Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

गालियाँ देती लड़कियाँ: लड़कों से कंपटीशन या फिर वजह कुछ और है?

गालियां
VikramRaghuvanshi/Getty Images
गालियां

पिछले दिनों एक वीडियो चारों ओर ख़ूब घूमा. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक बड़े से अपार्टमेंट में एक महिला सुरक्षा गार्ड से भिड़ी हुई है.

वह उसे लगातार धमकी दे रही है. धुआँधार गालियाँ दे रही है. गालियाँ माँ-बहन के नाम से जुड़ी हैं. गार्ड बचने की कोशिश कर रहा है. वह महिला बदन और ज़ुबान दोनों से हमलावर है.

इसी के कुछ दिनों बाद कानपुर के एक स्कूल का वीडियो सामने आया. तीन स्कूली लड़कियाँ लड़ रही हैं. एक-दूसरे को पटक रही हैं. बाल नोंचे जा रही हैं. एक लड़की गाली भी दे रही है. गाली माँ के नाम से जुड़ी है.

ये वीडियो वायरल क्यों हुए?

क्या भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में पहली बार गालियों का इस्तेमाल हो रहा था?

हम बतौर समाज पहली बार गालियाँ सुन रहे थे?

क्या स्त्रियाँ पहली बार गालियाँ दे रही थीं?

क्या पहली बार दबंगई करती हुई लड़कियाँ/ स्त्रियाँ दिखीं?

गालियों की संस्कृति


भारतीय मर्दाना समाज में गालियों की ख़ास जगह है. ख़ुश हुए तो गाली. ग़ुस्साये तो गाली. खुलेआम गाली. मन में गाली. गालियों की संस्कृति है और संस्कार भी. यह किसी स्कूल में नहीं सिखायी जाती. घर में या बाहर सुनकर और देखकर सीखी जाती है.

उसके असर से मुतास्सिर होकर हर नयी पीढ़ी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करती है. इस तरह लगता है, यह सदियों से हमारे बीच श्रुति और वाचिक परम्परा का हिस्सा है. बाप बेटे-बेटियों को गाली देता है. पति, पत्नी को गाली देता है. दोस्त, दोस्त को गालियाँ देता है. दुश्मन, दुश्मन को गालियों से नवाज़ता है.

गालियां
Getty Images
गालियां

निशाना महिलाओं का यौन अंग


दुनिया का तो पता नहीं लेकिन भारतीय और ख़ासकर हिन्दी पट्टी की गालियों की एक ख़ासियत है. 90 फ़ीसदी से ज़्यादा गालियाँ महिलाओं से जुड़ी हैं. महिलाओं में भी महिला रिश्तेदारों से जुड़ी हैं. इनमें भी वे रिश्तेदार जिनसे गाली का निशाना बने शख़्स का सीधा जैविक रिश्ता है.

इन रिश्तेदारों को भी चलते-चलते कुछ नहीं कहा जाता है. बल्कि इन पर निशाना साधते हुए यह ख़ास ध्यान रखा जाता है कि गालियों का जुमला इनके यौन अंग पर सीधे हमलावर हो. विशेषणों के साथ हमलावर हो.

लफ़्ज़ों से बलात्कार


स्त्री के देह में बलात घुसपैठ, बलात्कार है. पुरुष बलात प्रवेश की ताक में रहता है. वह नज़रों से बलात्कार करता है. गालियों के ज़रिये वह लफ़्ज़ों से बलात्कार करता है. बल्कि यह कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि वह इस 'बलात्कार' का आनंद लेना चाहता है.

महिलाओं को घर-परिवार, जाति-समाज, समुदाय, धर्म की 'इज़्ज़त' से भी जोड़कर देखा जाता है. तो जब किसी को माँ-बहन-बेटी से जुड़ी यौनिक गालियाँ दी जाती है तो इसके पीछे घर-परिवार, जाति, समाज, समुदय या धर्म की 'बेइज़्ज़ती' का भाव भी होता है.

