'HE' से हो शिकायत, तो कितना कारगर है 'SHEBOX'

स्वाति अपने सीनियर की हरकतों से परेशान हो चुकी थी. वो उसे बार-बार अपने कैबिन में बुलाते, साथ फिल्म चलने के लिए कहते, अश्लील जोक मारते. एक दिन तो बातों-बातों में वो स्वाति को पोर्न वीडियो दिखाने लगे.

हद पार होने पर स्वाति ने अपने ऑफिस की इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में शिकायत कर दी. तय नियम के मुताबिक कमिटी को तीन महीने में रिपोर्ट देनी थी.

लेकिन चार महीने बीतने पर भी स्वाति के केस की कार्रवाई पूरी नहीं की गई. उसे अपने केस का कोई स्टेट्स नहीं दिया गया.

साथ ही अचानक उसके काम में कमियां निकाली जाने लगी. एक दिन बड़ी गलती बताकर उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

स्वाति का कहना है कि उसे सीनियर के ख़िलाफ़ शिकायत करने की सज़ा मिली है. स्वाति को ये भी नहीं पता कि उसकी शिकायत का क्या हुआ.

अब सवाल उठता है कि सेक्शुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस एक्ट 2013 के तहत कार्यस्थलों पर शिकायतों के निपटारे के लिए समितियां तो बना दी गईं, लेकिन ये सही तरीके से काम कर रही हैं या नहीं, इसे सुनिश्चित कौन करेगा?

यौन उत्पीड़न
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वैसे तो इन समितियों में कार्यस्थल से बाहर के एक व्यक्ति को रखना अनिवार्य है. लेकिन इसके बावजूद भी अगर महिला को समिति की निष्पक्षता पर शक हो, तो उसके पास विकल्प मौजूद है और वो विकल्प है 'शी-बॉक्स.'

अब सबसे पहला सवाल आपके दिमाग में ये आया होगा कि ये 'शी-बॉक्स' क्या है?

शी-बॉक्स यानी सेक्शुअल हैरेसमेंट इलेक्ट्रॉनिक बॉक्स. ये एक तरह की इलेक्ट्रॉनिक शिकायत पेटी है.

इसके लिए आपको http://www.shebox.nic.in/ पर जाना होगा. ये एक ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली है, जिसे महिला और बाल विकास मंत्रालय चलाता है.

आप इस पेटी में अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं. यहां संगठित और असंगठित, निजी और सरकारी सभी तरह के दफ़्तरों में काम करने वाली महिलाएं शिकायत दर्ज करा सकती हैं.

उत्पीड़न
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कैसे काम करता है 'शी-बॉक्स'

सबसे पहले आप http://www.shebox.nic.in/ पर जाएं.

वहां जाकर आप अपनी शिकायत दर्ज कर सकती हैं. वहां आपको दो विकल्प मिलेंगे. आप अपनी नौकरी के हिसाब से सही विकल्प पर क्लिक करें.

उसके बाद आपके सामने एक फॉर्म खुल जाएगा. उस फॉर्म में आपको अपने और जिसके खिलाफ शिकायत कर रही हैं उसके बारे में जानकारी देनी होगी. ऑफिस की जानकारी भी देनी होगी.

पोर्टल पर शिकायत दर्ज होने के बाद महिला और बाल विकास मंत्रालय उसे राष्ट्रीय महिला आयोग को भेज देगा.

आयोग उस शिकायत को महिला के ऑफिस की इंटरनल कंप्लेंट कमिटी या लोकल कंप्लेंट कमिटी (अगर आप 10 से कम कर्मचारियों वाली जगह पर काम करती हैं) को भेजेगा और मामले की रिपोर्ट मांगेगा.

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इसके बाद आईसीसी में जो भी कार्रवाई होगी, उसकी स्थिति को मंत्रालय मॉनिटर करेगा. महिला भी अपने केस के स्टेट्स को उसके ज़रिए देख सकती है. इसके लिए उसे एक यूज़र नेम और पासवर्ड दिया जाएगा, जिसे उसे शी-बॉक्स के पोर्टल पर ही डालना होगा.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा बताती हैं, "हम शिकायतकर्ता की कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट कमेटी से रिपोर्ट मांगते हैं. पूछते हैं कि क्या आपके पास शिकायत आई है. अगर आई है तो आपने अबतक उस शिकायत पर क्या किया है. तीन महीने के अंदर कुछ किया है या नहीं किया है. शिकायत के बाद महिला को परेशान तो नहीं किया गया. ये सारी रिपोर्ट मांगते हैं. आईसीसी की पूरी जांच को हम मॉनिटर करते हैं. अगर महिला कमिटी की जांच से संतुष्ट नहीं है तो हम मामले को पुलिस के पास भेज देते हैं. पुलिस के पास से मामला कोर्ट में जाता है. उसके बाद कोर्ट फैसला करता है. "

"अगर मामला बहुत पुराना है और अब शिकायतकर्ता और अभियुक्त साथ काम नहीं करते तो भी महिला शिकायत कर सकती है. ये मामले आईसीसी में तो नहीं जाएंगे, लेकिन इन्हें हम पुलिस को भेजते हैं. महिला कोर्ट भी जा सकती है. राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मी टू अभियान के बाद महिलाओं के लिए [email protected] बनाई है."

यौन उत्पीड़न
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एम जे अकबर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली एशियन एज की सुपर्णा शर्मा इस तरह की पहल का स्वागत करती हैं.

