Harivansh Narayan Singh: राज्यसभा में हरिवंश की वापसी, राष्ट्रपति ने रंजन गोगोई की सीट पर किया मनोनीत
Harivansh Narayan Singh: देश की संसदीय गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए वरिष्ठ राजनेता और राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह (Harivansh Narayan Singh) को फिर से उच्च सदन का सदस्य मनोनीत किया है। हरिवंश नारायण सिंह का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हुआ था। कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनकी राजनीतिक पारी को लेकर कई अटकलें लगाई जा रही थीं।
हालांकि, राष्ट्रपति मुर्मू के ताजा फैसले ने इन सभी कयासों पर विराम लगा दिया है। हरिवंश का री नॉमिनेशन न केवल उनके व्यक्तिगत संसदीय करियर के लिए अहम है, बल्कि यह सदन के भीतर उनके अनुभव और संतुलित कार्यशैली पर मुहर भी लगाता है।

JDU ने नहीं बनाया था उम्मीदवार
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में जेडीयू ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया था, जिसे राजनीतिक तौर पर एक बड़ा संकेत माना गया। अब उनके मनोनयन को बीजेपी के साथ उनकी नजदीकी का इनाम माना जा रहा है और इस फैसले के अलग-अलग राजनीतिक मतलब निकाले जा रहे हैं।
रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति से खाली हुई थी सीट
राज्यसभा में यह मनोनयन रंजन गोगोई की रिटायरमेंट के बाद किया गया है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) का कार्यकाल पूरा होने के बाद खाली हुए पद को भरने के लिए हरिवंश को मनोनीत किया गया है। जस्टिस गोगोई के रिटायर होने के बाद से ही इस मनोनीत सीट के लिए कई नामों की चर्चा थी, लेकिन अंत में राष्ट्रपति ने हरिवंश के नाम पर अपनी सहमति दी।
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किस तरह से हुई हरिवंश की नियुक्ति? समझिए नियम
सरकार द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, यह नियुक्ति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत की गई है। इस अनुच्छेद के अंतर्गत राष्ट्रपति को साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों से 12 सदस्यों को राज्यसभा में मनोनीत करने का विशेष अधिकार प्राप्त है। इसी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए अनुभवी हरिवंश को परिषद का हिस्सा बनाया गया है।
बिहार से उपसभापति तक का सफर
हरिवंश का संसदीय सफर बेहद प्रभावशाली रहा है। वे मूल रूप से बिहार से राज्यसभा के सदस्य के रूप में दो बार निर्वाचित हो चुके हैं। उनके पास पत्रकारिता और राजनीति का दशकों लंबा अनुभव है। सदन के संचालन में उनकी निष्पक्षता और भाषाई गरिमा ने उन्हें पक्ष और विपक्ष दोनों के बीच सम्मान दिलाया है।
राज्यसभा के उपसभापति के रूप में हरिवंश ने कई ऐतिहासिक और चुनौतीपूर्ण सत्रों का संचालन किया। उनकी पहचान एक ऐसे पीठासीन अधिकारी के रूप में रही है जो शोर-शराबे के बीच भी शांत रहकर विधायी कार्यों को सुचारु रूप से चलाने की क्षमता रखते हैं। उनकी संतुलित शैली ही उनकी सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।
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