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ग्राउंड रिपोर्ट: शिलाँग में भड़की हिंसा की जड़ में है 'खासी' पहचान और उनका संघर्ष

ग्राउंड रिपोर्ट: शिलाँग में भड़की हिंसा की जड़ में है खासी पहचान और उनका संघर्ष

टैक्सी के मौलांग घाट तिराहा से मुड़ते ही बाईं तरफ़ कूड़े का ढेर, नाली और बारिश के पानी में मिली गर्द और गंदगी से चिपचिपी पड़ी सड़क, दोनों तरफ़ टिन, लकड़ी और ईंट के एक दूसरे से चिपके ख़ुद को खड़ा रखने की कोशिश करते वो बौने-बौने से घर, और इन सबके बीच से झांकता वो गुरुद्वारा.

ये है शिलाँग का पंजाबी लेन. शहर में कुछ लोग इसे स्वीपर्स लेन या हरिजन कॉलोनी भी बुलाते हैं.

झगड़ा कैसे शुरु हुआ?

जगह-जगह मौजूद अर्धसैनिक बल के जवानों की मौजूदगी ये साफ़ कर देती है कि इस इलाक़े ने हाल ही में कोई बड़ी हिंसा देखी है.

'झगड़े की शुरुआत ऐसे हुई कि लड़कियां पब्लिक नलके पर पानी भर रही थीं. बस वाले ने गाड़ी नल के सामने लाकर खड़ी कर दी. लड़कियों ने विरोध किया तो पहले ड्राइवर और फिर दोनों तरफ़ से गाली-गलौच शुरु हो गई. गुस्साए ड्राइवर ने नीचे उतरकर एक लड़की को किक मार दी जिसके बाद लड़कियों ने उसे पकड़कर पीट डाला.'

भगत सिंह, आंबेडकर, गांधी और बाबा दीप सिंह की दीवारों पर लटकी तस्वीरों के बीच अपनी टेबल के पीछे बैठे गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के गुरजीत सिंह कहते हैं कि 'ड्राइवर के साथ-साथ बस का ख़लासी भी पिटा.'

मज़हबी सिख परिवार में जन्मे बाबा दीप सिंह ने अफ़ग़ान शासक अहमद शाह दुर्रानी की फ़ौज के हाथों स्वर्ण मंदिर को तोड़े जाने का बदला लेने की ठानी थी. इस लड़ाई में वो शहीद हो गए थे.

लड़ाई को लेकर छेड़छाड़ से लेकर कई तरह की बातें कही जा रही हैं और वो इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस पक्ष से बात कर रहे हैं. लेकिन स्थानीय मीडिया में कई जगहों पर कहा जा रहा है कि पंजाबी लेन में उस दिन पिटने वाले तीन कम उम्र के युवा थे, जिनमें से एक 14 और दूसरा 15 साल का था. इन नौजवानों का तालुक्क़ सूबे के सबसे बड़े क़बायली समुदाय 'खासी' से था.

हालांकि इन्हें पहले सिविल अस्पताल और बाद में क्षेत्रीय मेडिकल कॉलेज में जांच के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया. सोशल मीडिया पर ये अफ़वाह उड़ चली कि उनमें से एक खासी बच्चे की मौत हो गई है.

देखते ही देखते बड़ी तादाद में खासी युवक बड़ा बाज़ार के पास के इलाक़े में जमा हो गये और पुलिस की उन्हें रोकने की कोशिश और भीड़ की नारेबाज़ी के बीच पथराव शुरु हो गया.

सूबे के पुलिस प्रमुख स्वराजबीर सिंह ने बीबीसी से कहा कि इस केस के सिलसिले में 50 लोगों की गिरफ़्तारियां हुई हैं. पंजाबी कॉलोनी के तीन युवक भी मामले में जेल में हैं.

शिलाँग में हिंसा के दूसरे दिन से कर्फ्यू लग गया जो अब भी शहर में देर शाम से और हिंसा वाले इलाक़ो में सूरज डूबने के बाद से जारी रखा गया है.

इंटरनेट सेवाओं पर पूरी तरह रोक है और शहर में अर्ध-सैनिक बलों की तैनाती हर इलाक़े में दिखाई देती है.

'खासी ग़ुस्से में थे'

खासी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष लैंबॉक मारेंगार कहते हैं, '31 मई को उस एरिया में जो हुआ वो पहली बार नहीं था, पिछले दशक भर में ऐसा बार-बार हुआ है. उस दिन तीन खासी युवाओं को पीटा गया जिसके बाद खासियों में दशक भर से जमा ग़म और ग़ुस्सा फूट पड़ा.'

मामूली क़द काठी और सांवले रंग के लैंबॉक ग़ुस्से से कहते हैं, 'बजाए इसके कि हमला करनेवालों को गिरफ़्तार किया जाता पुलिस मामले में सुलह कराने की कोशिश में लगी रही. हिंसा की जो घटनाएं अगले तीन-चार दिनों हुईं वो उसी वजह से हुईं.'

