चुनावी किस्से: फणीश्वरनाथ रेणु ने हार के बाद खाई थी ‘चौथी कसम’; बैलेट की डेमोक्रेसी को बताया था भ्रमजाल

दूसरों के दु:ख में अपने कष्‍ट भूल जाने वाले कलमकार फणीश्‍वरनाथ 'रेणु' को निर्मल वर्मा ने समकालीन हिन्दी साहित्य का संत लेखक कहा है। हिन्दी साहित्य के इस संत की एक कहानी थी 'मारे गए गुलफाम'। इसी कहानी पर राज कपूर की फिल्म 'तीसरी कसम' बनी थी। कहा जाता है कि रेणु ने अपनी कहानी में कथा के पात्र के माध्यम से 'तीन कसमें' खाई थीं, लेकिन जिंदगी का तजुर्बा मिलने पर उन्होंने 'चौथी कसम' भी खाई। और वह थी 'चुनाव न लड़ने की कसम'

दरअसल, रेणुजी ने 1972 में फारबिसगंज विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। इस चुनाव में उन्हें बुरी तरह हार मिली थी। छल-प्रपंच और अपनों से मिले धोखे के कारण हुई हार के बाद उन्होंने ये 'चौथी कसम' खाई थी। आईये जानते हैं फनीश्वर नाथ रेणु के चुनाव हारने और 'चौथी कसम' खाने का किस्सा...

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फनीश्वर नाथ रेणु 1952 तक सोशलिस्ट पार्टी के जरिये राजनीति में सक्रिय थे। मगर उन्हें जल्दी ही समझ में आ गया कि राजनीति में लेखकों की कोई हैसियत नहीं है। उन्हें ये भी समझ आ गया था कि दलगत राजनीति में बुद्धिजीवी से भी अपेक्षा रहती है कि वह अपनी बुद्धि गिरवी रख कर पार्टी का काम करे। लेकिन समाजवादी आदर्शों और जयप्रकाश नारायण के प्रति उनका भरोसा अंत तक बना रहा। यही वजह थी कि वे सक्रिय राजनीति से भले ही दूर रहे, लेकिन इससे बिल्कुल अलग-थलग कभी नहीं रहे।

निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला

हालांकि साल 1972 में एक वक्त आया जब उन्होंने निर्दलीय ही विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया। उन्होंने पटना में एक संवाददाता सम्मेलन में निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो बुद्धिजीवियों में हलचल मच गई। लोग हैरान हो गए कि आखिर रेणु के सिर पर चुनाव लड़ने का भूत क्यों सवार हो गया है?

लोगों ने कहा कि जब रेणु राजनीति में थे, तब कभी भी चुनाव लड़ने की नहीं सोची, लेकिन अब दो दशक बीतने के बाद उनका मन कैसे बदल गया है? और जब चुनाव लड़ना ही था तो किसी पार्टी से टिकट मांगते। इतने बड़े लेखक को कोई भी पार्टी टिकट दे देती। कहा जाता है कि रेणु को करीब से जानने वाले लोग नामांकन पत्र भरने के बाद से इसे वापस लेने की आखिरी तारीख तक इंतजार करते रहे कि शायद उनका मन बदल जाए।

कहा ये भी जाता है कि इस बीच कुछ दलों उन्हें अपना समर्थन देने की पेशकश भी की। लेकिन रेणु ने ऐसे सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए। वे अपने चुनावक्षेत्र फारबिसगंज में पर्चा दाखिल करने और अपनी उम्मीदवारी का प्रचार करने चले गए। फणीश्वर नाथ रेणु चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अपनी 'नाव' लेकर उतर चुके थे।

चुनाव में रेणु को मिला 'धोखा'

कहा जाता है कि फणीश्वर नाथ रेणु को चुनाव लड़ने के लिए उनके करीबी मित्र सरयू मिश्र ने ही उकसाया था, जो बाद में खुद कांग्रेस से खड़े हो गए थे। जब रेणु ने चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया तो लखन लाल कपूर जो कि उनके एक अन्य करीबी मित्र थे, उनके घर आए और अपनी पार्टी का समर्थन उन्हें देने की पर्ची लिखकर छोड़ गए।

लेकिन कुछ समय बाद लखन भी सोशलिस्ट पार्टी से रेणु के खिलाफ खड़े हो गए। दिलचस्प बात ये थी कि तीनों मित्र एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। 1942 के आंदोलन में ये तीनों एक साथ जेल में बंद थे।

वो वक्त ऐसा था जब लाठी, पैसे और जाति के जोर पर चुनाव जीते जाते थे। साहित्यकार रेणु इनके बगैर चुनाव लड़कर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम करना चाहते थे। वह अपनी चुनाव सभाओं में दिनकर, अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, सुमित्रा नंदन पंत और रघुवीर सहाय की कविताएं पढ़ते। वह कहते थे कि अकेला और निर्दलीय होने के कारण उनकी आवाज कोई बंद नहीं कर पाएगा।

चुनाव के दौरान मिले कई सबक

लेकिन चुनाव का बिगुल बजते ही आदमी किस तरह बदल जाता है, इसका अनुभव उन्हें चुनाव के वक्त ही हुआ। वह कहते हैं, आप मूंगफली वाले से बात कीजिए, आप उससे मूंगफली ले लीजिए, लेकिन वो वोट आपको देगा या नहीं देगा, इसके बारे में वह एकदम चुप रहेगा।

ये लगभग जाहिर हो चुका था कि रेणु चुनाव हार रहे हैं। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी सरयू मिश्रा ने लगभग 48 प्रतिशत वोट हासिल कर जीत हासिल की। सोशलिस्ट पार्टी के लखन लाल कपूर को 26, बीजेएस के उम्मीदवार जय नंदन को 13 तथा रेणु जी को 10 प्रतिशत वोट मिले थे।

फणीश्वर नाथ रेणु ने चुनाव के बाद एक साक्षात्कार के दौरान कहा कि उन्होंने देखा कि गांव- गांव से लोग वोट देने जा रहे हैं और खाली वापस आ रहे हैं क्योंकि लाठी लेकर वहां गुंडे खड़े हैं। उन्होंने निराश होकर कहा था कि चेंज बैलट से नहीं होगा। बैलट की डेमोक्रेसी भ्रमजाल है। इसके बाद उन्होंने चुनाव न लड़ने की (चौथी) कसम खा ली।

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