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क्या रायबरेली से कांग्रेस को है हारने का डर, आखिर क्यों गांधी परिवार के गढ़ से नहीं उतर रही प्रियंका गांधी?

Priyanka Gandhi: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने इस बार केरल की वायनाड और उत्तर प्रदेश की रायबरेली दोनों सीट से चुनाव लड़ा और चुनाव में जीत भी दर्ज की। कानून को भी जनप्रतिनिधि एक ही संसदीय सीट पर प्रतिनिधित्व कर सकता है।

लिहाजा राहुल गांधी ने केरल की वायनाड सीट से इस्तीफा देने का फैसला लिया है। साथ ही वह रायबरेली सीट से प्रतिनिधित्व करेंगे। कांग्रेस पार्टी की ओर से इस बात का आज ऐलान किया गया कि राहुल गांधी वायनाड सीट से इस्तीफा देंगे, जबकि उनकी जगह प्रियंका गांधी उपचुनाव में मैदान में उतरेंगी।

rahul gandhi

रायबरेली-अमेठी में जोखिम लेने के मूड में नहीं

हालांकि यह पहले से ही कयास लगाए जा रहे थे कि राहुल गांधी वायनाड की सीट से इस्तीफा देंगे। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि पार्टी अपनी पारंपरिक सीट रायबरेली में किसी भी तरह का कोई जोखिम नहीं लेना चाहती है।

जिस तरह से पिछले लोकसभा चुनाव में अमेठी में राहुल गांधी को हार का मुंह देखना पड़ा था उसके पार्टी की काफी किरकिरी हुई थी। यही वजह है कि राहुल गांधी ने इस बार लोकसभा चुनाव में अमेठी की बजाए रायबरेली सीट से चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

दिनेश सिंह के प्रति असंतोष का मिला कांग्रेस को लाभ

भारतीय जनता पार्टी की ओर से यहां दिनेश सिंह को मैदान में उतारा गया। दिनेश सिंह प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और रायबरेली के स्थानीय नेता हैं। स्थानीय लोगों में दिनेश सिंह को लेकर काफी असंतोष है, जिसका सीधा फायदा राहुल गांधी को मिला और उन्होंने यहां बड़े अंतर से जीत दर्ज की।

भाजपा दे सकती थी चुनौती

भाजपा को रायबरेली में हार के बाद एक बड़ा सबब जरूर मिला कि रायबरेली की ही तरह यहां भी मजबूत उम्मीदवार को मैदान में उतारकर राहुल गांधी को चुनौती दी जा सकती थी, जैसे रायबरेली में स्मृति ईरानी लगातार तीन लोकसभा चुनाव से मैदान में हैं।

हालांकि 2014 में स्मृति ईरानी जीत नहीं सकी थीं, लेकिन 2019 में उन्होंने राहुल गांधी को हरा दिया था। कुछ इसी तरह की रणनीति भाजपा रायबरेली में भी अपना सकती थी।

किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं

ऐसे में कांग्रेस रायबरेली में किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है। पार्टी को इस बात का अंदाजा जरूर रहा होगा कि अगर रायबरेली से इस्तीफा देकर राहुल गांधी वायनाड से सांसद रहते और रायबरेली में फिर से चुनाव होता तो भाजपा यहां कड़ी टक्कर दे सकती है।

उपचुनाव में हो सकता था जोखिम

उपचुनाव में अक्सर सत्ताधारी दल को फायदा होता है। लिहाजा कांग्रेस के आला कमान ने रायबरेली में किसी भी तरह का जोखिम लेने की बजाए वायनाड की सीट को छोड़ने का फैसला लिया।

रायबरेली और अमेठी गांधी परिवार की पारंपरिक सीट है और दोनों ही सीट पर इस बार कांग्रेस पार्टी ने जीत दर्ज की है। लिहाजा पार्टी दोबारा किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है।

वायनाड से प्रियंका की दावेदारी रणनीतिक कदम

दक्षिण भारत में कांग्रेस का वोट बैंक कहीं बेहतर है, लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस पर दक्षिण को नजरअंदाज करने का आरोप लगता है। वायनाड की सीट से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पार्टी को मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ता। ऐसे में पार्टी ने प्रियंका गांधी को यहां से मैदान में उतारकर इन तमाम सवालों पर विराम लगाने का काम किया है।

प्रियंका गांधी जिस तरह से अपने भाषण से मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं, वह पार्टी को मजबूती देने का काम करता है। ऐसे में प्रियंका गांधी अगर वायनाड से चुनाव जीतकर आती हैं तो लोकसभा में पार्टी की आवाज और भी मजबूत होगी।

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