ठीक उसी तरह जैसे महिला का बलात्कार कर घर-परिवार, समाज, समुदाय, जाति, धर्म से बदला या 'बेइज़्ज़त' करने का मक़सद होता है. यानी 'बेइज़्ज़त' करने के लिए यौनिकता पर श्ब्दों से चोट करो.

गालियों के इस्तेमाल की वजहें


जितनी वजहें बलात्कार की हो सकती हैं, उतनी वजहें गालियों के लिए भी हैं. यानी गालियों का इस्तेमाल मज़े के लिए होता है. किसी को नीचा दिखाने, बेइज़्ज़त करने के लिए होता है. बदला लेने के लिए होता है. किसी को क़ाबू में रखने के लिए होता है. किसी को डराने के लिए होता है. किसी को सरेआम अपनी ही नज़रों में नीचा गिराने के लिए होता है.

गालियों का वर्ग है. जाति है. धर्म है. जिस तरह बलात्कार सबका नहीं किया जा सकता, उसी तरह गालियाँ भी सबको नहीं दी जा सकती हैं. गालियाँ देने वाला ख़ुद को श्रेष्ठ, ताक़तवर- मज़बूत, ऊँचा मानता है. सामने वाले को वह कमतर, नीचा और कमज़ोर मानता है. यही नहीं, वह यह भी मानता है कि इसकी नियति ही गाली सुनने की है.

गालियां
Getty Images
गालियां

हिंसक मर्दानगी और गालियाँ


गाली देने वालों के ये सारे भाव मर्दाना हैं. ये भाव 'मर्दानगी' के लक्षण माने जाते हैं. आजकल इन्हें ही 'दबंग मर्दानगी' या 'हिंसक मर्दानगी' या 'ज़हरीली मर्दानगी' भी कहते हैं.

मर्दाना लोगों के दबदबे वाले समाज यानी पितृसत्तात्मक समाज के मूल्य इन्हें फलने-फूलने के लिए ज़रूरी खाद-पानी देते हैं. यानी अगर किसी को घर-परिवार या समाज में दबदबा बनाना है, तो वह हिंसा के अलग-अलग रूपों का सहारा लेता है. इन हिंसा में गालियाँ भी शामिल हैं.

लड़कों और पुरुषों के साथ काम करने वाले सतीश सिंह अपने एक अनुभव का ज़िक्र करते हैं. वे कहते हैं कि एक गाँव में 10-11 साल के लड़कों के साथ काम करने के दौरान पता चला कि 99 फ़ीसदी गालियाँ महिलाओं और लड़कियों से जुड़ी थीं. वह लड़की और महिला की गरिमा को ध्वस्त करती हैं. लड़के और पुरुष गालियों के ज़रिये दूसरे व्यक्ति के सम्मान को चोट पहुँचाते हैं.

लड़कियाँ क्या गालियाँ देती हैं


दिलचस्प तो यह है कि लड़कियाँ और स्त्रियाँ भी जब गालियों के ज़रिये दबंगई करती हैं, तो वे वही गालियाँ होती हैं जो बेटी, बहन, माँ के नाम पर लड़के या पुरुष देते हैं. वे भी अपने शरीर को अकड़ने की कोशिश करती हैं. चिल्लाती हैं. झगड़े करती हैं. गालियाँ देती हैं. मौक़ा मिले तो मारपीट का सहारा लेती हैं.

लड़कियों और स्त्रियों को भी लगता है कि अगर उन्हें अपनी ताक़त या सत्ता का अहसास कराना है तो उन्हें भी वह सब करना चाहिए जो सदियों से 'दबंग मर्दाना' करते आये हैं. वे लड़कों जैसा दबंग बनना चाहती हैं. वे उन मूल्यों को आत्मसात कर रही होती हैं, जो लड़कों को सदियों से दबंग बनाता आया है. अनजाने में वे उसी मर्दाना विचार को मज़बूत करती हैं, जो सदियों से उनकी यानी स्त्री जाति को हर तरह से दबाता आया है. बेइज़्ज़त करता आया है.

