हरियाणा चुनाव: INLD के कमजोर पड़ने और जाति-वर्ग के मजबूत समीकरण से कांग्रेस को हो सकता है फायदा
नई दिल्ली- पिछले दो हफ्तों में ही हरियाणा में चुनावी राजनीति की दशा और दिशा दोनों में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रदेश में नेतृत्व संकट से बाहर निकलते ही कांग्रेस न सिर्फ चुनावी मैदान में मजबूती के साथ खड़ी है, बल्कि चुनाव की जिम्मेदारी सौंपने से लेकर टिकट बंटवारे तक जिस समावेशी सोच के साथ आगे बढ़ी है, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को अपनी सोच बदलने को मजबूर कर दिया है। ऊपर से आईएनएलडी की पतली हालत देखकर लग रहा है कि कांग्रेस को मौजूदा विधानसभा चुनाव में बहुत ज्यादा फायदा मिल सकता है। क्योंकि, 2014 के लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों के मुकाबले पार्टी का वोट शेयर 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुत अधिक बढ़ा है और यह लगातार बढ़त की ओर नजर आ रहा है। मसलन, 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को हरियाणा में जहां 22.99 फीसदी और विधानसभा चुनाव में 20.58 फीसदी वोट मिले थे, वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 28.42 फीसदी पहुंच चुका है।

हर जाति और वर्ग को बेहतर प्रतिनिधित्व
अगर इसबार हरियाणा में कांग्रेसी उम्मीदवारों की लिस्ट देखें तो साफ लगता है कि पार्टी ने हर समाज और वर्ग को उनका हक देने की कोशिश की है। मसलन, पार्टी ने अगर 26 जाट प्रत्याशियों को टिकट दिया है तो अनुसूचित जातियों के 17 उम्मीदवारों पर भी भरोसा जताया है। इसके अलावा पार्टी की लिस्ट में 6 मुसलमान, 6 पिछड़ा वर्ग, 6 अहीर, 6 गुर्जर, 5 वैश्य, 5 ब्राह्मण, 4 पंजाबी, 3 राजपूत, 3 जाट सिख और बिश्नोई समाज के 2 उम्मीदवार भी शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए हरियाणा जैसे राज्य में यह बहुत ही सटीक और प्रमाणिक लिस्ट नजर आती है।

समावेशी सोच का मिल सकता है लाभ
हरियाणा में जाटों की जनसंख्या 25 फीसदी से भी ज्यादा बताई जाती है। जबकि, भारत में दलित आबादी के मामले में हरियाणा जैसा छोटा राज्य पांचवें स्थान पर है, जहां करीब 20 फीसदी अनुसूचित जातियों की जनसंख्या है। इसी तरह आंकड़े बताते हैं कि राज्य में करीब 8 फीसदी पंजाबी, करीब 7.5 फीसदी ब्राह्मण, करीब 5 फीसदी अहीर, उतने ही वैश्य, करीब 3.50 फीसदी गुर्जर, करीब 4 फीसदी जाट सिख, लगभग 3.5 फीसदी राजपूत, लगभग 4 फीसदी मेव और मुस्लिम और 1 प्रतिशत से कम बिश्नोई समाज के लोग हैं। इस हिसाब से देखें तो पार्टी ने सही मायने में समावेशी समाज की विचारधारा का पालन किया है और शायद उसकी कोशिश ये रही है कि समाज का कोई भी वर्ग खुद को सबसे पुरानी पार्टी की ओर से उपेक्षित महसूस न करे।

अनुभवी नेतृत्व की जुगलबंदी
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हरियाणा में प्रदेश की सबसे ज्यादा आबादी वाले समाज के लोगों को नेतृत्व तो सौंपा है, लेकिन उससे ज्यादा उनके अनुभव को सम्मान दिया है। भूपिंदर सिंह हुड्डा लगातार 10 वर्षों तक राज्य में सरकार चला चुके हैं तो कुमारी शैलजा का राजनीतिक करियर केंद्र से राज्य तक कई बसंत देख चुका है। जहां एक ओर हुड्डा आज हरियाणा के मास लीडर होने के साथ-साथ सबसे बड़े जाट नेता हैं तो कुमारी शैलजा जैसा दलित चेहरा समाज के कमजोर वर्ग को बहुत ज्यादा ताकत दे रहा है।

कमजोर आईएनएलडी से फायदे में कांग्रेस
हरियाणा की राजनीति के लिए ये निर्विवाद सत्य है कि वहां जाट समाज का राजनीतिक दबदबा रहा है। जब इंडियन नेशनल लोकदल राज्य में बहुत शक्तिशाली थी, तब भी यहां हुड्डा की अगुवाई में कांग्रेस सत्ता शिखर तक पहुंचती रही। लेकिन, चौटाला परिवार में मचे घमासान से आज आईएनएलडी के सामने अपना अस्तित्व बचाने का संकट है। उसका वोट शेयर पिछले लोकसभा चुनाव में गिरकर सबसे कम 1.89 फीसदी तक पहुंच चुका है। ऐसे में जाहिर है कि जाटों का ज्यादातर वोट अब पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुवाई वाले कांग्रेस को ही मिलने की संभावना है।
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