गौरक्षा के नाम पर हिंसा स्वीकार्य नहीं, इसे रोकना राज्यों की जिम्मेदारी: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा है कि गौरक्षा के नाम पर हिंसा किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकती है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जिस तरह की घटनाएं गौरक्षा के नाम पर सामने आई हैं, उन पर राज्य सरकारों को गंभीरता दिखानी चाहिए और इन्हें रोकने के लिए सख्त कदम उठाने चाहिए। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने गौरक्षा को लेकर हो रही हिंसा और इसपर राज्यों के कोर्ट के आदेश को ना मानने को लेकर याचिका पर सुनवाई के दौरान ये कहा। सुनवाई के बाद मामले पर बेंच ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

कोर्ट ने कहा कि भीड़ की हिंसा को किसी जाति या धर्म से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि पीड़ित सिर्फ पीड़ित होता है, उसकी जाति या धर्म नहीं देखा जाना चाहिए। कोई भी हो, कानून को हाथ में लिए जाने की इजाजत नहीं जी सकती है। जस्टिस मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाय चंद्रचूड की बेंच ने कहा कि ये कानून व्यवस्था की परेशानी है और इसके लिए राज्य जिम्मेदार है।
देश में गोरक्षा के नाम पर हिंसा और अफवाहों के बाद मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चाहे कोई भी हो, उससे सख्ती से निपटा जाए, ऐसी घटनाओं को रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है। एडिशनल सोलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने अदालत को बताया कि केंद्र ऐसे मामलों को लेकर गंभीर है और इन्हें रोकने के लिए कोशिशें कर रहा है। महात्मा गांधी के पपौत्र तरूण गांधी ने गोरक्षा के नाम पर हिंसा और हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।












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