लखीमपुर खीरी: "हमें इंसाफ़ चाहिए, भले अपना पैसा वापस ले ले सरकार"- ग्राउंड रिपोर्ट

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पिछले साल तीन अक्टूबर की सुबह 55 साल के नक्षत्र सिंह अपने गाँव नामदार पुरवा से क़रीब 70 किलोमीटर दूर तिकुनिया में किसान आंदोलन के तहत होने वाले एक विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए घर से निकले.

जाते वक़्त उन्होंने अपने परिवार से कहा कि वो किसान आंदोलन में शामिल होने दिल्ली तो नहीं जा पाए, इसलिए तिकुनिया जा रहे हैं और कुछ घंटों में लौट आएंगे.

Family demands justice in Lakhimpur Kheri case

नक्षत्र सिंह घर तो लौटे, लेकिन ज़िंदा नहीं.

उस दिन लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में जो 4 किसान और एक पत्रकार थार जीप के नीचे कुचले गए, उनमें नक्षत्र सिंह भी थे.

दो परिवार, एक जैसा दर्द

नक्षत्र सिंह का परिवार आज भी इस दर्द को झेल रहा है.

उनकी पत्नी जसवंत कौर कहती हैं, "वो पहली बार किसान आंदोलन में शामिल होने गए थे. वो तो देखने गए थे. वो लड़ाई-झगड़ा थोड़े ही करने गए थे. हम लोगों ने ये भी नहीं सोचा था कि वो जायेंगे तो वापस नहीं आएंगे. हमने तो हँसते-खेलते विदा किया था और सोचा था कि अभी जा रहे हैं तो आ ही जायेंगे घंटे-दो घंटे में."

उसी दिन जैपरा गाँव में रहने वाले भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ता श्याम सुंदर निषाद भी अपने घर से ये कह कर निकले कि वो बनबीर पुर में हर साल होने वाला दंगल देखने जा रहे हैं.

उनके परिवार को भी कुछ घंटों बाद पता चला कि उन्हें तिकुनिया में चोटें लगी हैं. उस दिन घर से निकलते वक़्त श्याम सुंदर निषाद ने अपने परिवार के सदस्यों से जो विदा ली, वो उनकी आख़िरी विदाई साबित हुई.

श्याम सुंदर निषाद की माँ फूलमती आज भी उस दिन को याद करती हैं, तो अपने आंसू रोक नहीं पातीं.

इन दोनों परिवारों के घरों के बीच का फ़ासला भले ही ज़्यादा है, लेकिन उनका दुःख एक जैसा ही है और दोनों ही परिवारों को इंतज़ार है तो सिर्फ़ इंसाफ़ का.

'डर तो है ही'

इस मामले में केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री और लखीमपुर खीरी के सांसद अजय मिश्र उर्फ़ टेनी के बेटे आशीष मिश्र मुख्य अभियुक्त हैं. क़रीब चार महीने जेल में रहने के बाद हाल ही में आशीष मिश्र को अदालत से ज़मानत मिल गई है.

इस बात ने नक्षत्र सिंह के परिवार की चिंताएं बढ़ा दी है. उनका कहना है कि उन्हें डर महसूस होता है.

वो ये आरोप भी लगाते हैं कि हत्या के मामले में आशीष मिश्र को ज़मानत मिल जाना, उनके मंत्री पिता के राजनीतिक प्रभाव का नतीजा है.

इस परिवार के घर के बाहर उत्तर प्रदेश पुलिस का पहरा लगा है. लेकिन इंसाफ़ मिलने की उनकी उम्मीद कम होती जा रही है.

नक्षत्र सिंह के पुत्र जगदीप सिंह कहते हैं, "सरकार से कोई उम्मीद रखी ही नहीं जा सकती. सरकार अंधी, गूंगी और बहरी हो चुकी है. न वो कुछ देखना चाहती है और न वो कुछ सुनना चाहती है."

नक्षत्र सिंह की पत्नी जसवंत कौर कहती हैं, "पांच महीने हो गए हैं. अभी तक इंसाफ़ मिला नहीं है. इंसाफ़ मिला होता तो फिर बेल क्यों हुई उनकी?"

'आज़ाद भारत का जलियाँवाला बाग़'

लखीमपुर खीरी में उत्तर प्रदेश विधान सभा के चौथे चरण में 23 फ़रवरी को मतदान होने जा रहा है और चुनाव प्रचार में ये मुद्दा गरमाया हुआ है.

