अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान, चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी में क्या भारत अलग-थलग पड़ गया है?

भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में अहम भूमिका निभाई लेकिन तालिबान के साथ रिश्ते को लेकर कोई साफ़ संकेत नहीं दिया है. वहीं पाकिस्तान और चीन ने तालिबान को लेकर गर्मजोशी दिखाई है.

मोदी और अशरफ़ ग़नी
Mohd Zakir/Hindustan Times
मोदी और अशरफ़ ग़नी

भारत के अफ़ग़ानिस्तान की सरकारों के साथ काफी अच्छे रिश्ते रहे हैं. राष्ट्रपति चाहे हामिद करज़ई रहे हों या फिर अशरफ़ ग़नी अफ़ग़ानिस्तान और भारत के बीच गर्मजोशी साफ़ दिखाई देती रही लेकिन काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद भारत अफ़ग़ानिस्तान के साथ अपने रिश्तों को सतर्कता के साथ जांच परख रहा है. भारत सरकार और अहम अधिकारियों ने इस मामले में लगभग चुप्पी साधी हुई है. इस मामले में सिर्फ़ विदेश मंत्रालय ने बयान दिया है. विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, "भारत अफ़ग़ानिस्तान के घटनाक्रम पर करीबी नज़र बनाए हुए है." मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि तालिबान चाहता है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में विकास के काम जारी रखे. दूसरी तरफ़, भारत सरकार ने अपने दूतावास कर्मियों को वापस बुला लिया है. भारत ने अब तक अफ़ग़ानिस्तान को लेकर भविष्य की अपनी योजनाओं को सामने नहीं रखा है.

भारत की एक तात्कालिक चिंता पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा, हिज़बुल मुजाहिदीन और लश्कर-ए-झांगवी जैसे भारत विरोधी चरमपंथी समूहों के साथ तालिबान की कथित नजदीकी को लेकर बताई जाती है. लंबे वक़्त की बात की जाए तो पाकिस्तान के सहयोग से चीन के साथ तालिबान के मजबूत होते रिश्ते भारत के लिए बड़ी चिंता की वजह साबित हो सकते हैं.

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तालिबान को लेकर भारत का रुख

भारत ने अभी तक सार्वजनिक तौर पर ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वो तालिबान सरकार को मान्यता देगा या नहीं. अंग्रेज़ी अख़बार 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने 18 अगस्त की एक रिपोर्ट में लिखा कि भारत ख़ुद को "लोकतांत्रिक देशों के फ़ैसले के साथ रखेगा." अख़बार ने ये भी लिखा कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं और क्या वो इस्लाम के 'कड़े' क़ानून लागू करते हैं, ये देखना भी अहम रहेगा. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 19 अगस्त को हुई मीटिंग में अफ़ग़ानिस्तान के हालात के मद्देनज़र आंतकवाद के ख़तरे पर चर्चा हुई. इसमें भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, "आतंकवाद को लेकर ज़ीरो टॉलरेंस दिखाना ज़रूरी है. इस मामले में दोहरे मापदंड नहीं होने चाहिए. किसी को छूट नहीं मिलनी चाहिए."

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हालांकि, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ये साफ़ नहीं किया कि तालिबान को लेकर भारत का संभावित रुख क्या होगा. इसके पहले मीडिया में रिपोर्टें आईं थीं कि भारत दोहा में बैक चैनल डिप्लोमैसी के जरिए तालिबान से बात कर रहा है. लेकिन, तालिबान के काबुल पर कब्ज़ा करने के कुछ दिन पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत ताक़त के दम पर अफ़ग़ानिस्तान में आए नतीजे को मंजूर नहीं करेगा. उन्होंने 29 जुलाई को संसद में कहा, "अफ़ग़ानिस्तान पर ताक़त के दम पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकता." दूसरी तरफ़, चीन और पाकिस्तान तालिबान के साथ गर्मजोशी से पेश आ चुके हैं लेकिन भारत के लिए फिलहाल ऐसा करने की संभावना कम ही दिखती है. ख़ासकर अतीत में भारत का तालिबान को लेकर जो अनुभव रहा है, उसे देखते हुए तो यही लगता है.

