'हमारे कैंप में मुख्यमंत्री महबूबा फ़ोटो खिंचवाने आई थीं'

भारत पाकिस्तान सीमा
Mohit Khandhari/BBC
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भारत पाकिस्तान सीमा से सटे सैंकड़ों गांवों में ज़िंदगी धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ने लगी है.

10 दिन से ज़्यादा का समय राहत शिविरों में बिताने के बाद अब गांव वाले घर लौट रहे हैं और उनके चेहरे पर एक राहत का भाव साफ़ देखा जा सकता है.

जैसे ही सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वाले लोगों को मंगलवार देर शाम इस बात की जानकारी मिली कि भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ मिलिटरी ऑपरेशन (DGMO) के बीच 2003 के सीजफ़ायर समझौते को पूरी तरह से लागू करने पर सहमति बन गई है. अब लोगों ने घर लौटने का मन बना लिया है.

गोलीबारी के दौरान भी गांव वाले अपने घर की देखभाल करने आते थे, लेकिन उनके परिवार के सदस्य अपने रिश्तेदारों के यहाँ या राहत शिविरों में रह रहे थे.

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भले ही गांव वाले ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर लौट रहे हैं, लेकिन उनके दिल में अब भी एक डर बैठा हुआ है कि न जाने कब फिर सीमा पार से गोलीबारी शुरू हो जाए.

वो इस बात को लेकर अभी भी आश्वस्त नहीं हैं कि वो वहां कितने दिन रह पाएंगे.

अपने घरों में मची तबाही देख गांव वाले बड़े परेशान थे और सरकार से इस बात की उम्मीद लगा कर बैठे हैं कि वो जल्द ही उन्हें उचित मुआवजा राशि दी जाएगी, जिससे वो नुक़सान की भरपाई कर सकेंगे.

आरएसपुरा के राहत शिविरों में बीबीसी से लोगों ने अपनी आपबीती बताई है.

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'जान बचाने के लिए शिविर में आई'

राहत शिविरों में 500 से ज्यादा गांव वाले शरण लिए हुए थे.

70 साल की रामप्यारी, आंखों पर काला चश्मा लगाए सरकारी स्कूल की क्लास के बाहर तपती गर्मी में बैठी थीं.

उनके माथे से पसीना आंखों पर टपक रहा है और बार-बार उसे साफ़ कर रही हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "अभी 15 दिन भी नहीं हुए हैं, मैंने अपने आंखों का ऑपरेशन करवाया था. मुझे जो परहेज करना था वो नहीं कर पा रही हूं."

रामप्यारी सीमा से सटे गांव सुचेतगढ़ की रहने वाली हैं. उन्होंने बताया कि जब गांव में लगातार पाकिस्तान की तरफ़ से फायरिंग हो रही थी तो हमलोगों को आनन-फानन में जान बचाने के लिए घर छोड़ कर शिविर में आना पड़ा.

वो 10 दिनों से स्कूल में रह रही हैं. उन्होंने आगे बताया कि उनके पास कहीं और जाने का विकल्प भी नहीं था और न ही वो इस हालात में कहीं और जा सकती थीं.

उनको बस इस बात का मलाल है कि जिस समय उन्हें अपने घर के अंदर रहना चाहिए था, वो घर से बाहर हैं और गर्मी झेल रही हैं.

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शिविर

उन्हीं के बगल में बैठी जीतो देवी ने बताया कि उनके गांव में इतने गोले कभी बरसाए नहीं गए जितने इस बार बरसाए गए थे.

जीता देवी कहती हैं, "कुछ दिन अपने रिश्तेदारों के यहां रही, बाद में राहत शिविर में आई."

उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ़ से खाने-पीने का तो इंतजाम किया गया है, लेकिन इस गर्मी के मौसम में शिविर में रहना आसान नहीं है.

उन्होंने कहा, "छोटे-छोटे बच्चों के साथ यहां इस हाल में रहना बहुत मुश्किल है. गर्मी के मौसम में मच्छर-मक्खी जीने नहीं देते हैं. रात को जब बिजली चली जाती है तो बहुत परेशानी होती है."

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लोगों से हम बात कर ही रहे थे कि अशोक कुमार हाथ जोड़े हमारे सामने आ खड़े होते हैं.

साल की शुरुआत में पाकिस्तान की तरफ़ से की गई फायरिंग में अशोक के जवान लड़के की मौत हो गई थी. वो 17 साल का था.

अशोक भर्राई आवाज में कहते हैं, "मैं और मेरी बीवी एक बार फिर बेघर हो गए हैं."

अशोक कुमार ने बताया कि जब मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती राहत शिविर में आई थीं तो उन्होंने उनसे मिलने की बहुत कोशिश की, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें मिलने नहीं दिया.

वो आगे बताते हैं कि उन्हें मुआवज़े के रूप में अभी तक सिर्फ़ एक लाख रुपए ही मिले हैं जबकि केंद्र सरकार की तरफ़ से पांच लाख रुपए दिए जाने का वादा किया गया था.

हताश अशोक कहते हैं, "अब मुझमें काम करने की हिम्मत नहीं बची है. मैं पागल सा हो गया हूं."

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गोलीबारी के बीच ज़िदगी

गांव की ही एक महिला विद्या का कहना है कि सुरक्षित स्थान पर जाने की कोई व्यवस्था नहीं थी और उनका बेटा घायल हो चुका था.

उन्होंने कहा, "हमारे घर के गेट के पास मोर्टार गिरा था. बड़ी मुश्किल से उसे हॉस्पिटल ले गई. उसका इलाज चल रहा है."

विद्या देवी के मन में डर इस कदर बैठ गया है कि वो घर वापस जाने को सुरक्षित नहीं मानती हैं.

वो आगे कहती हैं, "हमारे जानवर भी वहां भूखे प्यासे बंधे खड़े हैं. बड़ी मुश्किल से कोई गांव वाला उन्हें चारा डाल देता है और पानी पिला देता है. किसी तरीक़े से गुज़ारा चल रहा है."

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'फोटो खिंचवाने आई थीं मुख्यमंत्री'

शिविर में मिलीं एक बुज़ुर्ग महिला ने बताया कि उनके घर के पास तीन गोले गिरे थे. गांव में कुछ लोगों की घर की दीवार और छत दरक गई है.

वो कहती हैं, "बड़ा नुक़सान हुआ है. इस उम्र में घर छोड़ कर बार-बार आना बहुत परेशानी भरा है. हम ग़रीब लोग हैं, कहां जाएं. गोलाबारी बंद होनी चाहिए. आर-पार की लड़ाई होनी चाहिए."

आरएसपुरा आईटीआई शिविर कैंप में दिन गुजार रहे मोहनलाल का कहना था कि पिछले छह दिनों से उन्हें काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा था.

मोहनलाल ने कहा, "मुख्यमंत्री यहां आई थीं, लेकिन हमलोगों से बात नहीं की. समझ में नहीं आया कि वो यहां किसलिए आई थीं, फोटो खिंचवाने आईं थी क्या?"

चुन्नी लाल भी मोहनलाल के साथ ही शिविर में रह रहे थे. उनका शरीर वहां जरूर था पर मन गांव में ही लगा था.

वो कहते हैं, "हमारा घर, माल-मवेशी, सब वहां है. हम यहां दो वक़्त की रोटी खा कर गुज़ारा कर रहे हैं. अभी हम बीच में फंस गए हैं. न यहां रह सकते हैं और न वापस जा सकते हैं. अभी भी गोलीबारी का ख़तरा मंडरा रहा है."

गोलीबारी की वजह से बच्चों की पढ़ाई भी बंद हो चुकी है.

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