Gujarat assembly elections 2017: अमित शाह, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच कौन होगा इस पॉवर गेम का गेमचेंजर?
नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने Gujarat assembly elections 2017 के लिए तारीखों का ऐलान कर दिया है। 9 और 14 दिसंबर को गुजरात में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा, 18 दिसंबर को चुनाव नतीजे आएंगे। अभी तो शुरूआत है गुजरात विधानसभा चुनाव की, न जाने कितने अटैक किस किस पार्टी को होने वाले हैं। पहले कांग्रेस के खेमे में पहुंचे अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी, और हार्दिक पटेल का बाहर से कांग्रेस को समर्थन, उसके साथ ही हार्दिक के करीबी सहयोगी वरुण पटेल और रश्मि पटेल का बीजेपी में जाना। फिर हार्दिक के सहयोगी नरेंद्र पटेल की दस लाख कैश के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस का धमाका, बीजेपी पर एक करोड़ में खरीदने का दावा कर सनसनी फैलना और अब एक और पाटीदार नेता निखिल सवानी का बीजेपी पर हमला। ये दोनों जिस तेजी से बीजेपी में गए, उससे ज्यादा तेजी से फिर हार्दिक खेमे में लौट आए। इसमें कोई शक नहीं, ये सारे युवा गुजरात के नए राजनीतिक होनहार हैं और बड़े बड़े गेम प्लान इन्होंने बना रखे हैं। ये तो अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है। बिलकुल इसी तर्ज पर चले रहे हार्दिक और उनके साथी क्या क्या राजनीतिक गुल खिलाने वाले हैं, किसी को अंदाजा नहीं। शुरूआत से ही इनकी गहराई नापना मुश्किल हो रहा है।

वार-पलटवार के साथ गरमाई सियासत
ऐसा नहीं कि इनसे बीजेपी ही दबाव में है, कांग्रेस पर भी इन युवाओं की फौज पर उससे ज्यादा दबाव है क्योंकि गुजरात चुनाव का खेल इन्हीं के इर्द गिर्द घूमना शुरू हो गया है और वार पलटवार की इस लड़ाई को इन्होंने रोचक भी बना दिया है। कांग्रेस इन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए दबाव झेल रही है तो बीजेपी बनती हवा बिगड़ने से हैरान परेशान है। खास तौर से नरेंद्र पटेल के दस लाख के नोट मीडिया के स्क्रीन पर छाए हुए हैं। गुजरात में यूथ क्यों खास हैं और क्यों राजनीति के फोकस में हैं, ये जानना भी जरूरी है। गुजरात में 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र की है और बड़ी तादाद में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। इस मुद्दे को हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर के साथ ही जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेताओं ने चुनाव के काफी पहले से ही भुना लिया है।

क्या कांग्रेस की वापसी होगी?
ऐसा नहीं है कि ये सब बीजेपी को पता नहीं, गुजरात की रग रग से वाकिफ हैं नरेंद्र मोदी और अमित शाह। सभी जानते हैं कि बीजेपी में जितनी समझ इन दोनों को राज्य की है पार्टी के फिलहाल के किसी नेता में नहीं। इतने साल गुजरात में सत्ता बरकरार रखना और फिर केंद्र की राजनीति में छा जाना आसान नहीं। इसके बावजूद बीजेपी मजबूर क्यों नजर आ रही है तो उसकी वजह है। इन दोनों का गुजरात की राजनीति में एकछत्र राज्य था। कांग्रेस लगभग साफ हो चुकी थी और इतनी निराशा में थी कि शायद ही गुजरात में फिर पनप पाए लेकिन जैसे ही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष।

आखिर कौन होगा गेमचेंजर
न केवल सरकार में बल्कि प्रदेश बीजेपी में एक शून्य सा आ गया। दोनों का इतना दबदबा था और अब उससे ज्यादा है, ऐसे में गुजरात बीजेपी के भीतर इनका कोई विकल्प दूर दूर तक नजर नहीं आता। आनंदी बेन पेटल को हटना पड़ा और उनकी जगह विजय रूपाणी आए लेकिन वो बात नहीं बन पाई। ऊपर से युवाओं की बेरोजगारी का मुद्दा और इसी वजह से बढ़ते विरोध को राज्य सरकार हैंडल नहीं कर पाई जिसका नतीजा ये निकला कि हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश जैसे नेताओं का कद बढ़ गया, जो बीजेपी के लिए सबसे घातक साबित हो रहा है।

क्या होगा मोदी-शाह का अहम दांव
इसमें कोई शक नहीं जिस यूथ के बलबूते पर मोदी केंद्र में सत्तासीन हुए, वही यूथ गुजरात में उनके लिए सिरदर्द बन गए हैं और इसकी मुख्य वजह ये है कि आरक्षण और बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं। इधर अपनी थाली में खुद ब खुद आते इन युवाओं को देखकर कांग्रेस के चेहरे पर अचानक चमक आ गई है। इसीलिए कांग्रेस बेरोजगारी भत्ता और स्मार्ट फोन देने का लुभावना वादा युवाओं के सामने फेंक चुकी है। फिलहाल कांग्रेस उत्साहित है और बीजेपी पटेल खेमे की रस्साकसी में फेल नजर आ रही है लेकिन ये तो शुरूआत है, चुनाव के रंग भरने शुरू हुए हैं, कितने रंग और भरेंगे, कितने बिखरेंगे, इसका अंदाजा कोई राजनीतिक पंडित नहीं लगा सकता। कांग्रेस को जो शुरूआती राजनीतिक बढ़त मिली है, उसे वो किस तरह बरकरार रखती है और बीजेपी के चाणक्य अमित शाह इस बढ़त को पीछे धकेलने के लिए कितने तीर अपनी कमान से निकालते हैं, इसका अंदाजा कांग्रेस को भी नहीं होगा।












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