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भारत के सामने संभावित ख़तरे

भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ रिश्ते गर्मजोशी भरे नहीं हैं. इन दोनों देशों के तालिबान के साथ करीबी रिश्ते हैं. इस बीच अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति भारत के लिए चिंता का मामला हो सकती है. तालिबान ने भरोसा दिया है कि वो अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल किसी दूसरे देश के ख़िलाफ़ गतिविधि चलाने के लिए नहीं होने देगा लेकिन मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि भारत का तालिबान के साथ पिछला अनुभव सुखद नहीं रहा है. मीडिया रिपोर्टों में याद दिलाया गया है कि साल 1999 में पाकिस्तान के जो चरमपंथी एयर इंडिया के विमान का अपहरण करके उसे अफ़ग़ानिस्तान ले गए थे, उनके साथ तालिबान का संपर्क था. भारत ख़ुद पर हुए कई हमलों के लिए पाकिस्तान स्थित जिन चरमपंथी समूहों को जिम्मेदार बताता रहा है, तालिबान के उनके साथ करीबी रिश्तों की चर्चा होती है.

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हिंदुस्तान टाइम्स ने 20 अगस्त को एक रिपोर्ट छापी थी. इसमें बताया गया था कि तालिबान ने हालिया दिनों में भारत से संपर्क साधा है और अफ़ग़ानिस्तान में राजनयिक संपर्क बनाए रखने की गुजारिश की है. हालांकि, भारत ने सिर्फ़ कोरे 'ज़ुबानी जमा ख़र्च' को भाव नहीं देने का फ़ैसला किया है. ख़ुफिया रिपोर्टों में बताया गया है कि काबुल में तालिबान के लड़ाकों के साथ पाकिस्तान के भारत विरोधी चरमपंथी भी मौजूद हैं. भारत के कई समाचार समूहों का आकलन है कि भारत के अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते हैं और अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के साथ अच्छे संपर्क रहे हैं. ऐसे में अब वहां भारत के प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान और चीन की मजबूत उपस्थिति हो सकती है.

वेबसाइट मनी कंट्रोल डॉटकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक भारत को अब अमेरिका के साथ अपनी निकटता की कीमत चुकानी होगी. इस रिपोर्ट में कहा गया है पाकिस्तान और चीन का अब असर बढ़ा है और वो भारत के दखल को कम से कम करना चाहेंगे.

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अफ़ग़ानिस्तान में भारत के निवेश का क्या होगा?

भारत ने बीते दो दशक के दौरान अफ़ग़ानिस्तान में आधारभूत ढांचा खड़ा करने पर तीन अरब डॉलर निवेश किया है. इन परियोजनाओं में बांध, स्कूल और अस्पताल के अलावा अफ़ग़ानिस्तान के संसद भवन का निर्माण शामिल है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक हर साल औसतन साढ़े तीन हज़ार से ज़्यादा अफ़ग़ान नागरिक भारत में ट्रेनिंग और शिक्षा हासिल करते हैं. कई छात्र स्ववित्त पोषित आधार पर पढ़ाई करते हैं. भारत ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के उपक्रम तैयार करने में मदद की है. तालिबान के क़तर स्थित प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने अफ़ग़ानिस्तान में भारत की ओर से की गई मानवीय मदद की सराहना करते हुए आगाह किया कि भारत को वहां कोई सैन्य भूमिका नहीं निभानी चाहिए.

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पाकिस्तान मीडिया के एक तबके ने हाल में कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के उदय का मतलब है कि भारत ने वहां जो भी निवेश किया है, वो सब डूब गया. हालांकि, भारत के रणनीतिक मामलों के विश्लेषक प्रवीण स्वामी की इस मामले में राय अलग है. वो कहते हैं कि भारत अभी भले ही 'अलग-थलग' पड़ गया हो लेकिन विकास की तमाम परियोजनाएं भारत को 'एक तरह से लाभ की स्थिति में ला सकती हैं.' उन्होंने मनी कंट्रोल डॉटकॉम वेबसाइट से कहा, "तमाम कारणों से तालिबान पूरी तरह पाकिस्तान पर निर्भर नहीं होना चाहेंगे."

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शरणार्थियों को लेकर भारत का रुख

भारत के सामने अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े जो जटिल मुद्दे हैं, उनमें से एक है शरणार्थियों का मामला. सवाल ये है कि क्या भारत अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को पनाह देगा? भारत सरकार ने सिख और हिंदू समुदाय के लोगों को शरण देने का संकेत दिया है लेकिन मुसलमान शरणार्थियों को लेकर चुप्पी साधी हुई है. विदेश मंत्रालय की ओर से 16 अगस्त को जारी बयान में कहा गया कि जो सिख और हिंदू अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना चाहते हैं, "भारत उन्हें आने देगा." इस बयान में ये भी कहा गया है कि भारत सरकार उन अफ़ग़ान लोगों के साथ 'खड़ी रहेगी' जो परस्पर विकास, शिक्षा और जनहित के मुद्दों में साझेदार रहे हैं. मीडिया के एक धड़े और कुछ विश्लेषकों ने आरोप लगाया है कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार धर्म के आधार पर शरणार्थियों के बीच भेद कर रही है.

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