सस्ती होगी बिजली: थर्मल पावर प्लांट के लिए भारत ने नर्म किए प्रदूषण नियम, 25-30 पैसे प्रति यूनिट तक राहत संभव

Good News Electricity Cheaper: भारत सरकार ने थर्मल पावर प्लांट्स के लिए प्रदूषण नियंत्रण नियमों में बड़ा बदलाव किया है, जिससे बिजली की कीमतें कम होने की संभावना है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2015 के उत्सर्जन मानकों में ढील देते हुए फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम की अनिवार्यता को सीमित कर दिया है।

इस कदम से बिजली उत्पादन की लागत में 25-30 पैसे प्रति यूनिट की कमी आ सकती है, जिसका सीधा फायदा उपभोक्ताओं को मिलेगा। नए दिशानिर्देशों के अनुसार, अब केवल वही थर्मल पावर प्लांट FGD सिस्टम लगाने के लिए बाध्य होंगे। आइए जानते हैं क्या हैं नए नियम?

Electricity Cheaper Prices

नए नियम क्या कहते हैं?

  • 10 किलोमीटर के दायरे में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों (जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) के पास स्थित हैं।
  • अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों या नॉन-अटेनमेंट सिटीज़ में हैं। इन मामलों की समीक्षा एक केंद्रीय विशेषज्ञ समिति करेगी।
  • उच्च सल्फर सामग्री वाले आयातित कोयले का उपयोग करते हैं।

इसके अलावा, छोटे और शहरी क्षेत्रों से दूर कैटेगरी C प्लांट्स को FGD से छूट दी गई है, बशर्ते वे 1990 के चिमनी ऊंचाई नियमों का पालन करें। यह फैसला IIT दिल्ली, CSIR-NEERI, और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज़ की रिसर्च पर आधारित है, जिसमें पाया गया कि कई क्षेत्रों में FGD के बिना भी सल्फर डाइऑक्साइड का स्तर स्वीकार्य सीमा में है।

बिजली सस्ती होने की उम्मीद

FGD सिस्टम की स्थापना और रखरखाव से बिजली उत्पादन की लागत में प्रति यूनिट 25-30 पैसे का इजाफा होता है। नए नियमों से यह लागत कम होगी, जिससे बिजली की दरें घट सकती हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक वास्तविकताओं को संतुलित करने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है, क्योंकि देश की 80% बिजली आपूर्ति थर्मल पावर पर निर्भर है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चिंता

हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस ढील पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह कदम वायु गुणवत्ता सुधार के लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। जवाब में, सरकार ने तर्क दिया कि यह नीति अमेरिका और यूरोपीय यूनियन जैसे विकसित देशों की तर्ज पर है, जहां FGD सभी प्लांट्स के लिए अनिवार्य नहीं है। सरकार का जोर है कि प्रदूषण नियंत्रण के संसाधनों को उन क्षेत्रों में केंद्रित किया जाए, जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

ऊर्जा क्षेत्र के लिए क्या मायने?

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति भारत की ऊर्जा संक्रमण की चुनौतियों को दर्शाती है-विश्वसनीय बिजली आपूर्ति बनाए रखने और पर्यावरणीय लक्ष्यों को हासिल करने का संतुलन। एक विशेषज्ञ ने कहा, 'यह फैसला यह स्वीकार करता है कि भारत जैसे विकासशील देश को हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते हुए आर्थिक और तकनीकी वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना होगा।'

यह नीति न केवल बिजली उपभोक्ताओं के लिए राहत लेकर आ सकती है, बल्कि थर्मल पावर प्लांट्स की परिचालक लागत को भी कम करेगी। हालांकि, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रदूषण नियंत्रण के वैकल्पिक उपायों पर ध्यान दिया जाए, ताकि वायु गुणवत्ता से समझौता न हो। यह कदम भारत के ऊर्जा क्षेत्र में लागत और पर्यावरण के बीच संतुलन की कोशिश को दर्शाता है।

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