क्या भारत सरकार के नए फैसले से सस्ती हो सकती है बिजली? थर्मल पावर प्लांट्स के लिए नए नियम लागू
Electricity Bill Relief in India: अब आपके बिजली बिल थोड़े कम हो सकते हैं, क्योंकि सरकार ने कोयले से चलने वाले बिजली प्लांट्स के लिए कुछ नियमों में राहत दी है। खासतौर पर सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) जैसी गैसों को रोकने के लिए जो फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम लगाना जरूरी था, उसमें अब पूरी तरह से छूट नहीं दी गई है, लेकिन उसे बहुत हद तक सीमित कर दिया गया है।
अब सिर्फ वही प्लांट्स FGD सिस्टम लगाने के लिए बाध्य होंगे जो 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों के 10 किलोमीटर के अंदर आते हैं। जबकि देश के लगभग 79% कोयला आधारित बिजली संयंत्र, जो ज्यादातर गांवों या कम घनी आबादी वाले इलाकों में हैं, अब इस अनिवार्यता से बाहर हो गए हैं।

नए नियम क्या कहते हैं?
केंद्र सरकार ने राजपत्र अधिसूचना के जरिए संशोधित नियम लागू किए हैं। अब केवल 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के 10 किलोमीटर दायरे में स्थित थर्मल पावर प्लांट्स को FGD सिस्टम लगाना अनिवार्य होगा। गंभीर रूप से प्रदूषित या गैर-प्राप्ति क्षेत्रों में संयंत्रों के लिए केस-दर-केस आधार पर फैसला होगा। देश की 79% कोयला आधारित बिजली क्षमता, जो ज्यादातर ग्रामीण या कम आबादी वाले क्षेत्रों में है, अब FGD की अनिवार्यता से मुक्त होगी।
फैसले के पीछे वैज्ञानिक आधार
यह बदलाव IIT दिल्ली, CSIR-NEERI, और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (NIAS) जैसे संस्थानों के अध्ययनों पर आधारित है। इन अध्ययनों में पाया गया कि भारत में SO₂ का स्तर ज्यादातर जगहों पर राष्ट्रीय मानक (80 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से काफी कम, 3 से 20 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच है। इसका कारण भारतीय कोयले में सल्फर की कम मात्रा और संयंत्रों के ऊंचे स्मोकस्टैक डिजाइन हैं, जो प्रभावी फैलाव सुनिश्चित करते हैं।
पर्यावरण और लागत पर प्रभाव
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने चेतावनी दी थी कि सभी संयंत्रों में FGD लगाने से चूना पत्थर खनन, परिवहन और ऊर्जा खपत बढ़ेगी, जिससे 2025-2030 के बीच 69 मिलियन टन अतिरिक्त CO₂ उत्सर्जन हो सकता है। इससे पर्यावरणीय लाभ के बजाय नुकसान होने का खतरा था। वहीं, FGD रेट्रोफिटिंग की लागत 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी, जिसमें प्रति मेगावाट 1.2 करोड़ रुपये और 45 दिनों का डाउनटाइम शामिल था। नए नियमों से यह वित्तीय बोझ कम होगा, जिससे बिजली उत्पादन सस्ता होगा और उपभोक्ताओं के बिजली बिलों में राहत मिलेगी।
बिजली क्षेत्र का स्वागत
बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञों और नेताओं ने इस फैसले की सराहना की है। एक सरकारी बिजली कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'यह विज्ञान आधारित और तर्कसंगत नीति है, जो उन क्षेत्रों पर ध्यान देती है जहां उत्सर्जन नियंत्रण जरूरी है। यह उपभोक्ताओं की जेब की भी रक्षा करेगा।' राज्य बिजली बोर्डों (डिस्कॉम) को भी कम लागत के कारण टैरिफ नियंत्रण और सब्सिडी के बोझ में कमी की उम्मीद है।
'रोलबैक नहीं, रणनीतिक समायोजन'
सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह पर्यावरणीय प्रतिबद्धता में कमी नहीं है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'यह साक्ष्य-आधारित और स्थान-विशिष्ट समायोजन है। हम स्वच्छ हवा और जलवायु लक्ष्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।' इस नीति को जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में MC मेहता बनाम भारत संघ मामले में एक हलफनामे के जरिए पेश किया जाएगा, जहां FGD लागू करने की समयसीमा की समीक्षा चल रही है।
यह नीति बिजली क्षेत्र में लागत और विश्वसनीयता के लिए राहत लेकर आएगी, खासकर पीक डिमांड सीजन में। हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ता इस बात पर नजर रख रहे हैं कि स्थान-विशिष्ट नियम कितने प्रभावी रहेंगे। सरकार का दावा है कि यह बदलाव स्वच्छ हवा और सस्ती बिजली के बीच संतुलन बनाएगा, लेकिन इसका असली प्रभाव समय के साथ ही सामने आएगा।












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