Farm Bills:MSP समेत दूसरी चिंताओं की जमीनी हकीकत क्या है, जिसका हो रहा है विरोध

नई दिल्ली- संसद से पास कृषि विधेयकों को लेकर अभी खूब हंगामा चल रहा है। विपक्ष सरकार को किसान विरोधी साबित करने में लगा हुआ है और सरकार का दावा है कि वह किसानों के हित में काम कर रही और विपक्ष किसानों को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। सच्चाई ये है कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में नए कृषि विधेयकों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन भी हो रहे हैं। मोदी सरकार की पंजाब से एक सहयोगी शिरोमणी अकाली दल इस मसले पर सरकार से बाहर निकल चुकी है तो हरियाणा में भाजपा सरकार की सहयोगी जननायक जनता पार्टी पर भी सरकार से समर्थन वापस लेने का भारी सियासी दबाव है। इन सबके बीच जो एक असल मुद्दा थोड़ा पीछे रह जा रहा है वह यह कि जिस बात को लेकर इन विधेयकों पर हंगामा बरपा है, उसकी जमीनी हकीकत है क्या ?

कृषि विधेयकों पर चिंताओं की हकीकत क्या है

कृषि विधेयकों पर चिंताओं की हकीकत क्या है

संसद से पारित कृषि विधेयकों को लेकर विपक्ष खूब बवाल काट रहा है। खासतौर पर हरियाणा और पंजाब में किसानों ने भी सड़कों पर उतरकर इन दोनों विधेयकों का विरोध किया है। ऐसे में इन विधेयकों का जमीनी हकीकत समझना जरूरी है। हरियाणा-पंजाब के किसानों को डर है कि अब सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनसे अनाज नहीं खरीदेगी। जबकि, हकीकत इसके ठीक उलट है। मंदी में पहले जिस तरह से कारोबार होता था, उसपर कोई रोक नहीं है और वह उसी तरह से चलती रहेगी। इसके बजाय अब किसानों को अपने उत्पाद अपनी इच्छा के मुताबिक दूसरी जगहों पर बेचने का अधिकार मिल गया है। इसकी वजह से किसानों के उत्पाद खरीद को लेकर प्रतियोगिता और पारदर्शिता बढ़ने की संभावना है, जिसका फायदा किसानों को मिल सकता है। आइए कृषि विधेयकों को लेकर जारी शंकाओं और उसकी हकीकत को थोड़ा गौर से समझते हैं।

आशंकाएं बनाम हकीकत- पहला विधेयक

आशंकाएं बनाम हकीकत- पहला विधेयक

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) विधेयक-2020 का विरोध क्यों हो रहा है और उसकी सच्चाई क्या है-

आशंकाएं-
न्यूनतम समर्थन मूल्य से खरीद रुक जाएगी।

मंडियां बंद हो जाएंगी, क्योंकि मंडी के बाहर ही कृषि उपज बेची जाने लगेंगी।

सरकारी खरीद पोर्टल-ई-एनएएम का क्या होगा?

हकीकत-
न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत खरीदारी होती रहेगी, किसान इस कीमत पर अपने उत्पाद पहले की तरह बेच सकते हैं।

मंडियों में पहले की तरह ही काम होता रहेगा।

नई व्यवस्था में किसानों को मंडियों से बाहर भी दूसरी जगहों पर अपनी इच्छानुसार अपने उत्पाद बेचने का विकल्प मिलेगा।

ई-एनएएम की व्यवस्था मंडियों में जारी रहेगी।

ई-प्लेटफॉर्म पर कृषि उत्पाद का कारोबार बढ़ेगा।

आशंकाएं बनाम हकीकत- दूसरा विधेयक

आशंकाएं बनाम हकीकत- दूसरा विधेयक

कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 का विरोध क्यों हो रहा है और उसकी असलियत क्या है-

आशंकाएं-
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों पर दबाव बढ़ेगा और वह कीमतें तय नहीं कर पाएंगे।

विवाद होने पर बड़ी कंपनियों का फायदा होगा।

हकीकत-
कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में किसानों को अपनी उत्पाद की कीमतें तय करने का पूरा अधिकार होगा।

उन्हें 3 दिनों के भीतर पैसों का भुगतान हो जाएगा।

बड़े किसान निकाय कर रहे हैं समर्थन

बड़े किसान निकाय कर रहे हैं समर्थन

हरियाणा और पंजाब में हो रहे कुछ विरोधों को छोड़कर आमतौर पर बड़े किसान निकायों ने कृषि बिलों का खुलकर समर्थन किया है। माना जा रहा है कि हरियाणा और पंजाब में विरोध की मुख्य वजह प्रभावी आढ़तियों (बिचौलियों) और कमीशन एजेंटों की वजह से हो रहा है। मसलन, भारतीय किसान संघ के कंसोर्टियम के मुख्य सलाहकार पी चेंगल रेड्डी ने इन विधेयकों का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है, 'किसान किसानों द्वारा शुरू किए गए एपीएमसी रिफॉर्म्स का स्वागत करते हैं। एपीएमसी किसानों के फायदे के लिए शुरू किया गया था। लेकिन, वे आढ़तियों और बिचौलियों की दया पर रह गए थे। अब हम सीधे प्रोसेसिंग इंडस्ट्री या निर्यात के लिए बड़े स्तर के रिटेल से कॉन्ट्रैक्ट कर सकते हैं।' उधर दशकों से इस तरह के बदलाव की मांग कर रहे महाराष्ट्र के शेतकारी संगठन ने भी इन प्रयासों का स्वागत किया है। इसके अध्यक्ष अनिल घंनवट का कहना है कि मंडियों में कारोबारी किसानों का शोषण करते थे। इस विधेयक ने किसानों की वह बाध्यता ही खत्म कर दी है।

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