Delhi elections: पूर्वांचली वोटरों पर सभी दल डाल रहे हैं डोरे, जानिए कितनी सीटों पर हार-जीत तय करेंगे ?
नई दिल्ली- पूर्वांचल के मतदाताओं ने दिल्ली के चुनाव का समीकर पूरी तरह से बदल दिया है। आज की तारीख में इनकी संख्या इतनी हो गई है कि ये किसी भी दल का चुनावी हिसाब-किताब बिगाड़ सकते हैं और किसी को भी राजधानी की सत्ता के ताज के करीब पहुंचा सकते हैं। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनावों में ही आम आदमी पार्टी ने पूर्वांचली प्रत्याशियों पर बहुत ज्यादा भरोसा दिखाया था और उसके सारे के सारे पूर्वांचली उम्मीदवार विधायक बनने में भी सफल रहे थे। यूं तो दिल्ली की अधिकतर सीटों पर अब पूर्वांचली वोटरों की मौजूदगी है, लेकिन पूर्वी दिल्ली,उत्तर-पूर्वी दिल्ली और बाहरी दिल्ली के बदरपुर और द्वारका इलाकों में इनका अच्छा-खासा दबदबा हो चुका है। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर से पूर्वांचलियों को काफी संख्या में मैदान में उतारा है तो भाजपा और कांग्रेस ने भी अपनी रणनीति बदल ली है। खासकर बीजेपी ने तो उसी मकसद से मनोज तिवारी को यहां का अध्यक्ष ही बनाया हुआ है। आइए जानते हैं कि दिल्ली में मौजूदा चुनाव में पूर्वांचली वोटरों की संख्या कितनी है और वे कितनी सीटों का चुनाव प्रभावित कर सकते हैं और कितनी सीटों पर हार या जीत की चाबी वही तय करने जा रहे हैं।
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किस पार्टी ने कितने पूर्वांचली उम्मीदवारों को दिया टिकट?
दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने एक बार फिर से सबसे ज्याद पूर्वांचली उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। पार्टी ने 70 में से 13 पूर्वांचलियों को प्रत्याशी बनाया है। बीजेपी ने अभी अपने सिर्फ 57 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं, उसमें उसके भी 8 पूर्वांचली उम्मीदवार हैं। हालांकि, महाबल मिश्रा और कीर्ति आजाद जैसे पूर्वांचली नेताओं के होने के बावजूद इस दौर में अभी कांग्रेस सबसे पीछे नजर आ रही है, लेकिन उसने भी 54 घोषित उम्मीदवारों में से 3 पूर्वांचलियों को टिकट दिया है। कुल मिलाकर पूर्वांचली वोटरों को अपने पक्ष में लाने के लिए बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच ही सबसे ज्यादा होड़ नजर आ रही है। मसलन, केजरीवाल की पार्टी ने 2015 में भी 13 पूर्वांचलियों को चुनाव मैदान में उतारा था, जिनमें से सारे चुनाव जीत गए थे। तब बीजेपी की लिस्ट में सिर्फ 3 पूर्वांचली प्रत्याशी ही थे और एक भी सफल नहीं हुआ।

30 सीटों पर है प्रभाव, 15 सीटों पर हार-जीत तय करेंगे
मौजूदा विधानसभा चुनाव में दिल्ली में पूर्वांचली मतदाताओं की तादाद 29 से 30 फीसदी के करीब है, जिसकी वजह से यहां के चुनावी समीकरण में उनकी अहमियत अब सभी दलों को समझ में आ चुकी है। वैसे अधिकतर पूर्वांचली मतदाता पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और बाहरी दिल्ली के बदरपुर और द्वारका इलाकों में ज्यादा प्रभावशाली भूमिका में नजर आ रहे हैं। 2015 में आम आदमी पार्टी की लहर ने जो दिल्ली की राजनीतिक दिशा बदली उसके बाद भाजपा भी पूर्वांचली वोटरों को लेकर ज्यादा गंभीर हो गई है। मनोज तिवारी जैसे पूर्वांचली नेता को दिल्ली की कमान सौंपने के पीछे भी पार्टी की यही रणनीति है और लोकसभा चुनाव में उसका प्रभाव दिख भी चुका है। अगर वर्तमान में दिल्ली की सभी 70 विधानसभा सीटों की बात करें तो 30 सीटों पर पूर्वांचली वोटरों की तादाद अच्छी-खासी है, जहां वह चुनाव का रुख किसी के भी पक्ष में मोड़ सकते हैं और किसी का भी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। लेकिन, इनमें से भी 15 सीटों पर तो वह उम्मीदवारों की हार और जीत तय करने का दम रखते हैं।

