ग्राउंड रिपोर्ट: क्या बेटों की 'बदतमीज़ी' बचाने में जुटा था पूरा गांव

ग्राउंड रिपोर्ट: क्या बेटों की बदतमीज़ी बचाने में जुटा था पूरा गांव

"आलू कचालू बेटा कहां गए थे

बंदर की झोपड़ी में सो रहे थे

बंदर ने लात मारी रो रहे थे"

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय के आठवीं की छात्रा सोनी कुमारी की ये कविता आपको कैसी लगी? फ़र्ज कीजिए कि सोनी आपके सामने बैठी हों और अपनी सहज आवाज़ में ये कविता सुना रही हों.

पर दुख की बात ये थी कि सोनी जिस वक़्त हमें ये कविताएं सुना रही थीं, उस वक़्त वो सदर अस्पताल के विशेष वार्ड में भर्ती थीं.

सोनी उन चार बच्चियों में शामिल हैं, जिन्हें बिहार के सुपौल जिले के डपरखा गांव के कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में स्थानीय लोगों की पिटा़ई के बाद बेहोशी की हालत में सदर अस्पताल लाया गया था.

सोनी के अलावा बाक़ी तीनों बच्चियां भी सदर अस्पताल के उसी नशा मुक्ति वॉर्ड में भर्ती थीं. उनके परिजन भी साथ मौजूद थे.

सुबह के साढ़े छह बज रहे थे. एक सिपाही वॉर्ड के दरवाज़े पर पहरा दे रहा था. अस्पताल मेस का एक कर्मचारी बच्चियों से पूछने आया था कि उन्हें क्या खाना है.

सदर अस्पताल के डॉक्टर अभी-अभी देखकर गए थे. बच्चियों की हालत अब पहले से बेहतर थी. परिजनों के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन ने बच्चियों के इलाज में तत्परता दिखाई है. सुविधाएं भी मुहैया कराई जा रही हैं. अस्पताल प्रबंधन से उन्हें कोई शिकायत नहीं थी.

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लेकिन बच्चियों के मन से डर अभी तक ख़त्म नहीं हुआ था. उस घटना को याद करते हुए वो रोने लगती हैं, लेकिन सोनी नहीं रोती है.

वो कहती है, "वो लोग डेढ़-दो सौ की संख्या में आए थे. लाठी डंडा सब था उनके पास. लेकिन हमारे पास कुछ नहीं था. हमलोग तो खेल रहे थे."

तो क्या अगर छात्राओं के पास भी लाठी डंडे होते तो वे हमलावरों से भिड़ जातीं! इस सवाल पर सोनी तन कर कहती हैं कि "और नहीं तो क्या! हमारे पास भी लाठी-डंडा रहता तो हम उनको छोड़ देते क्या!"

सोनी के मुताबिक उन लोगों ने बाल खींचकर घसीट दिया था. बहुत दूर तक घसीटते हुए ले गए. उसी पर कोई लात भी‌ मार देता. गंदी गालियां देते.

सोनी के पिता ब्रह्मदेव शर्मा भी वहीं मौजूद थे. अपनी बेटी की बातों को सुनकर भावुक हो गए. सोनी को बेटा कहकर पुकारते हैं. उन्होंने कहा, "हमनें तो बेटा को कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में पढ़ने भेजा था. लेकिन दुख की बात ये थी कि जब उसे देखने आए‌ तो वो अस्पताल में बेहोश पड़ी थी."

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वो कहते हैं, "शनिवार शाम को पांच बजे यह हुआ था. हमें रात में बारह बजे पता चला. त्रिवेणीगंज अनुमंडल‌ अस्पताल में आकर हालात देखे तो मन बेचैन हो गया. वहां सब छटपटा रहे थे. हम अपनी बेटी को देख रोने‌ लगे. भेजा थे पढ़ने कि बेटे को बड़ा बना बनाएंगे, लेकिन अस्पताल में देख कर मेरी तो जान निकल गई."

ब्रह्मदेव शर्मा कहते हैं कि ये सारा कुछ इसलिए हुआ क्योंकि प्रशासन ने कस्तूरबा स्कूल में बच्चियों की सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया था.

शनिवार की शाम कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में क्या हुआ था? किन लोगों ने स्कूल में घुसकर खेल रही बच्चियों के साथ निर्दयतापूर्ण व्यवहार किया?

