क्या भाजपा के आक्रामक राष्ट्रवाद ने AAP को किया राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने को मजबूर?
नई दिल्ली- दिल्ली विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई थी तो सत्ताधारी आम आदमी पार्टी बिजली-पानी समेत बाकी मुफ्त सेवाओं और घोषणाओं के भरोसे चुनाव मैदान में कूदी थी। पार्टी ने अरविंद केजरीवाल सरकार के 'काम' की बदौलत लगातार दूसरी बड़ी जीत की उम्मीदें पाल ली थी। लेकिन, जैसे-जैसे चुनाव प्रचार का आगाज हुआ और माहौल गर्म हुआ केजरीवाल और उनकी पार्टी जहां के लिए रवाना हुई थी, वहां से बीच में रास्ता भटकती नजर आ रही है। पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे कई वाक्यात देखने को मिले हैं, जिससे लगता है कि पार्टी अपना मूल एजेंडा भूल कर विपक्षी बीजेपी के चुनावी मायाजाल में उलझ चुकी है। पिछले दो दिनों में पार्टी और उसके सुप्रीमो का जो रवैया दिखा है, उससे तो साफ जाहिर होता है कि इस बार के चुनाव में वह पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के प्रभाव में आ चुकी है। आइए जानते हैं कि आम आदमी पार्टी चुनाव की शुरुआत में कहां से शुरू हुई थी और आज वह किस मुहाने पर खड़ी है।
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भाजपा के दबाव में शामिल किया देशभक्ति का पाठ ?
नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ दिल्ली के ओखला इलाके के शाहीन बाग में पिछले 52 दिनों से जारी धरना-प्रदर्शन को लेकर बीजेपी ने लगातार आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। ऐसे में यह मानना बड़ा ही स्वाभाविक है कि मतदान से चार दिन पहले आम आदमी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में दिल्ली सरकार के स्कूलों में देशभक्ति का पाठ पढ़ाने का वादा करके बीजेपी के हमलों की धार कुंद करने की कोशिश की है। क्योंकि, बीजेपी लगातार शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से सहानुभूति रखने का केजरीवाल और उनकी पार्टी पर आरोप लगा रही थी। बीजेपी के नेता दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार पर शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों को बिरयानी खिलाने से लेकर उनके तार पाकिस्तानी मंत्रियों तक से जुड़े होने के आरोप लगा रहे थे। ऊपर से देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार शरजील इमाम की बातों ने भाजपा के हमलों की धार और तेज कर रखी थी।

अरविंद केजरीवाल को बताया था 'आतंकवादी'
सबसे पहले बीजेपी के सांसद प्रवेश वर्मा ने केजरीवाल को 'आतंकवादी' कहा था। बाद में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने यह कहकर वर्मा के आरोपों का समर्थन कर दिया कि केजरीवाल खुद को 'अराजकतावादी' कहते हैं और 'अराजकतावादी और आतंकवादी' में कोई ज्यादा फर्क नहीं होता। खुद केजरीवाल ने अपने ऊपर भाजपा की ओर से लगाए गए 'आतंकवादी' होने के आरोपों को सीधे खारिज नहीं किया। उन्होंने बीजेपी को जवाब देने के लिए यह सवाल पूछना शुरू कर दिया कि 'क्या मैं आपको आतंकवादी लगता हूं। मैंने दिल्ली में इतने सारे काम किए क्या मैं आतंकवादी हो सकता हूं।' लेकिन, उनकी पार्टी के मैनिफेस्टो में देशभक्ति की पाठ शामिल किए जाने के बाद यह सवाल जरूर उठता है कि आखिर उन्हें इसकी जरूरत क्यों पड़ी? वह और उनकी पार्टी आतंकवादी नहीं है तो इसको साबित करने की उनको जरूरत क्यों पड़ गई है?

कट्टर हनुमान भक्त बताने की जरूरत क्यों पड़ी ?
सोमवार को ही एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने खुद को कट्टर हनुनाम भक्त साबित करने की कोशिश की। उन्होंने अक्सर दिल्ली के दो बड़े हनुमान मंदिरों में जाकर दर्शन करने के भी दावे किए। इतना ही नहीं, उन्होंने उस कार्यक्रम में हनुमान चालीसा का पाठ करके भी सुनाया कि ऐसा नहीं है कि उन्हें यह आता ही नहीं। सवाल है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुनाव से चार-पांच दिन पहले यह बताने की क्या आवश्यकता पड़ी कि वह सामान्य या कट्टर हनुमान भक्त हैं और उन्हें हनुमान चालीसा कंठस्थ है। उनका मन पूजा-पाठ में लगता है या नहीं, इससे दिल्ली की जनता को क्या मतलब है और अगर उन्होंने काम किया है तो काम पर ही वोट क्यों नहीं मांग रहे? हनुमान चालीसा का पाठ तो कनॉट प्लेस के हनुमान मंदिर में सुबह-शाम दर्शन के लिए आने वाले हजारों भक्त भी उनसे अच्छा सुना सकते हैं। या उन्हें बीजेपी के दबाव में खुद को देशभक्त ही नहीं, हिंदू भी साबित करने की नौबत आ गई है? बीजेपी के नेता तो उनके पाठ पर तंज भी कस रहे हैं कि वो दिन दूर नहीं, जब असदुद्दीन ओवैसी भी हनुमान चालीसा का पाठ करते दिखेंगे!

शाहीन बाग से बनाकर रखी दूरी
सीएए के खिलाफ जब दिल्ली में हिंसक प्रदर्शन हुए और फिर शाहीन बाग में बेमियादी धरना शुरू हुआ तो खुद अरविंद केजरीवाल ने उससे दूरी बनाकर रखने की कोशिश की। उनको जब राजनीतिक जरूरत पड़ी तो अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया को जरूर आगे किया, जिन्होंने प्रदर्शकारियों का समर्थन किया। लेकिन, खुद केजरीवाल ने अपने को सिर्फ दिल्ली के मुख्यमंत्री बनाकर रखने की कोशिश की है। राज्यसभा में पार्टी सांसदों ने नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ मतदान तो किया, लेकिन जब इसके खिलाफ दिल्ली में 20 विपक्षी दलों की बैठक हुई तो एएपी ने उससे भी दूरी बना ली। मतलब, उनके मन में क्या तभी से डर बैठा हुआ था कि ऐसा करने पर चुनाव में भाजपा से सामना करना मुश्किल हो सकता है।

आर्टिकल-370 के वक्त से ही बदलने लगा था रवैया
लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही शायद अरविंद केजरीवाल समझ गए थे कि राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा से पार पाना आसान नहीं है। दिल्ली की किसी विधानसभा सीट पर उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुंच पाई थी। इससे पहले सर्जिकल स्ट्राइक और एयरस्ट्राइक के सबूत को लेकर वे हमेशा बीजेपी नेताओं के निशाने पर रह चुके थे। शायद यही वजह है कि जब मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल के करीब दो महीने बाद ही जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 हटाया तो अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने उसका समर्थन कर दिया। और आखिरकार उन्होंने अपनी पार्टी के घोषणापत्र में देशभक्ति का पाठ पढ़ाए जाने को भी शामिल कर लिया है।
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