SC Verdict on Bihar SIR: EVM के बाद अब एसआईआर पर भी विपक्ष को बड़ा झटका, CJI ने चुनाव आयोग को दिया क्लीन चिट
SC Verdict Bihar SIR: बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न होने के करीब छह महीने बाद, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की फायरब्रांड सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra), राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसद मनोज झा, कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल और सामाजिक संस्था 'एसोसिएशन फॉर डेमोग्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) व पीयूसीएल (PUCL) द्वारा दायर की गई याचिकाओं पर देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ आज बुधवार, 27 मई 2026 को अपना अंतिम निर्णय सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा उठाए गए इस कदम में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है।

फैसले के दौरान CJI सूर्यकांत ने उठाए तीन मुख्य सवाल
सीजेआई सूर्यकांत ने फैसला पढ़ते हुए कहा कि सभी पक्षों की अलग-अलग दलीलों पर गहराई से गौर करने, घटनाओं के क्रम को देखने, पार्टियों की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों और रिकॉर्ड में रखी गई सामग्री का बारीकी से अध्ययन करने के बाद, अदालत के सामने मुख्य रूप से तीन बुनियादी प्रश्न थे:
पहला प्रश्न: क्या भारत के चुनाव आयोग (ECI) के पास 'SIR' जैसा विशेष अभियान आयोजित करने की कानूनी व प्रशासनिक शक्ति है?
दूसरा प्रश्न: क्या 'SIR' के तहत की गई जांच एक वैध उद्देश्य पर आधारित है? और अगर ऐसा है, तो क्या चुनाव आयोग द्वारा इसके लिए अपनाए गए उपाय और नियम उसके तय उद्देश्य के अनुरूप थे?
तीसरा प्रश्न: क्या 'SIR' के तहत जांच करने में चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई विशेष प्रक्रिया, जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) के प्रावधानों के विपरीत या उसका उल्लंघन करती है?
इन तीनों सवालों का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह विचार व्यक्त किया कि बिहार में अपनाई गई 'SIR' प्रक्रिया, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के निर्वाचन आयोग के संवैधानिक दायित्व से अलग नहीं थी। यह उसी जिम्मेदारी का एक हिस्सा है।
SIR पर मुख्य न्यायाधीश ने अपने फैसले में क्या कहा?
CJI सुर्यकांत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि- संसद द्वारा कानून में एक 'सक्षम प्रावधान' जोड़ा गया था, जो चुनाव आयोग को असाधारण परिस्थितियों में मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण की शक्ति देता है। चुनाव आयोग की इस पूरी कार्रवाई को सिर्फ इसलिए अमान्य या रद्द नहीं किया जा सकता कि इसकी आंतरिक प्रक्रिया, सामान्य मतदाता सूचियों (Regular Electoral Rolls) को अपडेट करने की सामान्य प्रक्रिया से थोड़ी अलग है।
सीजेआई ने आगे कहा कि इस पूरी कवायद का सीधा संबंध भारतीय लोकतंत्र की शुचिता, निष्पक्षता और स्वतंत्र मतदान प्रक्रिया से है। निर्वाचन आयोग के पास 'SIR' करने का पूरा कानूनी अधिकार था और इसे जमीन पर लागू करने के लिए आयोग ने किसी भी वैधानिक (Statutory) या संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं किया है।
विपक्ष की सारी दलीलें हुईं ध्वस्त, अब कोई सवाल नहीं
इस फैसले से याचिकाकर्ता महुआ मोइत्रा और विपक्षी खेमे को बड़ा रणनीतिक झटका लगा है। विपक्ष की मुख्य दलील यह थी कि जिन मतदाताओं के नाम साल 2002-2003 के रिकॉर्ड में नहीं मिल रहे थे, उन्हें अपने पूर्वजों के दस्तावेज दिखाने के लिए मजबूर करना गरीब और प्रवासी नागरिकों के मताधिकार को छीनने जैसा है। विपक्ष ने इसे नागरिकता जांच के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन बताया था।
आज आने वाले फैसले के मायने: क्यों बेहद महत्वपूर्ण है यह निर्णय?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि चुनाव आयोग पहले ही बिहार में फेज-1 और अन्य नौ राज्यों में फेज-2 पूरा करने के बाद, देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फेज-3 (Phase-III) के तहत इस अभियान को पूरे देश में (हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को छोड़कर) विस्तारित करने की घोषणा कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'SIR' को पूरी तरह वैध (Validate) ठहराए जाने के बाद अब इस प्रक्रिया की वैधानिकता पर भविष्य के लिए सभी सवाल खत्म हो गए हैं। अदालत के इस रुख से यह भी साफ हो गया है कि चुनाव आयोग आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों में भी मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए इस तरह के कड़े और विशेष पुनरीक्षण अभियान (Phase-III) को बिना किसी कानूनी अड़चन के जारी रख सकेगा।














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