सोनिया गांधी के संदेश पर बोले प्रशांत किशोर, जब सड़कों से नदारद हो नेतृत्व तो इसका कोई मतलब नहीं

नई दिल्ली। जनता दल (यूनाइटेड) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने कहा है कि कांग्रेस के नेता सड़कों से गायब हैं, ऐसे में सोनिया गांधी की ओर से जरी किए जा रहे संदेशों का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शुक्रवार शाम एक संदेश जारी कर नागरिकता कानून को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ एकजुटता की बात कही थी और पुलिस कार्रवाई की निंदा की थी। इस पर किशोर ने ट्वीट कर कहा कि जब कांग्रेस के नेता घरों से बाहर निकल ही नहीं रहे तो फिर संदेश से क्या फायदा होगा।

प्रशांत किशोर ने किया ये ट्वीट

प्रशांत किशोर ने किया ये ट्वीट

प्रशांत किशोर ने शनिवार सुबह ट्वीट किया, सीएए और नागरिकता कानून के खिलाफ नागरिकों की लड़ाई से कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सड़क से गायब है। पार्टी इतना ही करहे कि सभी कांग्रेस के सीएम कहें कि कहा है कि वे अपने राज्यों में एनआरसी की अनुमति नहीं देंगे। इतना भी नहीं तो फिर इन बयानों का मतलब कुछ भी नहीं है।

क्या बोली थीं सोनिया गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने शुक्रवार शाम को बयान जारी कर कहा है कि भाजपा की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ देश में प्रदर्शन हो रहे हैं। असहमति की आवाज को बर्बरता से कुचला जा रहा है। लोकतंत्र में ये स्वीकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इस सरकार की इन नीतियों की पुरजोर निंदा करती है और भारतीयों के साथ खड़ी है। सोनिया गांधी ने कहा है कि नागरिकता संशोधन कानून भेदभावपूर्ण है। नोटबंदी की तरह एक बार फिर एक-एक व्यक्ति को अपनी एवं अपने पूर्वजों की नागरिकता साबित करने के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ेगा। एनआरसी समाज के गरीब और कमजोर तबके को बेहद नुकसान पहुंचाएगी, लोगों की आंशकाएं जायज हैं। कांग्रेस संविधान के बुनियादी मूल्यों को बचाने के लिए लोगों के साथ है।

प्रशांत भी एनआरसी, सीएए के विरोध में

प्रशांत भी एनआरसी, सीएए के विरोध में

जदयू के प्रशांत किशोर भी नागरिकता कानून के खिलाफ हैं। इसको लेकर वो अपनी पार्टी के रुख पर भी सवाल उठा चुके हैं। बता दें कि नागरिकता संशोधन एक्ट, 2019 को हाल ही में सदन से मंजूरी मिली है। इस कानून में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, जैन, सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय के शरणार्थियों को नागरिकता का प्रस्ताव है। कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठन इस बिल का विरोध कर रहे हैं। देशभर की बड़ी यूनिवर्सिटियों के छात्र भी इसके खिलाफ सड़कों पर हैं। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि धर्म के आधार पर कानून बनाना भारत के संविधान पर हमला है।

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