पूर्वांचली वोटरों को लुभाने के लिए किसने क्या किया?
मौजूदा चुनाव में पूर्वांचली वोटरों के बीच भारतीय जनता पार्टी भी एक मजबूत दावेदार बनकर उभरी है, क्योंकि उसने मनोज तिवारी जैसे पूर्वांचली नेता को अपना अध्यक्ष बनाया है। लेकिन, इसकी काट में आम आदमी पार्टी ने पूर्वांचली वोटरों के बीच अपना प्रभाव कायम रखने के लिए पूरे दिल्ली में 300 स्थानों पर 'अपन पूर्वांचल' के नाम से पूर्वांचल उत्सव का आयोजन कराया है। यही नहीं मैथिली बोलने वाले मतदाताओं को लुभाने के लिए अरविंद केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के सरकार स्कूलों में मैथिली भाषा की पढ़ाई को एक वैकल्पिक विषय के तौर पर भी पेश किया है। इतना ही नहीं पार्टी यह भी दावा करती है कि छठ पूजा के लिए उसने 1,000 हजार से ज्यादा घाट बनाए हैं। इसके जवाब में बीजेपी यमुना रिवर फ्रंट बनाने की पेशकश कर ही है, जहां पर बड़ी संख्या में लोग आराम से छठ पूजा में शामिल हो सकते हैं।

जेडीयू से भी गठबंधन चाहती है बीजेपी
राजधानी के चनाव में पूर्वांचली वोटर कितने महत्वपूर्ण हो चुके हैं, इसका अंदाजा इसी बात से भी लगाया जा सकता है कि पहली बार बीजेपी, बिहार में अपनी सहयोगी जेडीयू के लिए भी कुछ सीटें छोड़ने पर विचार कर रही है। पार्टी को अभी 13 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा करनी है, उसमें खबरें हैं कि वह दो सीट जदयू के लिए भी छोड़ सकती है और यहां एलजेपी को भी साथ लाने की सोच सकती है। यही नहीं, जिस तरह से बिहार में पार्टी ने नीतीश कुमार की अगुवाई में ही इतने पहले ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है, उसके बाद संभावना है कि वह दिल्ली चुनाव में प्रचार के लिए भी बिहार के मुख्यमंत्री से सभाएं करने का आग्रह कर सकती है। अगर एनडीए सहयोगियों के बीच बात बन गई तो इनके उम्मीदवारों का भी आंकड़ा आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों के आसपास ही पहुंचने की संभावना है।

कांग्रेस ने आरजेडी से किया है समझौता
वैसे देखा जाय तो दिल्ली में पूर्वांचली नेताओं को उतारने का सबसे पहला सफल प्रयोग कांग्रेस ने किया था। कीर्ति आजाद, जब बीजेपी से पहले भी कांग्रेस में थे तो वह दिल्ली की राजनीति में काफी सक्रिय थे और गोल मार्केट सीट से विधायक भी रह चुके हैं। इसी तरह महाबल मिश्रा भी दिल्ली में कांग्रेस के मजबूत पूर्वांचली चेहरा रहे हैं। लेकिन, मौजूदा चुनाव में पार्टी फिलहाल आम आदमी पार्टी और बीजेपी से पूर्वांचली उम्मीदवारों के मुकाबले पीछे दिख रही है। उसने अभी जिन 3 पूर्वांचलियों को टिकट दिया है, उसमें पार्टी के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष कीर्ति आजाद की पत्नी पूनम आजाद भी शामिल हैं, जो संगम विहार से चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि, पार्टी ने आरजेडी के लिए जो चार सीटें छोड़ी हैं, उसका मकसद भी पूर्वांचली वोटरों पर ही डोरे डालना है। (तस्वीरें प्रतीकात्मक)
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