Dharmasthala: सदियों की विरासत और छवि को धूमिल करने की साजिश, जानें सोशल मीडिया दावों का पूरा सच

Dharmasthala News: सदियों तक कर्नाटक के श्री क्षेत्र धर्मस्थल की पहचान एक धार्मिक आस्था के प्रतीक, दान और सेवा से जुड़े कामों के लिए रही है। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में इस जगह को लेकर नकारात्मक खबरें सामने आ रही हैं। ये भ्रामक सूचनाएं किसी ठोस तर्क पर आधारित नहीं हैं, बल्कि झूठ और गलत सूचनाओं के बिना किसी पड़ताल के तेजी से फैलने की वजह से है।

अनन्या भट केस के जरिए फैलाई गई एक सनसनीखेज कहानी

इसका चर्चित उदाहरण 'अनन्या भट' केस है। सोशल मीडिया पर सनसनी की तरह आई इस कहानी ने धर्मस्थल की पहचान धूमिल करने का काम किया। इस कहानी में दावा किया गया कि कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज की छात्रा अनन्या भट लापता हो गई थी। बाद में इसी से मिलता-जुलता दावा एक पूर्व सफाई कर्मचारी ने भी किया है।

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कर्मचारी ने दावा किया कि 1995 से 2014 तक धर्मस्थल में काम करने के दौरान उसे कई लाशें दफनाने के लिए मजबूर किया गया था। पूर्व कर्मचारी के मुताबिक ये शव आपराधिक गतिविधियों में शामिल लोगों के थे। कुछ कंकालों की तस्वीरें दिखाकर SIT जांच की भी मांग की गई।

कहानी में ठोस तथ्य और तर्कों का कोई मेल नहीं

अनन्या भट की इस कहानी को एक पूर्व सीबीआई अधिकारी सुजाता भट के दावे ने मजबूत करने का काम किया। सुजाता ने अपनी बेटी के लापता होने की घटना को सफाई कर्मचारी के दावों के साथ जोड़कर पेश किया। हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड इसके बिल्कुल उलट हैं। साल 2003 में जिस कथित गुमशुदगी का दावा किया गया है, उस साल के कॉलेज रिकॉर्ड में 'अनन्या भट' नाम से किसी छात्रा का नामांकन नहीं हुआ था। जिस गुमशुदगी के दावे को आधार बनाया जा रहा है, उसकी सत्यता का कोई कथन या दस्तावेज़ में प्रमाण, पुलिस या मीडिया के रिकॉर्ड्स में दर्ज नहीं हैं।

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भ्रामक प्रचार फैलाने वाले का धर्मस्थल प्रशासन से रहा है विवाद

इस भ्रामक कहानी को जोर-शोर से प्रचारित करने वाले महेश शेट्टी थिमरोड़ी हैं। थिमरोड़ी का धर्मस्थल प्रशासन से पुराना विवाद रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कंकाल मिलने और लोगों को दफनाए जाने के दावे को जोर-शोर से प्रचारित किया। हालांकि, निजी स्वार्थ से प्रेरित उनकी इस कोशिश पर सजग लोगों को विश्वास नहीं हो सकता है। इस वजह से भ्रम, संदेह और सांप्रदायिक तनाव ज़रूर बढ़ गया है। एक पूर्व कॉन्ट्रैक्टर, जिनका अपना इतिहास विवादित रहा है, उसके दावों को विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता है। डिजिटल युग की अपनी चुनौतियां हैं, लेकिन फैक्ट चेक के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका है।

ऐसी खबरों के वायरल होने के हैं अपने गंभीर खतरे

इस फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं के प्रचार का असर बहुत गंभीर हो सकता है। आज की डिजिटल दुनिया में बिना प्रमाण के ऐसे सनसनीखेज दावे या फेक न्यूज वायरल हो सकती है। इससे सदियों पुरानी एक संस्था के सम्मान और गौरव को चोट पहुंच सकती है। धर्मस्थल के सम्मान को इससे झटका लगा ही, बिना किसी तथ्य और प्रमाणिकता के फैलाई सूचनाओं की वजह से ऑनलाइन गुस्सा और नफरत झेलना पड़ा।

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ऐसी घटनाओं से ले सकते हैं सीख

इन घटनाओं से हम सबक जरूर ले सकते हैं। किसी भी वायरल स्टोरी पर यकीन करने के बजाय हमें सूचनाओं के पीछे का आधार, प्रमाण और तथ्यों की पड़ताल करनी चाहिए। हमें यह सोचना चाहिए कि क्या ऐसी खबरों से किसी को लाभ मिल सकता है या यह किसी एजेंडा के तहत फैलाई जा रही है।

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