राज्यपाल-विवाद मामले में सिर्फ BJP को मानते हैं जिम्मेदार, तो ये 5 बातें बदलेंगी आपकी राय
मयंक दीक्षित- केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद से अब तक करीब 8 राज्यपालों पर पद छोड़ने का दबाव की खबरें आईं। कुछ ने इस्तीफा दिया, कुछ के खाते में आया ट्रांंस्फर।
केंद्र के इस रवैये से नाराज उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी तो ये कहते हुए सुप्रीम कोर्ट गए कि राज्यपाल केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं होते हैं जो उन्हें केंद्र सरकार अपने मन मुताबिक चलाए।
हालांकि संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की बात में दम है कि ''जब राज्यपालों की नियुक्ति का आधार नहीं पूछा जाता तब उन्हें हटाने का अाधार क्यों बताया जाना चाहिए...। आइए गवर्नर शब्द से जुड़ी वो बुनियादी बातें जो आम तौर पर खबरों में नहीं आ पाईं... घुमाएं स्लाइडर और जानें वो बातें जो रखती हैं लोकतंत्र का पक्ष-

गवर्नर पद
1935 के भारतीय शासन अधिनियम में ब्रिटिश शासन ने जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने की जिम्मेदारी तो दी दी पर एक ऐसे पद की जरूरत थी जो संघ यानि केंद्र से राज्य के बीच पुल का काम करे। राज्यपाल काे राज्य की कार्यपालिका सम्बंधी अधिकार दिए गए। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं।

सर्वशक्तिमान अधिकार
अनुच्छेद 174 के तहत राज्यपाल को विधायी अधिकार प्राप्त हैं। राज्यपाल की सिफारिश के बिना राज्य विधानसभा में धन विधेयक पेश नहीं हो सकता है। जब तक राष्ट्रपति का विश्वास बना रहे, राज्यपाल अने पद पर बने रहने के अधिकारी होते हैं।

1975 के बाद
जब इमरजेंसी के बाद 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी और उसने पूर्ववर्ती सरकार के नियुक्त राज्यपालों को बदलने का प्रस्ताव राष्ट्रपति को भेजा। तत्कालीन राष्ट्रपति ने यह प्रस्ताव लौटा दिया तो वापस सरकार ने उन्हें भेजा। संवैधानिक नियमों के चलते राष्ट्रपति को बात माननी पड़ी व हस्ताक्षर करने पड़े।

1980 में 'बदला'
1980 में सरकार बदलने पर इंदिरा गांधी सरकार ने तमिलनाडु के राज्यपाल प्रभुदास पटवारी को हटा दिया। बाद में 1981 में राजस्थान के गवर्नर रघुकुल तिलक को हटाया...

2004 में कांग्रेस
साल 2004 में सत्ता बदलने के बाद यूपीए सरकार ने 2004 को यूपी के राज्यपाल विष्णुकान्त शास्त्री, हरियाणा के राज्यपाल बाबू परमानन्द, गुजरात के राज्यपाल कैलाशपति मिश्र और गोवा के राज्यपाल केदारनाथ साहनी को पद से हटा दिया गया था।












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