19 फ़रवरी को लखीमपुर खीरी के जीआईसी मैदान में हुई एक जनसभा में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने कहा, "जीप से किसानों को कुचल दिया गया. किसानों की जान चली गई. आज़ाद भारत में जलियाँवाला बाग़ की याद दिला रही है ये घटना."

भारतीय जनता पार्टी 20 फ़रवरी को इस मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक जनसभा आयोजित करने वाली थी. लेकिन गड़बड़ी होने की आशंका की वजह से इस जनसभा को रद्द कर दिया गया.

स्थानीय भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने माना कि प्रशासन कि तरह से ये चिंता जताई गई थी कि प्रधानमंत्री की जनसभा में किसान आंदोलन से जुड़े लोग विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं और काले झंडे दिखा सकते हैं. भाजपा नेताओं ने कहा कि इस जनसभा को अब एक वर्चुअल जनसभा में तब्दील कर दिया गया है.

लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी के नेता रामपाल सिंह यादव कहते हैं, "किसान उसी बात से आक्रोशित हैं, नाराज़ हैं क्योंकि उनको इंसाफ़ नहीं मिल रहा है. अजय मिश्र के बेटे को चार महीने में ही ज़मानत मिल जाती है... तो ये पक्षपात हो रहा है और किसान यह बात समझ रहा है."

'बाहर से आए लोगों ने इस घटना को दिया अंजाम'

जहाँ विपक्षी पार्टियां पिछले साल तीन अक्टूबर को हुई घटना का ज़िक्र चुनाव प्रचार में बार-बार छेड़ रही हैं, वहीं इस बारे में भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं का कुछ और ही कहना है.

लखीमपुर खीरी में भाजपा नेता आशु मिश्र तीन अक्टूबर को हुई घटना के बारे में कहते हैं, "वे लोग बाहरी थे. उन्होंने एक सुनियोजित ढंग से आकर उस घटना को अंजाम दिया. शासन-प्रशासन की कहीं न कहीं लापरवाही रही, वरना ये घटना होती भी नहीं इस ज़िले में."

नक्षत्र सिंह का परिवार इस बात से आहत महसूस करता है. जसवंत कौर कहती हैं, "जिनके परिवार के लोग मारे गए और जिन्हें चोटें लगीं, उनसे पूछ के देखिए कि वो किसान हैं या नहीं."

'उनको दुःख है ही नहीं हम लोगों का'

इस परिवार का ये भी कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार से किसी का भी उनके दुःख में शरीक न होना ये दिखाता है कि सरकारों को उनके दुःख से कोई लेना-देना नहीं है.

जसवंत कौर कहती हैं, "जिन्होंने दर्द समझा, वो सब हमारे यहाँ आए. पर ये दो सरकारें- केंद्र सरकार और यूपी सरकार- ये अभी तक हमारे यहाँ नहीं आए. इनको दुःख होता तो हमारे यहाँ ज़रूर आते. उनको दुःख है ही नहीं हम लोगों का. जो ये लोग आते तो हमको तसल्ली होती कि हमको इंसाफ़ मिलेगा."

वहीं श्याम सुन्दर निषाद के परिवार को मुआवज़ा तो मिला, लेकिन एक पारिवारिक विवाद की वजह से वो उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा.

ये परिवार नहीं जानता कि आगे क्या होगा. श्याम सुंदर निषाद के भाई संजय निषाद कहते हैं, "अब पता नहीं इंसाफ़ मिलेगा या नहीं मिलेगा. हमारा भाई तो ज़िंदा होगा नहीं अब."

वहीं नक्षत्र सिंह के परिवार का कहना है कि उन्हें मुआवज़ा तो मिला पर न्याय नहीं. जसवंत कौर कहती हैं, "हमें इंसाफ चाहिए, भले ही अपना पैसा वापस ले ले सरकार. हमको इंसाफ़ के सिवा और कुछ नहीं चाहिए."

लखीमपुर खीरी के ये इलाके गन्ने की खेती और गुड़ की मिठास के लिए जाने जाते रहे हैं. लेकिन पिछले साल हुई घटना की कड़वाहट यहाँ के लोगों के ज़हन में अब भी महसूस की जा सकती है.

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