Crystal Award at WEF 2020: दीपिका पादुकोण को मिला क्रिस्टल अवॉर्ड, खुद हुई थीं डिप्रेशन की शिकार

नई दिल्ली। बॉलीवुड की मस्तानी गर्ल दीपिका पादुकोण को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ओर से क्रिस्टल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है, दीपिका को ये सम्मान मेंटल हेल्थ को लेकर किए गए सराहनीय कार्य के लिए दिया गया है, खुद डिप्रेशन से जंग लड़ चुकीं दीपिका को दावोस में यह सम्मान दिया गया, जिसके बाद दीपिका पादुकोण ने एक स्पीच भी दी, जिसमें मेंटल हेल्थ को लेकर बात की।

दीपिका पादुकोण को मिला क्रिस्टल अवॉर्ड

अपने संबोधन में अवार्ड के लिए लोगों को शुक्रिया अदा करने के बाद दीपिका ने खुद के अनुभव भी लोगों के साथ शेयर किए और बताया कि खुद के अनुभव ने ही उन्हें इस ओर काम करने के लिए प्रेरित किया, अपनी डिप्रेशन से जंग को याद करते हुए दीपिका पादुकोण ने कहा, 'मेरी लव और हेट रिलेशनशिप ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है और मैं इससे पीड़ित हर किसी को बताना चाहती हूं कि आप अकेले नहीं हैं, उन्होंने यह भी कहा कि जितना टाइम मुझे अवॉर्ड लेने में लगा है, उतनी ही देर में दुनिया में किसी एक शख्स ने डिप्रेशन की वजह से सुसाइड कर लिया होगा।

दीपिका भी हो चुकी हैं अवसाद की शिकार

गौरतलब है कि दीपिका ने एक इवेंट में बताया था कि साल 2014 में वो भी अवसाद ग्रसित थीं, अगर उनकी मां का सपोर्ट नहीं होता तो शायद वो भी आज किसी मानसिक अस्पताल में अपना इलाज करवा रही होतीं।

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    पर्सनल लाइफ में परेशान थीं दीपिका

    ये वो दौर था जब दीपिका फिल्मी दुनिया में धीरे-धीरे ऊंचाई पर पहुंच रही थीं लेकिन पर्सनल लाइफ में वो अकेलेपन और ब्रेकअप की शिकार हुई थीं, हालांकि वो ब्रेकअप किसके साथ था, इस बात का खुलासा आज तक नहीं हुआ लेकिन कहा ये ही गया कि उस वक्त दीपिका फिल्म अभिनेता रणबीर कपूर के प्यार में गिरफ्तार थीं हालांकि दीपिका ने इस बारे में कभी खुलकर नहीं कहा, हालांकि उन्होंने अपनी बीमारी को किसी से छुपाया नहीं।

    'लिव लब लाफ फाउंडेशन' की शुरुआत

    फिलहाल दीपिका पादुकोण ने ना केवल अपने दर्द पर विजय पायी बल्कि लोगों को भी इससे निजात दिलाने की कोशिश की और इसलिए उन्होंने एनजीओ 'लिव लब लाफ फाउंडेशन' को शुरू किया था, जो कि लोगों को ड्रिप्रेशन से बाहर निकालने में मदद करती है।

    अक्सर लोग इस बीमारी को सीरयसली नहीं लेते...

    दीपिका ने कहा कि अक्सर लोग इस बीमारी को सीरयसली नहीं लेते और जब ये बीमारी भयावह स्थिति में पहुंच जाती है, तब इसके लिए परेशान होते हैं। आजकल इस रोग की चपेट में सबसे ज्यादा हमारे युवागण हैं, जिसके पीछे कारण हद से ज्यादा लोगों का प्रतिस्पर्धी होना है।

    लोग भावनाओं का कत्ल बड़ी आसानी से कर देते हैं

    आज लोग एक-दूसरे से आगे निकलने के चक्कर में संवेदनाओं और भावनाओं का कत्ल बड़ी आसानी से कर देते हैं, बस जहां ये कत्ल होता है वहीं से अवसाद के अंकुर फूटते हैं, ऐसे में मैं लोगों से कहना चाहती हूं वो घर में ऐसा माहौल अपने बच्चों के लिए पैदा करें जहां उन्हें किसी बात की असुरक्षा ना हो और बच्चा खुशी महसूस करे, वो अपनी भावनाओं से जुड़ी हर बात चाहे वो बीमारी हो या फिर डर, आराम से शेयर कर पाए।

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