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Forest Movement in India: देश के वो 5 बड़े वन आंदोलन, जिसमें पेड़ों के लिए लोगों ने लगा दी जान की बाजी

Forest Movement in India: वनों की सुरक्षा, जंगली जानवरों के हित को उजागर करने के लिए हर साल 21 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस (International Day of Forests) मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य वनों के संरक्षण और उनके सतत विकास को बढ़ावा देना है। ये दिन हमें वनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी को याद रखने का मौका देता है।

भारत में वनों के संरक्षण उनके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए कई बड़े-बड़े आंदोलन हुए जिसमें हजारों लोगों ने अपना समर्थन दिया और अपनी जान की बाजी लगा दी। आईए देश के पांच बड़े वन आंदोलनों के बारे में विस्तार से जानते हैं..

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आपिको आंदोलन: शिवमोगा

साल 1983 में उत्तर कर्नाटक में जंगलों को बचाने के लिए एक विशाल जन आंदोलन (Aapiko Movement) हुआ। पांडुरंग हेगड़े के नेतृत्व में शिमोगा जिले में हुआ ये आंदोलन चिपको आंदोलन से प्रेरित था। वन विभाग के लोग जब पेड़ काटने आते थे तो वहां के लोग पेड़ों से चिपक जाते थे। इस दौरान जागरूकता फैलाने के लिए जंगलों में पैदल मार्च, स्लाइड शो, लोकनृत्यों, नुक्कड़ नाटकों जैसे कई तरीके अपनाए गए थे। आखिरकार इस आंदोलन की जीत हुई और सरकारी विभाग ने जंगल के हित को प्राथमिकता दी।

Forest Movement: जंगल बचाओ आंदोलन: झारखंड

साल 1982 में झारखंड के सिंहभूम जिले में आदिवासियों द्वारा अपने जंगलों को बचाने के लिए एक बड़ा आंदोलन हुआ। दरअसल, वहां के घने जंगलों से कीमती सागौन के पेड़ों को काटने के लिए सरकार ने एक योजना बनाई। इस सरकारी योजना से जंगलों में रह रहे हजारों आदिवासियों के निवास पर एक खतरा मंडराने लगा। सरकार की इस योजना को 'सियासत का लालची खेल' करार दिया गया। उड़ीसा और झारखंड में 1978-83 तक चले इस मूवमेंट के दौरान 18 आंदोलनकारी मारे गए, सैकड़ों लोग घायल हुए थे। साल 2006 में जब UPA सरकार ने जंगल अधिकार कानून पास किया, तब जाकर आदिवासियों को राहत मिली।

Forest aandolan in India: साइलेंट वैली बचाओ अभियान: केरल

साल 1973 में केरल के बिजली बोर्ड ने एक बड़े डैम की योजना बनाई तब 8 वर्ग किमी लंबे हरे-भरे जंगल पर खतरा मंडराने लगा। इन पेड़ों को बचाने के लिए एक्टिविस्ट सुगाथा कुमारी ने केरल शास्त्र साहित्य परिषद नामक संस्था ने इस जंगल को बचाने के लिए एक अभियान छेड़ा। इस Silent Valley Movement को बड़े जनसमूह का समर्थन मिला। इसका सरकार पर दबाव पड़ा और 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने साइलेंट वैली को संरक्षित करने की घोषणा की और हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट 1983 को वापस ले लिया।

Forest Movement in India: चिपको आंदोलन: उत्तराखंड

महिलाओं द्वारा किए गए इस आंदोलन को देश भला कैसे भूला सकता है। साल 1973 में उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल और चमोली में हजारों स्त्रियों ने पेड़ों से चिपकर अपनी ममता दिखाई थी। इस ऐतिहासिक आंदोलन को सुंदरलाल बहुगुणा ने शुरू किया था जिसकी प्रमुख मांग थी जंगल के पेड़ों और संसाधनों का मुनाफा स्थानीय लोगों के हक में मिले।

Chipko Movement में कई बड़े नेता शामिल रहे लेकिन सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी और सुदेशा देवी महत्वपूर्ण थे नतीजा ये निकला कि लोग पेड़ों को गले लगाने लगे और पवित्र धागे बांधने लगे ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके। 1978 में सरकार ने ग्रामीणों के पक्ष में फैसला किया।

Forest Movement in India: बिश्नाई आंदोलन: राजस्थान

इस आंदोलन का इतिहास 400 साल पुराना है। साल 1700 के आस-पास मारवाड़ क्षेत्र के इलाके में नए महल बनाने के लिए सैनिक पेड़ों को काटने लगे। वहां की अमृता देवी को पेड़ काटना गवारा नहीं हुआ इसलिए उन्होंने ग्रामीणों को पेड़ बचाने के लिए जागरुक किया। ग्रामिणों और सैनिकों के साथ संघर्ष में बिश्नोई समुदाय के 363 ग्रामीण मारे भी गए। अस्ल में, बिश्नोई समुदाय के गुरु महाराज जम्बाजी ने 1485 में इस पंथ की स्थापना के समय पेड़ों और जानवरों की हत्या माना थी। Bishnoi Andolan इतना बड़ा था कि लोककलाओं में आज तक जिंदा है।

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