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राहुल गांधी की ताजपोशी में क्यों हुई देरी?

नई दिल्ली। राहुल गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगे इसमें तो किसी को शक नहीं, लेकिन कब बनेंगे, ये सवाल पिछले एक महीने से लगातार उठ रहे हैं। पहले ये बात सामने आई कि गुजरात चुनाव के बाद उनकी ताजपोशी होगी तो फिर खबर आई कि गुजरात चुनाव के पहले ही वे अध्यक्ष पद पर आसीन हो जाएंगे। दरअसल इन दोनों ही स्थितियों में पार्टी झूल रही है।

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हाईकमान खास तौर से सोनिया गांधी के जो करीबी हैं, उनमें भी दो मत हैं। एक धड़ा मानता है कि गुजरात में पार्टी बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में हैं और राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में और उत्साह भर जाएगा जिससे गुजरात में बाजी पलटने की स्थिति बन जाएगी तो दूसरा धड़ा राहुल गांधी के भविष्य को लेकर सुरक्षित कवायद के पक्ष में है। उसका मानना है कि यदि पार्टी गुजरात में चुनाव नहीं जीत पाती है तो शुरूआत ही खराब हो जाएगी और एक बार फिर राहुल गांधी के राजनीतिक कैरियर को लेकर विपक्ष हमला बोल देगा जैसा कि अभी तक होता आया है। पहली बार गुजरात चुनाव में उनके दौरों और भाषणों से विपक्ष गंभीर हुआ है और उनकी परिपक्वता और नए अंदाज को लोग पसंद कर रहे हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव दिसंबर के आखिर तक कराना जरूरी है और पहले यही सोचा जा रहा था कि चुनाव के बाद राहुल को कमान सौंपी जाए लेकिन पार्टी अब पहले ही दांव खेलने की तैयारी में है और जानबूझ कर ऐसा वक्त तय किया जा रहा है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे वाली कहावत चरितार्थ हो जाए। यदि गुजरात में नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आते हैं तो पार्टी को उनका बचाव करने के लिए तर्क रहेगा कि पहले चरण के मतदान के ठीक पहले ही वो अध्यक्ष बने हैं इसलिए उन पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता है और यदि कांग्रेस गुजरात में कांग्रेस चुनाव फतह कर लेती है तो फिर राहुल गांधी के नेतृत्व में बेहतरीन शुरूआत हो जाएगी और पार्टी के हौंसले बुलंदी की ओर बढ़ जाएंगे।

गुजरात में जिस तरह से पार्टी ने जातिगत समीकरण और नरम हिंदुत्व का कार्ड खेला है उससे पार्टी की सांस में सांस आई है और इसी वजह से गुजरात का चुनाव पिछले चुनावों की तुलना में ज्यादा दिलचस्प हो गया है। यही नहीं जिस तरह राहुल ने भी राज्य के धुआंधार दौरे किए हैं और उनमें मुद्दे उठाए हैं इससे पार्टी के उस धड़े की बात को महत्व मिला है जो गुजरात चुनाव के पहले ही उनकी ताजपोशी चाहते हैं। अब सवाल ये है कि यदि चुनाव के पहले ही अध्यक्ष पद का चुनाव होता है तो उसके लिए क्या टाइमिंग रखी जाए तो इतना साफ है कि चुनाव प्रक्रिया के लिए 10 से 15 दिन का वक्त चाहिए। इससे साफ जाहिर है कि पार्टी दिसंबर महीने के पहले हफ्ते तक उनके नाम का ऐलान करेगी और नौ दिसबंर को पहले चरण के मतदान के पहले कांग्रेस उनकी ताजपोशी का फायदा उठाने की कोशिश करेगी।

कांग्रेस के लिए ये क्षण ऐतिहासिक होगा क्योंकि 19 साल के लंबे अंतराल के बाद पार्टी की बागडोर युवा पीढ़ी को मिलेगी। सोनिया गांधी की विदाई होगी और उनके अध्यक्ष पद से हटने के साथ ही कांग्रेस को न केवल नया नेतृत्व मिलेगा बल्कि पार्टी के भीतर भी कई वरिष्ठ सदस्यों के किनारे जाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

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