कांग्रेस नागपुर रैली से क्यों कर रही है लोकसभा चुनाव का शंखनाद, ये 5 वजहें तो नहीं?
कांग्रेस पार्टी ने गुरुवार को नागपुर में एक विशाल रैली आयोजित की है। यह रैली पार्टी की 139वें स्थापना दिवस पर आयोजित की गई है। अगले महीने से होने वाली राहुल गांधी की 'भारत न्याय यात्रा' से पहले नागपुर रैली को 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का शंखनाद माना जा रहा है।
इसी महीने संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में तीन हिंदी भाषी राज्यों और पूर्वोत्तर के मिजोरम में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। सिर्फ तेलंगाना चुनाव में मिली जीत ने उसकी लाज बचाई है।

कांग्रेस ने कहा- 'हैं तैयार हम'
नागपुर रैली के माध्यम से पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि सेमीफाइनल में जो हुआ, वह जाने दो, पार्टी अगले कुछ महीनों में होने वाले सिंहासन के फाइनल के लिए अभी भी पस्त नहीं पड़ी है। इसलिए नागपुर रैली को कांग्रेस ने 'हैं तैयार हम' का नाम दिया है।
सवाल है कि राहुल गांधी ने मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस की महारैली के लिए नागपुर को ही क्यों चुना है? तो इसकी ऐतिहासिक, भौगोलिक और राजनीतिक सारी वजहें हैं।
आरएसएस का मुख्यालय- पहली वजह
कांग्रेस नेता खासकर राहुल गांधी की विरोध की राजनीति का केंद्र आरएसएस रहा है। वे भारत से विदेश तक जब भी मोदी सरकार की आलोचना शुरू करते हैं तो भाजपा से ज्यादा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर आक्रामक नजर आते हैं।
नागपुर आरएसएस का मुख्यालय है। 1925 में यहीं के एक स्थानीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने पवित्र दशहरे के दिन इसकी स्थापना की थी। तो शायद कांग्रेस नेताओं को आरएसएस की विचारधारा पर चलने वाली बीजेपी पर राजनीतिक प्रहार के लिए इससे मुनासिब जगह नहीं मिल सकती थी।
भौगोलिक तौर पर केंद्र में है नागपुर- दूसरी वजह
भौगोलिक तौर पर नागपुर देश के केंद्र में है। इसे महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी भी माना जाता है। ध्यान रखने की बात है कि यूपी की 80 लोकसभा सीटों के बाद सबसे ज्यादा 48 सीटें महाराष्ट्र में ही हैं।
पिछले चुनाव में यहां कांग्रेस की एक तरह से बत्ती गुल हो गई थी। उसी साल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की अगुवाई वाला सत्ताधारी गठबंधन ही चुनाव जीता था।
कांग्रेस की स्थिति दक्षिण भारत में पिछले कुछ चुनावों से जरूर मजबूत हुई है। लेकिन, महाराष्ट्र समेत देश के ज्यादातर हिस्से में उसकी साख बिगड़ी ही लग रही है।
नागपुर में बड़ी रैली के माध्यम से पार्टी दक्षिण भारत के साथ-साथ उत्तर भारत को भी अपनी संघर्ष क्षमता का संदेश देने की कोशिश कर सकती है।
राज्य में विरोधी गठबंधन महा विकास अघाड़ी में शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसे दल उसके सहयोगी हैं, लिहाजा उसके लिए यहां से महाराष्ट्र और पूरे देश में अपनी सियासी ताकत का प्रमाण देना ज्यादा सुविधाजनक लग रहा है।
कांग्रेस का ऐतिहासिक गढ़- तीसरी वजह
कांग्रेस खासकर गांधी परिवार के लिए नागपुर का विशेष महत्त्व है। 1959 में नागपुर अधिवेशन में ही राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनी थीं। तब वो सिर्फ 41 साल की थीं।
आपातकाल के बाद जेपी के 'इंदिरा हटाओ, देश बचाओ' आंदोलन के बावजूद कांग्रेस नागपुर सीट पर विजयी रही थी। 1980 से 2019 के बीच भाजपा सिर्फ तीन बार ही यह सीट जीती है- 1996, 2014 और 2019. लेकिन, अब यह बीजेपी का गढ़ बन चुका है।
अभी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी यहां के सांसद हैं और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यहीं से चुनाव जीतते हैं। कांग्रेस अपना गढ़ वापस हासिल करना चाहती है।
अंबेडकर की दीक्षाभूमि- चौथी वजह
भारत की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बीआर अंबेडकर एक बहुत बड़े फैक्टर बन चुके हैं। 14 अक्टूबर,1956 को उन्होंने लाखों अनुयायियों के साथ नागपुर में ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। उस ऐतिहासिक जगह पर एक स्मारक है, जिसे दीक्षाभूमि कहा जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में बीजेपी ने अंबेडकर के सम्मान में कई तरह के कदम उठाए हैं। खासकर कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान उनके प्रति कथित गलत रवैए को लेकर पीएम मोदी उसके खिलाफ आलोचनात्मक भी रहे हैं। कांग्रेस इस नरेटिव को बदलने की कोशिश में है।
कांग्रेस अभी भाजपा के खिलाफ 'संविधान के कथित रूप से खतरे में होने' में वाला नरेटिव सेट करने में जुटी हुई है। ऐसे में उसके लिए भाजपा सरकार के खिलाफ चुनावी बिगुल बनाने के लिए नागपुर एक बेहतर जगह है।
इतिहास दोहराने की कांग्रेसी उम्मीद- पांचवीं वजह
कांग्रेस नेताओं का दावा है कि आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी ने नागपुर में ही एक रैली की थी, जिसका ऐसा असर हुआ था कि वह विदर्भ क्षेत्र (नागपुर भी इसी क्षेत्र में है) की सारी सीटें जीत गई थी।
पार्टी नेताओं को यकीन है कि गुरुवार की नागपुर रैली से भी देश में बदलाव की शुरुआत होगी और कांग्रेस पार्टी फिर से सत्ता के करीब पहुंचेगी। लोकसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र में अगले साल ही विधानसभा चुनाव भी होने हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले का कहना है, 'हम ये संदेश देना चाहते हैं कि हम बीजेपी, उसके भ्रष्टाचार और संविधान विरोधी राजनीति के खिलाफ बड़े संघर्ष के लिए तैयार हैं।'












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