खुलासा : देश में 'मोदी लहर', गुजरात में 'suicide लहर'

भारत के कई गांवों की ही तरह गुजरात के इन इलाक़ों में सिंचाई के पुख़्ता इंतज़ाम नहीं है और नहरें नहीं बनाई गई हैं, इसलिए अच्छी फ़सल के लिए किसान बारिश पर ही निर्भर हैं। कम बारिश की भरपाई के लिए कुंआ खोदकर पानी निकाला जा सकता है लेकिन अगर सरकारी बिजली कनेक्शन न हो तो सिर्फ किसानों के खर्च ही नहीं, दुख-दर्द भी कई गुना बढ़ जाते हैं।
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साल 2012 में ठीक से बारिश नहीं हुई। एक के बाद एक दो बार फ़सल ख़राब हो गई व किसान पर 80,000 रुपए का क़र्ज़ हो गया था, और एक दिन जब गांव वाले उसके खेत से गुजरे तो मजबूर किसान के शरीर को एक पेड़ से झूलते पाया।
क़र्ज़ का फर्ज -
कृषि कारणों से की गई आत्महत्या पर आर्थिक या अन्य सहायता देने की गुजरात सरकार की फ़िलहाल कोई नीति नहीं है। हालांकि दुर्घटना से या अकस्मात हुई मृत्यु पर किसान के परिवार को एक लाख रुपए मुआवज़ा मिलता है।
पिछले साल फ़सल कुछ बेहतर हुई तो किसान थोड़े पैसे चुका पाए। पर अभी भी बहुत बकाया बाक़ी है और बैंक के नोटिस नियमित रूप से आते रहते हैं। सभी की उम्मीदें सरकार पर ही टिकी हैं। किसानों का दर्द बोलता है "हम क्या, आसपास के कितने ही गांवों में उस साल बारिश नहीं हुई, सरकार इन्हें सूखाग्रस्त घोषित कर देती तो कुछ क़र्ज़ माफ़ हो जाता है।"
गुजरात में साल 2003 से 2012 के बीच कितने किसानों ने आत्महत्या की है, इसका साफ़ आंकड़ों, बयानों और दावों के बीच कहीं छिपा है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल 5,874 कहते हैं तो गुजरात सरकार 'एक'।
दरअसल अरविंद केजरीवाल का आंकड़ा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो से लिया गया है जो आत्महत्या करने वालों को व्यवसाय के मुताबिक़ बांटती है, पर आत्महत्या की वजह नहीं बताती।
गुजरात सरकार ये तो मानती है कि किसान आत्महत्या कर रहे हैं पर दावा करती है कि उसकी वजह कृषि से जुड़ी नहीं, बल्कि पारिवारिक और अन्य परेशानियां हैं। यानी किसानों को खेती से जुड़ी इतनी परेशानियां नहीं हैं कि वो अपनी जान ले लें।
सूचना के अधिकार के ज़रिए गुजरात सरकार से आत्महत्या के आंकड़े मांगने वाले आंदोलनकारी भरत सिंह झाला कहते हैं कि सरकार ग़लत कह रही है। गुजरात पुलिस ने उन्हें इस दस साल की अवधि में 692 आत्महत्याओं की जानकारी दी जिनमें से भरत सिंह झाला ने जब 150 मामलों में एफ़आईआर की प्रति निकलवाई तो पाया कि आत्महत्या की वजह ख़राब फ़सल लिखी गई थी।
उनकी आरटीआई के जवाब में जब केन्द्रीय कृषि मंत्रालय ने गुजरात सरकार से आंकड़ा मांगा तो 668 दिया गया और कहा गया कि आत्महत्या की वजहें कृषि से जुड़ी नहीं थीं। कुछ ऐसी ही 'लहर' से जूझ रहा है 'नमो' के राज्य का एक हिस्सा। कहते हैं हकीकत के पर्दे उठते हैं तो दर्द की धूप सीधी चली आती है। कितने ही उसमें झुलस जाते हैं आैर कितनों के लिए वह सुहानी धूप सी होती है।












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