Delhi Service Bill: नए गठबंधन के बाद विपक्षी एकता का पहला लिटमस टेस्ट आज
Delhi Service Bill: पिछले हफ्ते दिल्ली सेवा बिल को लोकसभा में पास कर दिया गया था। सरकार के पास पूर्ण बहुमत होने की वजह से लोकसभा में इस बिल को आसानी से पास कर दिया गया था। लेकिन अब यह बिल राज्यसभा में पहुंच गया है, यहां पर विपक्ष इस बिल को रोकने की हर संभव कोशिश करेगा।
विपक्ष का लिटमस टेस्ट
हाल ही में विपक्ष ने नया गठबंधन बनाया है, जिसमे 26 दलों ने हिस्सा लिया और इस गठबंधन को इंडिया नाम दिया गया था। इस गठबंधन के गठन के बाद विपक्षी एकता का आज पहला लिटमस टेस्ट है। राज्यसभा में दिल्ली सेवा बिल पर विपक्ष कितना एकजुट है, इसकी एक स्पष्ट झलक देखने को मिल सकती है।

विपक्षी एकता में लगेगी सेंध!
वहीं लोकसभा में पूर्ण बहुमत होने की वजह से आसानी से इस बिल के पास होने के बाद अब सरकार के सामने राज्यसभा में इस बिल को पास कराने की चुनौती है। हर किसी की इस बात पर नजर होगी कि क्या मोदी सरकार विपक्षी एकता में सेंध लगाने में सफल होती है।
राज्यसभा का अंक गणित
राज्यसभा में नंबर की बात करें तो ऊपरी सदन में कुल 237 सीटें हैं। ऐसे में सरकार के बिल को रोकने के लिए विपक्ष को 119 सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। अगर सभी सदस्य वोटिंग के लिए मौजूद रहते हैं तो विपक्ष को इस आंकड़े को हासिल करना होगा।
क्या है नंबर गेम
लेकिन विपक्षी दलों पर नजर डालें जो एनडीए का हिस्सा नहीं हैं तो बीजेडी, वाईएसआरसीपी, टीडीपी विपक्ष की मुश्किल को बढ़ा सकते हैं। अगर इन दलों के नेताओं सरकार के पक्ष में जाने का फैसला लिया तो इस बिल को आसानी से पास कराया जा सकता है।
इन दलों के समर्थन के बाद एनडीए के पास 130 सांसदों का बहुमत मिल जाएगा। विपक्ष के 28 दलों की बात करें तो इनकी कुल राज्यसभा सदस्यों की संख्या 99 है। अगर बीआरएस विपक्ष के साथ जाता है तो यह संख्या 106 पहुंच सकती है।
अभिषेक मनु सिंघवी करेंगे बहस की शुरुआत
कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी इस बिल पर विपक्ष की ओर से बहस की शुरुआत करेंगे। वरिष्ठ वकील सिंघवी ने दिल्ली सरकार की सुप्रीम कोर्ट में इस केस को लेकर पैरवी की थी। विपक्ष के वरिष्ठ नेता ने कहा कि हम किसी वरिष्ठ वकील को विपक्ष की ओर से बहस की शुरुआत करते देखना चाहते हैं। इसके लिए सिंघवी बेहतरीन विकल्प हैं।
केंद्र-दिल्ली सरकार आमने-सामने
अगर दिल्ली सेवा बिल की बात करें तो केंद्र सरकार इस बिल को मई माह में लेकर आई थी। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए यह बिल लेकर आई थी जिससे दिल्ली की सेवाओं पर नियंत्रण हासिल किया जा सके। वहीं केजरीवाल सरकार का कहना है कि यह संघीय ढांचे पर प्रहार है। उन्होंने मताम विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात करके इस बिल के खिलाफ समर्थन मांगा है।












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