कोविड-19 :क्यों दूसरी लहर को रोकने में नाकाम रहा भारत ?
नई दिल्ली, 19 अप्रैल: भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर लगभग बेकाबू हो चुकी है। रविवार को 2.73 लाख से ज्यादा नए केस सामने आए हैं और मौत का आंकड़ा 16 सौ को पार कर चुका है। तीन महीने पहले मुड़कर देखें तो यह स्थिति हैरान करती है। देश ने कोरोना को लगभग कंट्रोल कर लिया था। लेकिन, आज भारत हेल्थ इमरजेंसी की दौर से गुजर रहा है। मेन स्ट्रीम मीडिया की खबरें अगर हिला रही हैं तो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें और वीडियो तो हालात की भयानकता को और बढ़ा दे रही हैं। सवाल है कि तीन महीने में ऐसा क्या हो गया, क्या कमी रह गई कि हालात हाथ से निकलते चले गए?

तीन महीने में कैसे बदल गए देश के हालात ?
बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने मार्च की शुरुआत में देश में कोविड-19 महामारी के 'अंत की शुरुआत' की घोषणा कर दी थी। उन्होंने वैश्विक सहयोग का हवाला देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप की तारीफ में कसीदे पढ़े थे। जनवरी से भारत ने दूसरे देशों को वैक्सीन उपलब्ध करवाने शुरू किए थे, जिसे 'वैक्सीन डिप्लोमेसी' कहकर प्रचारित किया गया। इसकी बड़ी वजह ये थी कि सितंबर के रोजाना के औसत 93,000 प्रतिदिन के केस से फरवरी के मध्य में औसतन 11,000 नए केस तक कहानी सीमित हो गई थी। सात दिनों में मौत का आंकड़ा भी घटकर औसतन 100 से भी कम रह गया था।

भारत में हालात बिगड़ने के कारण ?
हालात सुधरने लगे थे, इसीलिए फरवरी के अंत में चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की 824 विधानसभा सीटों के लिए चुनावों की घोषणा कर दी गई। इन चुनावों में कुल 18.6 करोड़ लोग वोटर हैं। मार्च के मध्य में क्रिकेट बोर्ड ने गुजरात के अहमदाबाद स्थित नरेंद्र मोदी स्टेडियम में दो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच देखने के लिए 1.30 लाख से ज्यादा लोगों को अनुमति दे दी। हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन हुआ, जिसमें लाखों लोगों ने गंगा में डुबकी लगाई। देखते ही देखते पूरा देश कोविड की दूसरी लहर की चपेट में आ गया। फिर से लॉकडाउन और पाबंदियों वाले दिन लौटने शुरू हो गए हैं। लैंसेट कोविड-19 कमीशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर इंफेक्शन की रफ्तार नहीं रुकी तो जून के पहले हफ्ते तक भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या रोजाना 2,300 के आंकड़े को पार कर जाएगी।

टीकाकरण अभियान भी हुआ प्रभावित
आज की स्थिति ये है कि भारत के इतने बड़े वैक्सीनेशन अभियान को भी संघर्ष की दौर से गुजरना पड़ रहा है। शुरू में देसी वैक्सीन के प्रभावी होने पर सवाल उठाए गए थे। लेकिन, जब करीब 11 करोड़ लोगों को पहली डोज पड़ चुकी है और 1.60 करोड़ से ज्यादा लोग दूसरे खुराक भी लगवा चुके हैं तो इसकी किल्लत की खबरें आने लगी हैं। भारत ने फिलहाल वैक्सीन के निर्यात पर पाबंदी लगा रखी है और विदेशी वैक्सीन के आयात करने की भी अनुमति दे दी है। माना जा रहा है कि बढ़ी हुई आवश्यकता को देखते हुए ऑक्सीजन भी आयात किए जाने की संभावना है।

'यही सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइंट था।'
एक्सपर्ट मानते हैं कि सरकार दूसरी लहर को रोक पाने में पूरी तरह से नाकाम रही है। फिजिक्स और बायोलॉजी के प्रोफेसर गौतम मेनन ने कहा है, दूसरी लहर आनी तय थी, लेकिन भारत इसके असर को कम करने में नाकाम रहा। उन्होंने कहा 'महाराष्ट्र में फरवरी से हमें नए वैरिएंट के बारे में पता था। अधिकारियों ने शुरू में इससे इनकार किया था।.........यही सबसे महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइंट था।'












Click it and Unblock the Notifications