लद्दाख: पशुओं पर कुत्ते छोड़-छोड़कर चीन ने शुरू की थी घुसपैठ, स्थानीय लोगों का बड़ा खुलासा
नई दिल्ली- चीन ने भले ही इस साल अप्रैल-मई के महीने से पूर्वी लद्दाख में सेना से सीधे भिड़ने की गुस्ताखी की हो, लेकिन शायद इसका तानाबाना वह पिछले काफी समय से बुन रहा था। जिन इलाकों पर चीन आज कब्जा करने की फिराक में है, असल में शायद वह काफी पहले से ही वहां सक्रिय हो चुका था। यह जानकारी उन इलाकों के आसपास रहने वाले निवासियों से मिली है। चीन ने भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जे की कोशिश से पहले स्थानीय लोगों की पशुएं चुराना शुर कर दिया था। यही नहीं उसे हरे चारागाहों में चरने गए पशुओं पर कुत्ते छोड़कर उन्हें भगाना भी शुरू कर दिया था। लेकिन, शायद कोई यह नहीं समझ पाया कि असल में जिसे चीनी सेनाओं की छोटी-मोटी चोरी य दबंगई समझ रहे थ, वह इतनी बड़ी साजिश की तैयारी थी

पिछले साल अगस्त से ही मिलने लगे थे संकेत!
लद्दाख के डरबोक इलाके के स्थानीय लोग अब जो कुछ बता रहे हैं, उससे लगता है कि चीन गलवान घाटी या पैंगोंग त्सो में जो इस साल पिछले कुछ महीने से आक्रमकता दिखा रहा है, उसका जाल वो पिछले काफी वक्त से बुन रहा था। इकोनॉमिक टाइम्स ने कुछ स्थानीय लोगों से जो बातचीत की है, उससे इसी तरह की जानकारी सामने आ रही है। डरबोक के एक निवासी की मानें तो पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी और दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में चीन के इरादे के संकेत तो पिछले साल अगस्त में ही मिलने लगे थे। एक निवासी ने दावा किया कि चीनी सेना के लोग उसके दो घोड़े उठाकर ले गए थे। उसके मुताबिक उसके घोड़े भारत के इलाके में घास चर रहे थे, तभी चीनियों ने उन्हें चुरा लिया था।
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आजतक चीनी सैनिकों ने नहीं लौटाए घोड़े
उस निवासी के ये भी दावा कि चाइनीज सेना द्वारा उसके घोड़े ले जाने की जानकारी सेना को भी दी गई, लेकिन उसे शांत रहने को कहा गया और मुआवजे का भरोसा दिया गया, लेकिन अबतक मुआवजा भी नहीं मिला है। एक स्थानीय निवासी ने कहा,'वे (चाइनीज) हमारे इलाके में घुस आए और उसके दो घोड़े ले गए और एक घोड़े की कीमत 10,000 रुपये थी। उसे शांत रहने के लिए कहा गया और ये भी कहा गया कि उसे मुआवजा दिया जाएगा।.........इस मामले में स्थानीय प्रशासत भी शांत ही रहा। '

पहले चोरी, फिर सीनाजोरी
इलाके का ये अकेला मामला नहीं है। पूर्वी लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों के निवासी अक्सर शिकायतें करते हैं कि आर्मी उनके पशुओं को भारतीय इलाके की परंपरागत चारागाहों की ओर जाने की अनुमति नहीं देती है। ये भी कहते हैं कि जब खानाबदोश लोग किसी तरह चारागाह तक भेड़ें लेकर पहुंच भी जाते थे, तो चाइनीज काफी आक्रमकता के साथ उनपर प्रशिक्षित कुत्ते छोड़कर उन्हें खदेड़कर भगा देते हैं। 2018 में भी पूर्वी लद्दाख के डेमचॉक में भी एक ऐसा ही मामला सामने आया था। नयोमा की एक ब्लॉक डेवलपमेंट चेयरपर्सन उगरेन चोडॉन के परिवार के 5 याक अचानक गायब हो गए थे। स्थानीय लोग मानते हैं कि आज भी वो चीनियों के कब्जे में हैं।

इलाके के लोग कर रहे हैं शांति की प्रार्थना
डरबोक के एक निवासी सोनम इस हफ्ते अपने गांव से कारु लौट आए हैं। उनका कहना है, 'हमारे इलाके में सैनिकों की बहुत ज्यादा आवाजाही है। स्थानीय लोग चिंतित हैं और अपने और अपने परिवार के उन सदस्यों के लिए डरे हुए हैं जो फ्रंट लाइन में सेना और बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के साथ मिलकर कुलियों का काम करते हैं।' उनका ये भी कहना है कि चुशुल, पैंगोंग लेक, डरबोक, श्योग और बाकी इलाकों के लगभग सभी गांव के लोगों ने अपने क्षेत्र को जंग से बचाने के लिए विशेष प्रार्थना की है और हालात के शांतिपूर्ण समाधान के लिए आराधना की है। डरबोक के एक और निवासी ताशी ने बताया, 'हमनें कुलियों से सुना है कि दोनों सेनाओं में आज (गुरुवार को) भी खूब बहस हुई है।'

खानाबदोश भी हैं चाइनीज सैनिकों से परेशान
पिछले महीने ही
ने आपको बताया था कि लद्दाख की एक अर्द्ध खानाबदोश जनजाति चंगपा जो अपनी झुंड और पश्मीना बकरियों के लिए ही मशहूर हैं, मौजूदा संकट की वजह से मुश्किलों में आ गए हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास ज्यादातर चारागाहों के इलाकों में चीनी सैनिकों की गतिविधियों के चलते उनकी रोजी-रोटी पर संकट छा गया है। इन खानाबदशों की जिंदगी पूरी तरह से उसी हरे घास के मैदानों पर ही निर्भर हैं। इस समय जिस तरह से एलएसी पर चीन के साथ तनाव बढ़ा है उन्हें डर है कि उनके लिए बचे-खुचे घास के मैदानों में भी बकरियां ले जाना मुश्किल हो जाएगा।(कुछ तस्वीरें प्रतीकात्मक)
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