पितृसत्तात्मक विचार ने सबको अपने शिकंजे में ले रखा है. इसीलिए यह ताज्जुब की बात नहीं है कि लड़कों की ही तरह लड़कियों के बीच गालियों में बात करना अब फ़ैशन का हिस्सा बनता जा रहा है. वे बहुत धड़ल्ले से माँ-बहन-बेटी से जुड़ी गालियाँ बोलती हैं.

अंग्रेज़ी में दी जाने वाली गालियाँ भी उनके मुँह से धड़ल्ले से निकलती है.

गालियां
Getty Images
गालियां

लड़कियाँ क्या कहती हैं


एमए में पढ़ने वाली एक लड़की पूजा का कहना है कि दोस्तों संग बात करते-करते वो कब गालियाँ देने लगीं, पता ही नहीं चला. इसमें लड़कियों के जननांग पर हमला करने वाली गालियाँ भी हैं. उनके लिए यह सब बातचीत का सहज हिस्सा बन गया है.

बीए में पढ़ने वाली अरुंधति बताती हैं कि लड़कियाँ वे सभी गालियाँ देती हैं, जो लड़के देते हैं. शहरी माहौल में पली-बढ़ी यह लड़की एक और इशारा करती है. उसका कहना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आने वाली फ़िल्मों और सीरियलों ने गालियों को 'कूल' बना दिया है. यानी गालियाँ बातचीत का सहज हिस्सा बन गयी हैं. अगर गालियों का इस्तेमाल न हो तो लगता है कि हम नये ज़माने के नहीं हैं.

लड़कों का नहीं तो लड़कियों का गाली देना बुरा क्यों


ज़रा कोशिश करते हैं. गूगल या यूट्यूब पर तलाश करते हैं. हमें अनेक ऐसे वीडियो मिलते हैं. हालाँकि ख़ास बात इनके शीर्षक में दिखी- औरतें गालियाँ देती हुईं, शॉकिंग! महिला ने डंडे से ऐसे धोया कि..., देखिये ये औरत एक बार में कैसे 100 गाली देती है, नोएडा की गालीबाज़ महिला… वग़ैरह… वग़ैरह!

इसलिए एक बड़ा सवाल है. हमें लड़कों और मर्दों का गाली देना अटपटा या बुरा नहीं लगता. वे सुबह से शाम तक माँ-बहन-बेटी कर रहे होते हैं और कहीं कोई वीडियो वायरल नहीं हो रहा था. क्यों? क्योंकि मर्दों का यह सहज बर्ताव मान लिया गया है. या यों कहें, उनके गुणों में यह शामिल है- दबंगई और गालियाँ देना. स्त्री जाति पर शब्दों और शरीर से हमला करना. शायद इसीलिए गाली देते मर्दों के ऐसे वीडियो शायद ही मिलें. वायरल तो न के बराबर मिलेंगे.

गालियां
Getty Images
गालियां

तो अब सवाल है, अगर लड़के गाली दे सकते हैं तो लड़कियाँ क्यों नहीं?

यह सवाल ही ग़लत है. अगर गालियाँ हिंसा है तो लड़का दे या लड़की- ग़लत है. गालियाँ बेहतर इंसान नहीं बनातीं. वह क्रूर बनाती हैं. हिंसक बनाती हैं. नफ़रत पैदा करती हैं… और सबसे बढ़कर बुराइयों में समानता की तलाश ही क्यों?

गालियों को न कहना होगा


इसलिए अगर लड़कियों और स्त्रियों को 'पितृसत्ता' को ध्वस्त करना है या 'ज़हरीली मर्दानगी' से निजात पाना है तो महज़ अधिकारों पर दावे से काम नहीं चलेगा उन्हें नयी जीवन संस्कृति के लिए भी काम करना होगा. संवाद की नयी भाषा भी गढ़नी होगी.


ये भी पढ़ें...

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+