वो कहती हैं, "अगर केस को कोई बाहर से मॉनिटर करेगा तो बिल्कुल फायदा होगा. अगर किसी महिला ने अपने बॉस के ख़िलाफ शिकायत की है तो उसे सेवगार्ड मिलेगा. लेकिन ज़रूरी ये है कि इस शी-बॉक्स को सही तरीके से हैंडल किया जाए. नहीं तो इतनी हेल्पलाइन शुरू होती है, फिर भी कुछ नहीं होता. इसका भी हश्र ऐसा हुआ तो दुखद होगा."

शी-बॉक्स कब बना

शी-बॉक्स को इसलिए बनाया गया था, ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि कार्यस्थलों पर सेक्शुअल हैरेसमेंट ऐट वर्कप्लेस एक्ट 2013 कानून का सही तरीके से पालन हो.

पिछले साल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चले मी-टू मूवमेंट के बाद शी-बॉक्स को रिलॉन्च किया गया.

महिला और बाल विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2014 से 2018 के बीच शी-बॉक्स में करीब 191 शिकायतें दर्ज की गईं.

लेकिन चार साल में सिर्फ 191 शिकायतें? सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी इसपर सवाल उठाती हैं.

वो कहती हैं कि इससे ज़्यादा महिलाएं तो कुछ दिन पहले शुरू हुए मी टू हैशटैग के ज़रिए सोशल मीडिया पर बोली हैं.

वो कहती हैं कि महिलाओं को शी-बॉक्स के बारे में पता ही नहीं है.

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स्वाति को भी शी-बॉक्स के बारे में कुछ नहीं पता था. स्वाति कहती है कि अगर उसे इस बारे में पता होता तो शायद उसे भी न्याय मिल सकता था.

रंजना कुमारी कहती हैं, "मंत्रालय को शी-बॉक्स के बारे में महिलाओं को बताना चाहिए. उन्हें इस बारे में जानकारी पब्लिक करनी चाहिए कि शी-बॉक्स में किस तरह की शिकायतें आ रही हैं, किस तरह की महिलाएं शिकायत कर रही है. उन शिकायतों का क्या हुआ. इससे दूसरी महिलाओं को भी हिम्मत मिलेगी."

"अगर जानकारी मिलेगी तभी तो सभी महिलाएं शी-बॉक्स में शिकायत डालेंगी. नहीं तो दूसरी हेल्पलाइन, वेबसाइट और स्कीम की तरह ये भी कागज़ों तक रह जाएगी."

भारत के असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाएँ काम करती हैं
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भारत के असंगठित क्षेत्र में बड़ी संख्या में महिलाएँ काम करती हैं

'सिर्फ पढ़ी लिखी महिलाओं के लिए'

मंत्रालय के मुताबिक शी-बॉक्स में हर तरह की महिला शिकायत कर सकती है. लेकिन रंजना का मानना है कि ये सेवा भी पढ़ी-लिखी और अंग्रेज़ी बोलने वाली महिलाओं के लिए है.

उनका कहना है कि देश में बहुत-सी महिलाओं के पास इंटरनेट की पहुंच नहीं है. "मी टू की तरह ये शी-बॉक्स भी अंग्रेज़ी बोलने वाली और पढ़ी लिखी महिलाओं के लिए ही है. लेकिन ये जानना भी ज़रूरी है कि उन पढ़ी-लिखी महिलाओं को भी इससे कुछ फायदा हो रहा है या नहीं."

"सरकार को इस बारे में महिलाओं को जागरूक करना चाहिए. इतने साल से ये शी-बॉक्स की सेवा मौजूद है, लेकिन महिलाओं को इस बारे में पता ही नहीं है."

यौन उत्पीड़न
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शी-बॉक्स को लेकर बेशक महिलाओं में जानकारी का आभाव है, लेकिन राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों पर नज़र डाले तो इस साल एनसीडब्ल्यू में यौन-उत्पीड़न के करीब 780 मामले दर्ज कराए गए हैं.

देश की आबादी के अनुपात में देखा जाए तो ये आंकड़ा बेहद कम नज़र आता है. तो क्या इसे जानकारी का आभाव माना जाए कि महिलाएं अब भी शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.

सुपर्णा शर्मा कहती हैं, "हमारे सिस्टम की सुस्ती भी एक वजह है और ये भी सच है कि अब भी कई महिलाओं ने चुप्पी नहीं तोड़ी है. उन्हें हिम्मत देने के लिए पहले सिस्टम को दुरुस्त करना होगा."

उत्पीड़न पर राजनाथ सिंह
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उत्पीड़न पर राजनाथ सिंह

ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स

केंद्र सरकार ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया है. यह समूह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बने कानून की समीक्षा करेगा. साथ ही तीन महीने के अंदर महिला सुरक्षा को और बेहतर करने के लिए सुझाव देगा.

राजनाथ सिंह के अलावा इस जीओएम में निर्मला सीतारमण, मेनका गांधी और नितिन गडकरी भी होंगे.

सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी इस ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स को आईवॉश बताती हैं. वो कहती हैं, "इसका कोई मतलब ही नहीं है. आप या तो इस सब को डाइल्यूट करना चाह रहे हैं. जो सरकारी रवैया दिखाई पड़ रहा है, उससे साफ है कि सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो वादे चुनाव में किए थे, वो उसमें संवेदनशील नहीं दिखाई पड़ी. इस तरह के ग्रुप बनाने के बजाए सरकार को कानून का फ्रेमवर्क सार्वजनिक करना चाहिए और जनता से राय मांगनी चाहिए."

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