पिछले दस सालों से स्कूल में मेस का संचालन कर रहीं रंजू कुमारी कहती हैं, "10 सालों में ऐसी घटना कभी नहीं घटी.‌ इसके पहले भी स्थानीय लड़कों ने दीवारों पर लिखा था और इसकी शिकायत वॉर्डन को पहले भी दी गई थी.

रंजू कहती हैं, ''उस दिन बच्चियां खेल रहीं थीं. किसी को इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि वो लोग बच्चियों को मारने के लिए इतनी संख्या में आ जाएंगे. बच्चियों ने उनकी बदतमीज़ी का जवाब दिया था. उसी के विरोध में उन्होंने मारपीट की. बच्चियों को बचाते वक़्त मुझे भी चोटें आई थीं."

शहज़ादी ख़ातून भी बाक़ी बच्चियों के साथ उसी वॉर्ड में थीं. उनकी मां सोहरा ख़ातून भी वहां मौजूद थीं. ख़ातून भी रंजू की बातों को ही दोहराती हैं.

हॉस्टल की वॉर्डन रीमा राज से बच्चियों ने पहले भी शिकायत की थी. वो कहती हैं, ''हां, शिकायत तो पहले की गई थी. स्कूल प्रबंधन ने दीवारों पर लिखी फ़ब्तियों को मिटा दिया था. लड़कों को डांट कर भगा भी दिया गया था. क्या पता था कि ऐसा भी होगा. वो लोग दोबारा भीड़ के साथ आए और हमला कर दिया. मैं यहां अकेली हूं. इतने लोगों को मैनेज करना संभव नहीं था.''

क्या विभाग ने इस संबंध में हॉस्टल की वॉर्डन रीमा राज से जवाब तलब किया था? इस सवाल के जवाब में जिला शिक्षा पदाधिकारी जगतपति चौधरी कहते हैं, "हमने वॉर्डन से काफ़ी पूछताछ की है. बच्चियों की देखभाल उन्हीं की ज़िम्मेदारी है. इसलिए उनसे पूछना लाजिमी भी है.''

जगतपति चौधरी ये बात मानते हैं कि स्कूल के पड़ोस में रहने वाले लड़के बाहर की दीवारों पर कुछ-कुछ लिखते रहते हैं. स्थानीय सांसद रंजीता रंजन घटना के बाद से लगातार अस्पताल में जाकर बच्चियों के हालात की जानकारी ले रही हैं.

सोमवार को रंजीता रंजन स्कूल का निरीक्षण करने पहुंची थीं. निरीक्षण के बाद बाहर निकलीं तो काफ़ी ग़ुस्से में थीं. बीबीसी के साथ बातचीत में उन्होंने प्रदेश सरकार पर जमकर हमला बोला.

स्कूल के छात्रावास से क़रीब 100 मीटर की दूरी पर वो मैदान है जहां बच्चियां उस दिन खेल रही थीं. वो हाई स्कूल का मैदान है. वहां डीईओ चौधरी खुद मुआयना करते हुए मिले.

चौघरी कहते हैं, "हाई स्कूल के कैंपस के पीछे वाले रास्ते की तरफ़ उनका घर है. बच्चियां उस दिन उसी कैंपस में खेल रही थीं. कस्तूरबा बालिका विद्यालय का मैदान भी वही है. हालांकि स्कूल बंद रहने पर कैंपस का वो पिछला गेट बंद रहता है. वो लोग दीवार फांद कर आए थे.''

जिस पिछले दरवाजे की बात डीईओ कर रहे थे, उसके बाहर केवल गंदगी थी. दीवारों पर बहुत कुछ लिखा था. जहां अश्लील कॉमेंट्स किए गए थे वहां पुताई करवा दी गई है. फिर भी समझ में आ रहा था कि वहां कुछ ऐसे शब्द लिखे गए थे जो वाकई आपत्तिजनक थे.

मामले की जांच कर रही त्रिवेणीगंज पुलिस पर देर से एफ़ईआर करने और गंभीरता नहीं दिखाने का आरोप लग रहा है. हालांकि डीएसपी जितेंद्र कुमार इससे इनकार करते हैं. पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए तत्काल एम्बुलेंस की सेवाएं भी मुहैया कराईं.

डीएसपी ने कहा, "पुलिस ने नौ लोगों को गिरफ़्तार किया है. इसमें कुछ महिलाएं भी शामिल हैं. भीड़ को मारपीट के लिए उकसाया. एसपी सुपौल के नेतृत्व में मामले की जांच‌ के लिए एसआईटी गठित की गई है. जल्द ही बाक़ी अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा.''

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