मनमोहन सिंह: अर्थव्‍यवस्‍था के जानकार से लेकर कमजोर प्रधानमंत्री बनने तक का सफर

Manmohan Singh
नई दिल्‍ली। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज अपने पद से इस्‍तीफा देंगे और सुबह 10 बजे वह जनता को अपना आखिर संबोधन देंगे। उनके इस्‍तीफे के साथ ही भारतीय राजनीति का एक ऐसा दौर समाप्‍त हो जाएगा जिसने शायद कहीं न कहीं देश की राजनीति को काफी हद तक बदल डाला था।

90 के दशक में शुरू होने वाला चाहे आर्थिक उदारीकरण का दौर हो या फिर बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का 10 वर्ष का कार्यकाल रहा हो, उनका नाम जरूर लिया जाएगा

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शांत लेकिन मजबूत
कांग्रेस-यूपीए के पिछले 10 वर्षों के कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने ही तरह से सम्‍मान और अपनी कड़ी मेहनत को परिभाषित किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि 10 वर्षों के दौरान एक ऐसे प्रधानमंत्री की बनती गई जो कई मुद्दों पर हमेशा शांत रहते थे।

मनमोहन सिंह को भले ही लोग एक कमजोर प्रधानमंत्री करार दें लेकिन उनकी जिंदगी में दो मौके ऐसे भी आए जिसने उन्‍हें एक मजबूत राजनेता की छवि से नवाजा। यह दो मौके थे वर्ष 1991 में देश में आर्थिक बदलावों के दौर की शुरुआत और यूपीए 1 के कार्यकाल में भारत-अमेरिका के बीच हुई न्‍यूक्लियर डील।

ईमानदार छवि पर जाते-जाते उठे सवाल

उनकी साफ सुथरी छवि को उस समय और धक्‍का लगा जब उनके पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब 'एक्‍सीडेंटल पीएम' जारी हुई। इस किताब में संजय बारू ने प्रधानमंत्री होने के बावजूद मनमोहन सिंह की कमजोरियों के बारे में कई बातें लिखीं।

मनमोहन सिंह को उस समय शायद सबसे बड़ी चोट पहुंची जब उनके भाई दलजीत सिंह ने चुनावों के दौरान बीजेपी का दामन थाम लिया। हर पल आलोचानाओं के दौर से गुजरने वाले डॉक्‍टर सिंह के कैबिनेट में कई ऐसे मंत्रियों की फौज रही जो भ्रष्‍टाचार में डूबे रहे लेकिन हमेशा दोष उन पर मढ़ दिया जाता।

विपक्ष के निशाने पर
16वीं लोकसभा के चुनावों के बाद जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए विदाई समारोह का आयोजन किया गया तो बीजेपी ने भी इस बात को माना कि उनकी ईमानदारी और सत्‍यनिष्‍ठा संदेह से परे है।

बीजेपी भले ही उनकी र्इमानदार छवि का सम्‍मान करती हो लेकिन एक मौका ऐसा भी आया जब विपक्ष यानी बीजेपी ने मनमोहन सिंह पर जोरदार हमला बोला था।

वर्ष 2011 में लाल कृष्‍ण आडवाणी ने कहा था, 'सरकार की हालत बहुत खराब है। कभी-कभी मुझे मनमोहन सिंह पर दया आती है हालांकि कभी मैं उनका बहुत सम्‍मान करता था। जब मैंने 2009 के चुनावों से पहले उन्‍हें कमजोर कहा था तो लोगों ने मुझसे पूछा कि मैंने यह क्‍यों कहा क्‍योंकि वह बहुत अच्‍छे और ईमानदार हैं। लेकिन एक प्रधानमंत्री जो 10 जनपथ के इशारे के बिना कुछ नहीं कर सकता तो मुझे इससे बेहतर कुछ और समझ नहीं आता।'

इसके बाद वर्ष 2013 में लाल कृष्‍ण आडवाणी ने साफ कहा था कि उन्‍हें यह बात कहने में कोर्इ संकोच नहीं है कि देश में जितने भी 14 प्रधानमंत्री हुए हैं मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का कार्यकाल उनमें से सबसे बुरा है।

आडवाणी के मुताबिक उन्‍होंने अपनी जिंदगी में इससे कमजोर प्रधानमंत्री कभी नहीं देखा था।

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