क्यों परिसीमन पर छाती पीट रहे हैं दक्षिण भारतीय राज्य, बिहार-यूपी को कितनी लोकसभा सीटों का मिलेगा फायदा? जानिए

संसद के विशेष सत्र में ऐतिहासिक 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' पास होने के बाद लोकसभा की सीटों के परिसीमन की चर्चा जोर पकड़ चुकी है। लेकिन, इस प्रक्रिया के संभावित परिणाम को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में काफी चिंता है। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों को यह डर सता रहा है कि परिसीमन प्रक्रिया का मतलब होगा, लोकसभा में उनकी सीटें कम हो जाना।

delimitation tension for South Indian states

परिसीमन क्या है?
अभी तक कानूनी तौर पर लोकसभा की सीटों की संख्या को साल 2026 तक फ्रीज रखा गया है। यानी इसके बाद ही इसकी संख्या बढ़ाई जा सकती है और उसी के हिसाब से नई संसद में जगहें भी बढ़ाई गई हैं। लेकिन, इससे पहले जनगणना होगी, जो 2021 से ही कोविड की वजह से लंबित है। तभी परिसीमन का काम शुरू हो सकता है। परिसीमन उस प्रक्रिया का नाम है, जिसके तहत परिसीमन आयोग बदली हुई जनसांख्यिकी (Demography) के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की नई सीमाएं निर्धारित करता है।

दक्षिण भारतीय राज्य दे रहे हैं जनसंख्या नियंत्रण का तर्क
संसद से जो महिला आरक्षण विधेयक पास हुआ है, यह तभी अमल में आ पाएगा, जब परिसीमन के बाद महिलाओं के लिए 33% सीटें चिन्हित की जा सकेंगी। लेकिन, दक्षिण भारतीय राज्यों को अभी से यह डर सता रहा है कि अगर परिसीमन का आधार जनसंख्या रहा तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए की गई उनकी सारी कोशिशों के बदले पुरस्कार की जगह सजा मिलेगी। क्योंकि उनके अच्छे काम का नतीजा उन्हें लोकसभा सीटें गंवाकर भुगतना पड़ेगा।

परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों का संभावित प्रोजेक्शन
इंडिया टुडे ग्रुप ने परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों में संभावित बदलावों को लेकर एक चार्ट दिया है, जिससे लगता है कि दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता बेवजह नहीं हैं। वहीं यूपी और बिहार जैसे जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण पर प्रभावी सफलता नहीं प्राप्त कर सके हैं, फिर भी उन्हें इस चार्ट के हिसाब से लोकसभा सीटों के मामले में काफी फायदा मिल सकता है।

परिसीमन के बाद जिन राज्यों की सीटें घट सकती हैं

मसलन, तमिलनाडु में अभी 39 सीटें हैं, जिसकी घटकर 31 रहने की संभावना है। इससे उसे 8 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसी तरह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अभी 42 सीटें हैं, जो 34 हो सकती हैं और उसे भी 8 सीटों का नुकसान हो सकता है। इसकी तरह केरल की 20 से 12 हो सकती है और उसे भी 8 सीटों का नुकसान झेलना पड़ सकता है। पश्चिम बंगाल की 42 से घटकर 38 हो सकती है और उसकी 4 सीटें कम हो सकती हैं। ओडिशा की 21 से 18 (3 कम), कर्नाटक की 28 से 26 (2 कम), हिमाचल प्रदेश की 4 से 3 (1 कम), पंजाब की 13 से 12 (1 कम) और उत्तराखंड की 5 से घटकर 4 सीटें रह सकती हैं (1 सीट का घाटा)।

परिसीमन के बाद जिन राज्यों की सीटों की संख्या नहीं बदलेगी

हालांकि, असम (14) और महाराष्ट्र (48) में कोई परिवर्तन नहीं होने का अनुमान जताया गया है।

परिसीमन के बाद जिन राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं

परिसीमन के बाद जिन राज्यों को फायदा होने की संभावना जताई गई है, उनमें छत्तीसगढ़ 11 से 12 (1 सीट), दिल्ली 7 से 8 (1 सीट),गुजरात 26 से 27 (1 सीट), हरियाणा 10 से 11 (1 सीट), झारखंड 14 से 15 (1 सीट), मध्य प्रेदश 29 से 33 (4 सीट), राजस्थान 25 से 31 (6 सीट), बिहार 40 से 50 (10 सीट) और उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 91 (11 सीट का फायदा) होने का अनुमान जताया गया है।

देश की जीडीपी में योगदान का भी दे रहे हैं हवाला
यही कारण है कि तमिलनाडु और तेलंगाना की ओर से इसको लेकर काफी चिंता जतायी जा चुकी है। इन राज्यों का कहना है कि देश की जीडीपी में उनका काफी महत्वपूर्ण योगदान है और अगर लोकसभा में जनसंख्या की वजह से उनका प्रतिनिधित्व घटता है तो यह उनके साथ अन्याय की तरह होगा। दूसरी तरफ वे जनसंख्या नियंत्रण में मिली सफलता को भी इस तरह के परिसीमन को अपने लिए सजा मान रहे हैं।

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दक्षिण राज्यों को मिला बड़ा भरोसा
वैसे भारत सरकार के अधिकारियों ने ऐसे राज्यों को इस बात की तसल्ली दी है। उनका कहना है कि संबंधित राज्यों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटों की जो संख्या बढ़ाई जाएगी, उसका आधार वोटरों की संख्या नहीं, बल्कि यह सीटों की मौजूदा संख्या के अनुपात में ही बढ़ाई जाएंगी।

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