महात्मा गांधी @ 150 : जब हिंदू चाय और मुस्लिम चाय की कहानी सुन बेचैन हो गए गांधी
ये क़िस्सा 1909 का है जब महात्मा गांधी अपनी चर्चित किताब 'हिंद स्वराज' लिख रहे थे, उस समय पोरबंदर, राजकोट, मुंबई और उन जगहों पर एक कहावत प्रचलित थी, जहां गांधी कभी रहे थे.
कहावत थी कि मियां और महादेव की नहीं बनती, बन ही नहीं सकती, दोनों में बहुत फ़र्क है.
महात्मा गांधी को ये बात बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी कि ये कहावत किस आधार पर बनी है और क्यों कही जाती है इस तरह से.
क्योंकि उनका पूरा जीवन और बचपन के तमामत दोस्त ऐसे ही थे. इनमें शेख़ महताब भी थे, जिनके साथ वो खेलते भी और जिन्होंने गांधी को गोश्त खिलाया था और बल्कि साल भर खिलाते रहे थे.
जब गांधी की पहली नौकरी लगी तो उन्हें नौकरी देने वाले दादा अब्दुल्ला थे दक्षिण अफ़्रीका में.
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जब वो लौट कर भारत आए और डांडी मार्च के समय जिस आदमी को तय किया कि उनकी गिरफ़्तारी के बाद इस मार्च का नेतृत्व करेगा, वो अब्बास तैयब थे.
इसीलिए गांधी को ये नहीं समझ आता था कि ये मुहावरा क्यों बना, कैसे बना और क्यों लोगों में प्रचलित है. इसकी कोई वजह उन्हें कोई दिखाई नहीं देती थी.
द्वि राष्ट्र सिद्धांत पर गांधी का जवाब
जब उनसे पूछ लिया कि मुस्लिम लीग की टू नेशन थिअरी (द्वि राष्ट्र सिद्धांत) पर आपका क्या कहना है?
तो उनका था कि 'ये बिल्कुल ग़लत है. इस देश में टू नेशन थियरी हो ही नहीं सकती है और अगर हो सकती है तो थ्री, फ़ोर फ़ाईव नेशन थियरी क्यों नहीं है. ईसाई कहां जाएंगें, जैन का क्या होगा, बौद्धों का क्या करेंगे आप. अगर धर्म ही आधार है तो इनका क्या होगा, इन धर्मों ने कौन सा गुनाह किया है. तो ये हो नहीं सकता, ये संभव नहीं है.'
वो चाहते थे कि सब लोग साथ रहें, जबतक वो साथ नहीं रहेंगे, जबतक साम्प्रदायिक एकता नहीं होगी, तबतक भारत को आज़ादी नहीं मिल सकती.
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उस समय भारत के वायसराय वावेल थे और जब गांधी की उनसे तबके कलकत्ता में मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा कि 'हम जिस हाल में हैं, हमें छोड़ दीजिए. हमें छोड़ कर चले जाईए हम अपने फ़ैसले, अपनी समस्याएं खुद हल कर लेंगे. क्योंकि आप रहेंगे तो आग में घी डालने का काम करते रहेंगे.'
उन्होंने लगभग इन शब्दों में वॉवेल से कह दिया कि आपकी ज़रूरत नहीं है क्योंकि आपके रहते हिंदू मुसलमान एकता हो ही नहीं सकती, वो संभव नहीं है.
गांधी लोगों से तमाम बातें लगातार कहते रहे और बातचीत करते और अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की.
ये और बात थी कि द्वि राष्ट्र सिद्धांत जैसा भी हो, पाकिस्तान बाद में बना. यहां से तमाम लोग गए और इसके बाद जो हिंसा हुई जिसे रोकने के लिए महात्मा गांदी की सोहरावर्दी के साथ बैठकें करने और उनके यहां ठहरने पर बाद में भी सवाल उठाया जाता रहा.
लेकिन गांधी का कहना था, "मैंने इस हिंदू मुसलमान फसाद की जड़ कितनी गहरी है उसका थोड़ अंदाज़ा दक्षिण अफ़्रीका में हुआ था, लेकिन ज़्यादा पता हिंदुस्तान आकर लगा."
साल 1915 में हरिद्वार में कुंभ लगा था और गांधी कुंभ मेले में जा रहे थे.
रास्ते में जब ट्रेन सहारनपुर रुकी तो उन्होंने देखा कि लोग पसीना पसीना हैं, गला सूख रहा है, पानी नहीं है, लेकिन अगर पानी पिलाने वाला आता था और उन्हें पता चल जाए कि वो मुसलमान है तो वो पानी नहीं पीते थे.
सांप्रदायिक विद्वेष
वो हिंदू पानी का इंतज़ार करते थे, मुसलमान पानी पी सकते थे, जान भले ही चली जाए.
बहुत समय तक गांधी को ये बात सालती रही कि अगर डॉक्टर मुसलमान हो और वो आपको दवा दे तो ले लेंगे लेकिन उसके हाथ का पानी नहीं पिएंगे, इसका मतलब है कि समस्या समाज में है, बाहर है, आपके अंदर है, उससे इसका कोई मतलब नहीं है कि आप हिंदू हैं या मुसलमान हैं.
आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग जब गिरप़्तार हुए और उनपर मुकदमा चलने वाला था और सारे लोग लाल क़िले में बंद थे, तो गांधी उनसे मिलने गए.
गांधी ने पाया कि जो उन्होंने कलकत्ता में वॉवेल से बात कही थी कि आपके रहते एकता नहीं हो सकती, वो कितनी सच थी.
आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों ने गांधी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान चाय अभी आने वाली है.
हिंदू चाय, मुसलमान चाय
तो उन्होंने सिपाहियों से पूछा कि आप करते क्या हैं. तो उनका जवाब था कि 'ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग बने और मुसलमान चाय अलग बने.'
तो गांधी ने पूछा कि 'आप क्या करते हैं अगर हिंदू चाय और मुसलमान चाय अलग अलग दी जाती है?'
उनका कहना था कि 'हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं.'
महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम करने के ढंग की, हिंसा पर जो उनका भरोसा था उस पर, फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी.
लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि 'सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं.'
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