'पुलिस को मामले में सुलह-सफ़ाई करवाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी,' कहना है अंग्रेज़ी दैनिक द शिलॉंग टाइम्स की संपादक पैट्रिशिया मुखिम का, जिनके मुताबिक़ मेघालय में किसी 'लोकल' को पीटकर बचना मुश्किल है.'

पैट्रिशिया मुखिम कहती हैं, 'किसी मूल निवासी का किसी बाहरी के हाथों पिट जाने को यहां बेइज्ज़ती और शर्म से जोड़कर देखा जाता है, जैसे अरे, आपके घर में घुसकर आपको पीट डाला!'

वो कहती हैं, 'और अपने हितों को साधने वाले वैसे लोग तो बैठे ही हैं जो आग में घी डालने का काम करते हैं. इसी वजह से चंद लोगों के बीच हाथापाई का मामला सांप्रदायिक हिंसा में तब्दील हो गया.'

फिर वही ज़र, ज़मीन

हाल में हुए हंगामे के बाद से मौलांग घाट के तक़रीबन दो एकड़ के दायरे में बसे पंजाबी कॉलोनी को कहीं और शिफ़्ट करवाने की मांग तेज़ हो गई है.

शिलांग के सबसे मंहगे कमर्शियल इलाक़े पुलिस बाज़ार के बाद मौलांग घाट या बड़ा बाज़ार का ही नाम आता है और वहीं है पंजाबी लेन जिसके दोनों तरफ़ हैं छोटी-छोटी दुकानें और ऊपर और पीछे की तरफ़ बेतरतीब से मकान और झुग्गियां.

दो दिनों पहले एक शांति मार्च के बीच प्रार्थना सभा हुई जिसमें उच्च स्तरीय पुनर्वास समिति से मांग की गई कि वो स्वीपर्स कॉलोनी को दूसरी जगह बसाने के काम में तेज़ी लाए.

इस समिति का गठन राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) वाली कोनरैड संगमा की सरकार ने किया है.

लैंबॉक मारेंगार कहते हैं, 'ये रिहाइशी इलाक़ा नहीं कमर्शियल एरिया है. अगर सरकार यहां के लोगों को दूसरी जगह बसाकर इसे वाणिज्यिक क्षेत्र के तौर पर विकसित करे तो उससे सूबे का विकास होगा, युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे.'

प्राइवेट कंपनी में काम करनेवाले सन्नी सिंह कहते हैं कि 'वो इस इलाक़े को व्यावसायिक केंद्र के तौर पर विकसित कहना चाहते हैं और वो तबतक नहीं हो सकता जबतक हम यहां से जाएंगे नहीं.'

मूलत: पंजाब के गुरुदासपुर से तालुक्क़ रखनेवाले सन्नी सिंह साथ ही ये भी कहते हैं, 'आज तो कोई 10 साल कहीं रह ले तो ज़मीन नहीं छोड़ता हम तो यहां पिछले तक़रीबन ढ़ेढ़ सौ साल से रहते आ रहे हैं.'

लेकिन ज़मीन है किसकी?

गुरजीत सिंह का कहना है कि 'पुनर्वास का सवाल तो तब आयेगा न जब हम ज़मीन पर अपने हक़ के दस्तावेज़ नहीं पेश कर पाएंगे.'

पंजाबी समुदाय अपने पक्ष में एक स्थानीय सरदार - सियेम ऑफ़ मिलिएम, के जारी कथित दस्तावेज़ दिखाता है जिसके मुताबिक़ उन्हें ये ज़मीन रहने के लिए उन्नीसवीं सदी के मध्य में दी गई थी.

ये सिख परिवार यहां ब्रितानी अधिकारियों द्वारा मलमुत्र की सफ़ाई के काम के लिए लाये गये थे.

अब विवाद इस बात को लेकर मचा है कि स्थानीय सरदार ने ये ज़मीन समझौते के तहत नगर निगम को अपने कामगारों के लिए दी थी या सीधे सिख समुदाय को!

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शिलाँग के डिप्टी कमिश्नर पीएस डखर ज़मीन के मालिकाना हक़ के सवाल पर कहते हैं कि चुंकि ये ज़मीन राजस्व के तहत नहीं आती तो वो इस बारे में कुछ नहीं कह सकते हैं.

खासी संगठनों का कहना है कि अगर ये ज़मीन सिखों को नगर निगम के द्वारा मिली भी थी तो केवल उन लोगों के रहने के लिए जो कार्पोरेशन में काम करते थे या हैं, जिनकी तादाद 20 से 25 होगी लेकिन यहां सैकड़ों की संख्या में जो लोग बसे हैं वो कौन हैं!?

पंजाबी समुदाय का कहना है कि इलाक़े से हटाये जाने का एक नोटिस 1990 के दशक में हाई कोर्ट में उनके पक्ष में गया था लेकिन दूसरी तरफ़ खासी संगठन कह रहे हैं कि वो पुनर्वास को लेकर कुछ माह इंतज़ार के बाद अगर ज़रूरत पड़ी तो कड़ा रूख़ अपनाएंगे.

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