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Criminal laws: तीनों नए बिलों को लेकर संसदीय समिति में किस मुद्दे पर हो रहा है राजनीतिक मंथन?

केंद्र सरकार ने संसद के पिछले मानसून सत्र में मौजूदा आपराधिक कानूनों में बदलाव वाले जो तीन नए विधेयक पेश किए हैं, उसपर इस समय गृह मामलों की संसद की स्थायी समिति में चर्चा हो रही है। मोदी सरकार ने आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस ऐक्ट की जगह क्रमश: भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य विधेयक लाया है।

जानकारी के मुताबिक गृह मंत्रालय ने संसदीय समिति को यह भी बताया है कि प्रस्तावित भारतीय साक्ष्य विधेयक में यह भी प्रावधान जोड़ा जा रहा है कि मंत्रियों और राष्ट्रपति के बीच हुए किसी विशेष संचार को उसके सामने पेश किए जाने की आवश्यकता नहीं होगी।

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तीनों नए विधेयकों पर संसदीय समिति कर रही है चर्चा
केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला की ओर से गृह मामलों की संसद की स्थायी समिति को प्रस्तावित कानूनों के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जानकारी दी जा रही है। मानसून सत्र में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने तीनों नए विधेयक लोकसभा में पेश किए थे। उसके बाद उन्हें गहन पड़ताल के लिए संसदीय समिति में भेज दिया गया था।

विधेयकों के हिंदी नाम पर सवाल
जानकारी के अनुसार इन तीनों मसौदा कानूनों पर पहली ही बैठक में कुछ राजनीतिक मुद्दे भी सामने आ गए। मसलन, डीएमके के सांसद दयानिधि मारन ने तीनों विधेयकों के हिंदी नाम पर आपत्ति जताई और सुझाव दिया कि समिति को विभिन्न राज्यों में बार के सदस्यों से इसपर चर्चा करनी चाहिए। इसका कारण ये बताया गया कि क्रिमिनल ट्रायल जिला स्तरीय अदालतों में ही चलते हैं।

विभिन्न राज्यों से राय जुटाने की भी उठी मांग
यह भी जानकारी है कि राज्यसभा में टीएमसी के सदन के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने भी इसी तरह की भावना जताते हुए कहा कि संसदीय समिति को सभी स्टेकहोल्डर्स की राय लेने के लिए राज्यों का दौरा करना चाहिए। अन्य विपक्षी सांसदों ने भी उनके विचार का समर्थन किया। मोदी सरकार ने यह तीनों विधेयक अंग्रेजों के जमाने वाले तीनों आपराधिक कानूनों को पूरी तरह से भारतीय स्वरूप देने के लिए पेश किया है।

तीन महीने में समिति को सौंपनी है रिपोर्ट
इस संसदीय समिति को तीन महीने में इन नए विधेयकों पर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है, ताकि इसके आधार पर सरकार संसद के अगले सत्र में संशोधित विधेयक सदन में पेश कर सके। गृह मामलों की स्टैंडिंग कमेटी में 28 सदस्य हैं और इसके अध्यक्ष अभी बीजेपी सांसद बृज लाल हैं। सदस्यों में भी आधे से ज्यादा सांसद सत्ताधारी बीजेपी के हैं। इस हिसाब से सरकार को समिति से संशोधित विधेयक पास कराने में दिक्कत आने की संभावना नहीं है।

एक दिलचस्प बात ये है कि मौजूदा समिति का कार्यकाल अगले महीने ही खत्म हो रहा है, जिसका गठन सालाना आधार पर किया जाता है। बड़ी बात ये है कि तीनों नए विधेयक भविष्य में देश को नई दिशा देने वाले हैं। संसदीय समिति में इसे भेजने का मकसद ही यही होता है कि संसद सदस्य इसकी हर बारीकियों पर गौर कर सकें। क्योंकि, संसद में चर्चा के दौरान ऐसा कर पाना संभव नहीं होता। इसलिए, सदस्यों को प्रस्तावित कानून को बेहतर से बेहतर बनाने पर फोकस करना होगा। अगर इसे राजनीति की कसौटी पर कसेंगे तो खामियों के रह जाने की आशंका रहेगी।

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