'हमें यूक्रेनियन ने पोलैंड जाने के लिए ट्रेनों में नहीं चढ़ने दिया, मारपीट की...', भारत लौटी छात्रा की आपबीती
'हमें यूक्रेनियन ने पोलैंड जाने के लिए ट्रेनों में नहीं चढ़ने दिया, मारपीट की...', भारत लौटी छात्रा की आपबीती
कराईकल, 07 मार्च: यूक्रेन और रूस के जंग के बीच भारतीय छात्रों को ऑपरेशन गंगा के तहत सरकार भारत ला रही है। यूक्रेन के खार्किव में वीएन कारजिन खार्किव नेशनल यूनिवर्सिटी में मेडिकल की पढ़ाई करने वाली शिवशंकरी स्वदेश वापस लौट आई हैं। शिवशंकरी अपना मेडिकल डिग्री कोर्स पूरा करने से तीन महीने ही दूर थीं। शिवशंकरी ने भारत आने के बाद यूक्रेन में हो रहे हमले के बीच जिन परेशानियों का उन्होंने सामना किया है, उसके बारे में बात की है। 22 वर्षीय शिवशंकरी ने बताया है कि कैसे उन लोगों को यूक्रेनियन ने पोलैंड जाने के लिए ट्रेनों में चढ़ने नहीं दिया और जिन भारतीयों ने ट्रेनों में चढ़ने की कोशिश की , उनके साथ यूक्रेनियन ने मारपीट भी की है। शिवशंकरी भारत के कराईकल की रहने वाली हैं। कराईकल के और भी 4 छात्र अभी यूक्रेन में ही हैं। शिवशंकरी 05 मार्च को भारत लौटी हैं।
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'भारतीय छात्र की मौत के बाद हम अधिक डरे हुए थे...'
अपने कठिन समय को याद करते हुए, शिवशंकरी ने कहा, ''मैं भारतीय और यूक्रेनी छात्रों के एक समूह के साथ रही। हम जिस अपार्टमेंट बंकर में रुके थे, वह विश्व युद्ध के दौरान बनाया गया था। उनके पास उचित ताले नहीं थे, इसलिए हम लड़कियों ने बारी-बारी से निगरानी रखी। उनके पास बिजली नहीं थी। हम बाहर आए जब उन्होंने गोलाबारी बंद कर दी और मेट्रो स्टेशनों पर हमारे फोन चार्ज कर दिए। (भारतीय छात्र) नवीन की मौत के बाद हम ज्यादा डरे हुए थे।'

'मैं कई दिनों तक भूखी रही...'
शिवशंकरी ने कहा, '''मैं कई दिनों तक भूखी रही हूं। मैंने भोजन के लिए संघर्ष करते हुए अपना वजन कम किया।'' शिवशंकरी और कई अन्य छात्र अंतत 1 मार्च को यूक्रेन-पोलैंड सीमा के करीब लविवि के लिए एक निकासी ट्रेन में सवार होने में कामयाब रहे। शिवशंकरी ने कहा ,''खार्किव में यूक्रेनियन हमारे वर्षों के प्रवास के दौरान हमारे लिए अच्छे थे। लेकिन जैसे ही शहर पर हमला शुरू हुआ, हमें लगा कि वे नहीं चाहते कि हमें सुरक्षा मिले। वो हमें किसी भी जगह छोड़ देना चाहते थे।''

'यूक्रेनियाई लोगों ने हमें ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया...'
शिवशंकरी ने कहा, ''शहर से भागे यूक्रेनियाई लोगों ने हमें ट्रेन में चढ़ने नहीं दिया और हमारे साथी भारतीय छात्रों के साथ मारपीट भी शुरू कर दी, क्योंकि वे सीट लेने के लिए दौड़ पड़े। यह डरावना था। हम मुश्किल से यात्रा में बच गए। यूक्रेन-पोलैंड सीमा पार करने और वारसॉ में पैर रखने के बाद ही हमें राहत मिली थी।''

'मैं नहीं चाहती थी कि मेरी बहन भी वो झले जो मैंने देखा है...'
शिवशंकरी के पिता वी अंबाझगन एक सेवानिवृत्त स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी हैं, जबकि उनकी मां जयलक्ष्मी एक सरकारी शिक्षक हैं। शिवशंकरी की एक बहन पुडुचेरी के जिपमर में मेडिसिन की पढ़ाई कर रही है, जबकि दूसरी बहन 11वीं कक्षा में है। शिवशंकरी ने जोर देकर कहा कि वह नहीं चाहती थी कि उसकी बहनों को वह सब झेलना पड़े जो उसने झेला।

'घर के मकान मालिक ने की मदद'
एमबीबीएस की छात्रा टी सरोजा बताती हैं, ''मेरे अपार्टमेंट के मालिक ने अपने बच्चों के साथ एक बंकर में शरण ली थी। वह मुझे अपने साथ भी लेकर गए थे। उनके पास भी खाने-पीने का स्टॉक सीमित था। लेकिन फिर भी उसने मुझे खाना दिया और मेरी देखभाल की।''












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