और सुरक्षा का इंतजाम करवाना है। कैंप कोर्ट के जज राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था से भी तालमेल बिठाएंगे। दूर-दराज के इलाके में रहने वाला याचिकाकर्ता चाहे तो अपनी पसंद का वकील भी रख सकता है। एक अधिकारी ने कहा, 'अगर वह चाहता है तो लीगल सर्विस अथॉरिटी या डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी या जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमिटी उसे कानूनी सहायता उपलब्ध करावाएगा। '(कुछ तस्वीरें सांकेतिक)

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