1965 में उड़ाए पाकिस्तीन के परखच्चे, पैर खोकर भी की देश की सेवा, लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय?

Lt Gen Vijay Oberoi: देश ने भारतीय सेना के एक ऐसे अधिकारी को खो दिया है, जिनकी पहचान सिर्फ एक सैनिक के रूप में नहीं बल्कि साहस, जज्बे और सेवा के प्रतीक के रूप में भी की जाती थी। भारतीय सेना के पूर्व वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय (Lieutenant General Vijay Oberoi) का सोमवार सुबह चंडीगढ़ स्थित आर्मी हॉस्पिटल में निधन हो गया।

विजय ओबराय पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की जानकारी मिजोरम के राज्यपाल और पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की। लेफ्टिनेंट जनरल ओबेरॉय का जीवन संघर्ष, कर्तव्य और प्रेरणा की मिसाल रहा। युद्ध में गंभीर चोट लगने और एक पैर गंवाने के बावजूद उन्होंने सेना में लंबे समय तक सेवा दी और रिटायरमेंट के बाद भी सैनिकों के अधिकारों के लिए लगातार काम करते रहे।

Lt Gen Vijay Oberoi

जनरल वी.के. सिंह ने दी जानकारी

मिजोरम के राज्यपाल जनरल वी.के. सिंह ने एक्स पर पोस्ट करते हुए बताया कि लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय का सोमवार सुबह चंडीगढ़ के आर्मी हॉस्पिटल में निधन हो गया। उन्होंने उन्हें एक सम्मानित सैनिक, सैन्य विशेषज्ञ और प्रेरणादायक व्यक्तित्व बताया। उनके अनुसार, ओबेरॉय ने अपने पूरे जीवन में देश और सैनिकों की सेवा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।

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1965 के युद्ध में गंवाया था दाहिना पैर

लेफ्टिनेंट जनरल विजय ओबेरॉय वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर में अपनी यूनिट के साथ तैनात थे। इसी दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए और उनका दाहिना पैर काटना पड़ा। हालांकि इस बड़ी शारीरिक चुनौती ने उनके हौसले को कभी कमजोर नहीं किया। कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने सेना में अपनी जिम्मेदारियां निभाईं और चार दशक से अधिक समय तक शानदार सेवा करते रहे।

विदेश में भी निभाई अहम जिम्मेदारी

विजय ओबेरॉय ने सैन्य शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की थीं। वह अमेरिका के यूएस आर्मी वॉर कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों में शामिल रहे। इसके अलावा उन्होंने मलेशिया में मिलिट्री एडवाइजर के रूप में भी काम किया। अपने अनुभव और समझ के कारण वह रक्षा मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ माने जाते थे।

रिटायरमेंट के बाद भी सैनिकों के लिए रहे सक्रिय

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने युद्ध में घायल और दिव्यांग सैनिकों के हितों के लिए लगातार आवाज उठाई। इसी उद्देश्य से उन्होंने 'वॉर वूंडेड फाउंडेशन' की स्थापना की। इसके साथ ही वह 'सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज (CLAWS)' के संस्थापक निदेशक भी रहे। रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनकी राय को गंभीरता से सुना जाता था।

72 साल की उम्र में दौड़ी मुंबई मैराथन

विजय ओबेरॉय का जज्बा उम्र और शारीरिक सीमाओं से कहीं बड़ा था। 72 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने कृत्रिम पैर के साथ मुंबई मैराथन में हिस्सा लेकर सबको चौंका दिया था। उनका मकसद यह दिखाना था कि मजबूत इच्छाशक्ति के सामने कोई भी मुश्किल बड़ी नहीं होती। यह कदम युद्ध में घायल सैनिकों के लिए भी प्रेरणा का संदेश था।

युद्ध में घायल सैनिकों के अधिकारों के पक्षधर

लेफ्टिनेंट जनरल ओबेरॉय अक्सर कहा करते थे कि युद्ध में घायल होकर स्थायी रूप से प्रभावित हुए सैनिकों को भी शहीदों के बराबर सम्मान मिलना चाहिए। उनका मानना था कि देश के लिए अपना शरीर और स्वास्थ्य खो देने वाले सैनिकों का योगदान किसी भी तरह कम नहीं आंका जा सकता। उन्होंने ऐसे सैनिकों की आर्थिक मजबूती और सम्मानजनक जीवन के लिए लगातार काम किया।

लेखन और सैन्य अध्ययन में भी छोड़ी पहचान

सैन्य सेवा के अलावा विजय ओबेरॉय एक अच्छे लेखक और विचारक के रूप में भी जाने जाते थे। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, नेतृत्व और रक्षा नीति जैसे विषयों पर कई लेख और पुस्तकें लिखीं। उनके विचारों का प्रभाव सैन्य अध्ययन और रणनीतिक मामलों से जुड़े लोगों के बीच लंबे समय तक बना रहेगा।

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